राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
महारावत सिंहा ११६ मुगल बादशाहत की अधीनता स्वीकार न करने से मेवाड़ के महाराणाओं से बादशाह अकबर असंतुष्ट रहा और उनपर शाही सेना के महाराणा अमरसिंह का आक्रमण जारी थे, ऐसे समय में भानुसिंह के महारावत के लिए टीका मक्खनखां की सहायतार्थ काम आने से विरोध भेजना बढ़ने की संभावना देख महाराणा अमरसिंह ने उस- ( भानुसिंह )के भाई सिंहा को गद्दीनशीनी का टीका भेज आश्वासन के रूप में कहलाया कि भानुसिंह और जोधसिंह दोनों हमारे भाई ही मरे हैं। अब जोधसिंह के पुत्र नाहर और भाखरसी का जिन गांवों पर अधिकार है उनमें किसी प्रकार का दखल न देना¹। इसपर सिंहा ने अपनी स्थिति पर विचार कर महाराणा की बात मान ली और जोधसिंह के पुत्रों से कोई छेड़-छाड़ न की। बादशाह अकबर ने उधर का अच्छा बंदोवस्त करने के लिए जीरण और नीमच की जागीर रामपुरा के सीसोदिया राव दुर्गा को, जो शाही सेवक बन गया था, प्रदान कर दी²। उसका महाराणा से भी मेल था, इसलिए उसने महाराणा को कुछ गांव देकर उसका समाधान कर दिया। तदनन्तर भानुसिंह के मंदसोर के शाही सेनाध्यक्ष मक्खनखां की सहायतार्थ मारे जाने से बादशाह जहांगीर के समय इस सेवा के पुरस्कार में महारावत सिंहा देवलिया-राज्य का सारा राज्य-कार्य करता था, सरदारों आदि को मिलाकर वहां का स्वामी बन बैठा। जब सिंहा को भानुसिंह की मृत्यु और सांवळदास की राज्य-प्राप्ति का समाचार मिला तो वह परिस्थिति को अपने विरुद्ध देख कुछ समय के लिए चुप हो बैठा। फिर उसने धमोतर के सरदार को अपनी ओर मिलाकर कुछ समय बाद एक दिन छल से देवलिया में प्रवेश किया और वहां अधिकार कर लिया। फिर उसके पक्षवाले सरदारों ने सांवळदास को मार डाला और उसके वंशजों से भांतला की जागीर छीन ली। संभव है कि सांवळदास ने सिंहा की अविद्यमानता का अवसर पाकर देवलिया का राजा बनने की चेष्टा की हो और उसी में उसका प्राणांत हुआ हो। जब तक इस विषय का कोई अन्य प्रमाण न मिले इस संबंध में अधिक प्रकाश नहीं पड़ सकता, क्योंकि ख्यातों में इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। ( १ ) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५-६ । ( २ ) वही; पृ० ६५-६ ।
१२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
को कुंडाल का परगना जागीर में प्राप्त हुआ¹। बादशाह अकबर की महाराणा प्रतापसिंह को अधीन बनाने की कामना सफल नहीं हुई। फिर उक्त महाराणा के देहांत के पीछे उसके [मार्जिन: बसाइ और अरखोद परगने का फ़रमान कुंवर कर्ण-सिंह के नाम होना] उत्तराधिकारी महाराणा अमरसिंह (प्रथम) पर वि० सं० १६५७ (ई० स० १६००) में बादशाह ने अपने शाहज़ादे सलीम (जहांगीर) को भेजा; किंतु वह असफल होकर लौटा। तदनन्तर वि० सं० १६६० (ई० स० १६०३) में बादशाह ने पुनः शाहज़ादे को मेवाड़ पर सेना लेकर जाने की आज्ञा दी, किन्तु पहली बार के आक्रमण की कठिनाइयों का स्मरण कर वह किनारा कर गया। वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में बादशाह अकबर की मृत्यु हुई और उसके स्थान पर शाहज़ादा सलीम बादशाह हुआ। उसने अपने पिता के मेवाड़ की स्वाधीनता नष्ट करने के संकल्प को पूरा करने की इच्छा से उसी वर्ष अपने शाहज़ादे परवेज़ की अधीनता में एक बड़ी सेना उधर रवाना की। महाराणा ने शाही सेना का बड़ी वीरता से मुक़ाबला किया, जिससे शाहज़ादा परास्त होकर लौटा। बादशाह ने अपनी सेना के असफल होकर लौटने पर कई बार मेवाड़ पर सेनाएं भेजीं, परंतु महाराणा इससे निराश न हुआ और लड़ता ही रहा। अंत में बादशाह ने वि० सं० १६७० (ई० स० १६१३) में शाहज़ादे
