राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महाराणा का महारावत जसवंतसिंह के समय देवलिया पर सेना भेजने का वर्णन वि० सं० १६८५ ( ई० स० १६२८ ) की घटनाओं में हुआ है, जिसका हम आगे उल्लेख करेंगे। ऐसी स्थिति में महारावत सिंहा का परलोकवास वि० सं० १६८५ ( ई० स० १६२८ ) के लगभग मानना पड़ेगा और ऐसा ही प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की तथा वहां से प्राप्त एक दूसरी पुरानी ख्यात से भी पाया जाता है¹। बड़वे की ख्यात में महारावत सिंहा के १३ राणियां और दो कुंवर जसवंतसिंह तथा जगन्नाथसिंह होने का उल्लेख है²। एक दूसरी ख्यात में महारावत की राणियां राणियों की संख्या तो उतनी ही दी है, परंतु उनके और संतति एवं उनके पिता आदि के नाम बड़वे की ख्यात से नहीं मिलते। उसके कुंवरों के नाम जसवंतसिंह, जगन्नाथ- सिंह, माधवसिंह और पुत्रियों के नाम सदाकुंवरी, राजकुंवरी³ तथा सामंत- ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ४। प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० ६। ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ४। जगन्नाथसिंह के वंशजों में नागदी का ठिकाना है। ( ३ ) तेजसुतसिंहकी सुता सो तीजी सीसोदनी ॥ व्याह्यो राजकुमारि प्रतापगढ़ लग्नकाल ॥ कर्मवती नाम एक कन्या भई ताकै पीछै, व्याह्यो जसवंत जाहि जोधपुरको नृपाल ॥ १४ ॥ वंशभास्कर; पृ० २५४६ । राजकुंवरी की बनवाई हुई बूंदी में नाहर धौस नाम की बावड़ी है। उसमें वि० सं० १७२१ वैशाख वदि १ ( ई० स० १६६४ ता० १ अप्रेल ) का निम्नलिखित शिलालेख लगा हुआ है- ......संवत १७२१ वैशाख वदि १ महाराजाधिराज हाड़ा दिवाण रावजी श्रीसत्रसाल( शत्रुसाल )जी की राणीजी श्रीसीसोदणीजी राजकुंवरिजी रावतजी श्रीसींघोजी गढ़ देवल्याको धणी तीकी बेटी नै