(१) प्रतापगढ़ राज्य की एक प्राचीन ख्यात; पृ० ६। सर जॉन मालकम ने 'रिपोर्ट ऑन दि प्रोविंस ऑव् मालवा एंड एड्जॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स (पृ० २२४)' में लिखा है कि इस घटना के बदले में बादशाह की तरफ़ से १२ गांव उस(भानुसिंह)के पुत्र जसवंतसिंह को दिये गये। सर जॉन मालकम के उपर्युक्त लेख से ख्यात के कथन की बहुत कुछ पुष्टि होती है, परंतु वहां जसवंतसिंह को भीमा(भानुसिंह)का पुत्र बतलाया है, जो ठीक नहीं है। भीमा (भानुसिंह) निःसंतान मरा था और उसके पीछे उसका भाई सिंहा देवलिया का स्वामी हुआ, जिसका पुत्र जसवंतसिंह था, यह निश्चित है। महारावत सिंहा बादशाह जहांगीर का समकालीन था। अतएव उपर्युक्त कुंडाल की जागीर अर्थात् १२ गांव, जिनका सर मालकम ने उल्लेख किया है, बादशाह जहांगीर- द्वारा महारावत सिंहा को मिलना ही संभव है।
महारावत सिंहा १२१
खुर्रम (शाहजहां) को एक बड़ी सेना के साथ महाराणा पर रवाना किया। शाहज़ादे ने मेवाड़ में पहुंचकर चारों तरफ़ के नाके-घाटे बंद कर दिये और रसद का जाना भी रोक दिया। उसने मुख्य-मुख्य स्थलों पर सुदृढ़ थाने नियत कर महाराणा को घेर लिया, तो भी महाराणा ने शाही सेना से मुक़ाबला करना न छोड़ा। वह इस आपत्ति से बिलकुल न घबराया और यथा-साध्य लड़ता ही रहा। शाही सेना की लगातार चढ़ाइयों से महाराणा के सरदारों की संख्या घटती जाती थी और उन्हें भय होने लगा कि शाही सेना द्वारा घिरकर वे मारे जावेंगे तथा उनके बाल-बच्चे पकड़ लिये जावेंगे। इस डांवा-डोल स्थिति को देख सरदारों ने महाराणा के कुंवर कर्णसिंह की सलाह लेकर शाहज़ादे के पास संधि का प्रस्ताव भेजा, जिसके स्वीकार होने पर महाराणा के सामने यह बात प्रकट की गई। महाराणा को विवश होकर अपनी इच्छा के विरुद्ध यह बात स्वीकार करनी पड़ी और ज्येष्ठ राजकुमार को शाही दरबार में भेजने की मुख्य शर्त पर वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१५) में संधि हो गई। फिर शाहज़ादा खुर्रम, कुंवर कर्णसिंह को लेकर बादशाह के पास गया, जिसने उसका बड़ा सम्मान किया और मेवाड़ से गये हुए इलाक़ों के अतिरिक्त रतलाम, वसाड़, अरणोद, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि का फ़रमान भी ता० २२ रवीउस्सानी हि० स० १०२४ (वि० सं० १६७२ ज्येष्ठ वदि ६ = ई० स० १६१५ ता० ११ मई) को उक्त कुंवर के नाम कर दिया१। बादशाह जहांगीर के पिछले समय में उसका शाहज़ादा खुर्रम तो बाग़ी हो ही रहा था, परंतु कई कारणों से अपने प्रधान सेनापति महावतखां [महावतखां का देवलिया में जाकर रहना] पर भी बादशाह की नाराज़गी हो गई। उसका खज़ाना ज़ब्त कर लिया गया एवं खानखाना को अजमेर का सूबा जागीर में दिया जाकर वि० सं० १६८३
(१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ५०३। मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २३६-४६। (२) मुंशी देवीप्रसाद; जहांगीरनामा; पृ० ५८८-६। १६
१२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
(ई० स० १६२६) के लगभग वह महाबतखां को मारने के लिए नियुक्त किया गया। इसपर महाबतखां प्राण-रक्षा के लिए इधर-उधर भटकने लगा। उसके उदयपुर-राज्य के पहाड़ों में होकर देवलिया पहुंचने पर महारावत सिंहा ने उसको सम्मान-पूर्वक अपने यहां रक्खा¹ और प्रसिद्ध है कि देवलिया से विदा होते समय उसने महारावत को इस सौजन्य के बदले में एक अंगूठी भेंट की², जिसका मूल्य साठ हज़ार रुपये के लगभग था। फ़ारसी तवारीखों से यह ज्ञात नहीं होता कि महाबतखां बादशाह की अप्रसन्नता होने पर कहां-कहां रहा था, परंतु उसका राजपीपला के मार्ग से दक्षिण में जाने का 'हिस्ट्री ऑव् जहांगीर'³ और 'जहांगीरनामे'⁴ में भी उल्लेख मिलता है। इससे अनुमान होता है कि वह मालवे की तरफ़ होता हुआ ही दक्षिण में शाहज़ादे खुर्रम के पास गया था। देवलिया मालवे से मिला हुआ है। पहाड़ी प्रांत होने से वह सुरक्षित स्थान समझा जाता है तथा उत्तर से दक्षिण की तरफ़ जाते समय मार्ग में पड़ता है। इसलिए पहाड़ी मार्ग से होते हुए उसका देवलिया की तरफ़ जाना और वहां महारावत का आश्रय पाना संभव है। पहाड़ी प्रदेश होने तथा वहां का जलवायु ख़राब होने से मुसलमानी सेना का उस ओर कम ही जाना होता था। महाबतखां का देवलिया में रहने का कथन महारावत प्रतापसिंह के समय बनी हुई 'प्रतापप्रशस्ति' (खंडित काव्य) में भी है, जो इस घटना के
(१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७। 'वीरविनोद' में महाबतखां का महारावत जसवंतसिंह के समय देवलिया में रहने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है। महाबतखां वि० सं० १६८३ में विद्रोही हुआ था। उस समय महारावत सिंहा विद्यमान था, जैसा कि ग़यासपुर की बणजारों की बावड़ी के शिलालेख से प्रकट है। महारावत सिंहा बादशाह जहांगीर का समकालीन था, इसलिए उसके समय में ही महाबतखां का देवलिया में रहना संभव है। (२) वीरविनोद (द्वितीय भाग, पृ० २८६) में भी महाबतखां-द्वारा अंगूठी देने का उल्लेख है। (३) डॉक्टर बेनीप्रसाद-कृत; पृ० ४३०। (४) मुंशी देवीप्रसाद; जहांगीरनामा; पृ० ५६६।
महारावत सिंहा १२३ लगभग पचास वर्ष पीछे की बनी हुई है। ऐसी स्थिति में महारावत सिंहा के समय ही महाबतखां का देवलिया में रहने का कथन विश्वसनीय है¹ । इसके विरुद्ध मेजर के० डी० अर्सकिन-कृत 'गेज़ैटियर ऑव् प्रतापगढ़' में महाबतखां का महारावत भानुसिंह के समय देवलिया में रहने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है, जैसा कि ऊपर लिखा गया है² । 'वीरविनोद' में महारावत सिंहा का वि० सं० १६७६ ( ई० स० १६२२ ) में देहांत होना लिखा है³; किन्तु गयासपुर की बावड़ी के वि० सं० महारावत सिंहा का १६८४ वैशाख सुदि ३⁴ ( ई० स० १६२७ ता० ८ परलोकवास अप्रेल ) के शिलालेख से उसका उक्त संवत् तक विद्यमान होना पाया जाता है । उदयपुर के महाराणा राजसिंह के बनवाये हुए राजसमुद्र तालाब के 'राजप्रशस्ति'-नामक बृहत् काव्य और 'अमरकाव्य' में महाराणा जगतसिंह ( प्रथम ) के प्रसङ्ग में उक्त ( १ ) श्रीमत्सूरुकुले प्रतापनृपतिर्दाता न चित्रं पुरा श्रीसिंहप्रपितामहेन शरणं संरक्षितं साहृतः । श्रेष्ठो मोवतखान एव वसुधानाथान्नबापप्रभोः । शाजानात्सुखमापतुष्टिमधिकां कीर्तिं पृथिव्यां नृपः ॥ ८ ॥ प्रताप-प्रशस्ति ( खंडित काव्य ) । उपर्युक्त श्लोक में उल्लिखित 'मोवतखान नबाप', 'महाबतखां' का और 'शाजान', 'बादशाह शाहजहां' का सूचक है । ( २ ) देखो ऊपर पृ० ११८ । ( ३ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७ । ( ४ ) ......सवत ( संवत् ) १६८४ वर्षे वेसष ( बैशाख ) सुदि ३ राउत श्रीसिंघा अद्येह श्रीग्यासपा(पु )रग्रामे............तीर्थे वावयं । राउत सेघो (सिंघा) विजयराज्ये आभ्यन्तर वणजारा जातीय नायक गिरो...... ॥ मूल शिलालेख की नक़ल से ।
१२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महाराणा का महारावत जसवंतसिंह के समय देवलिया पर सेना भेजने का वर्णन वि० सं० १६८५ ( ई० स० १६२८ ) की घटनाओं में हुआ है, जिसका हम आगे उल्लेख करेंगे। ऐसी स्थिति में महारावत सिंहा का परलोकवास वि० सं० १६८५ ( ई० स० १६२८ ) के लगभग मानना पड़ेगा और ऐसा ही प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की तथा वहां से प्राप्त एक दूसरी पुरानी ख्यात से भी पाया जाता है¹। बड़वे की ख्यात में महारावत सिंहा के १३ राणियां और दो कुंवर जसवंतसिंह तथा जगन्नाथसिंह होने का उल्लेख है²। एक दूसरी ख्यात में महारावत की राणियां राणियों की संख्या तो उतनी ही दी है, परंतु उनके और संतति एवं उनके पिता आदि के नाम बड़वे की ख्यात से नहीं मिलते। उसके कुंवरों के नाम जसवंतसिंह, जगन्नाथ- सिंह, माधवसिंह और पुत्रियों के नाम सदाकुंवरी, राजकुंवरी³ तथा सामंत- ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ४। प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० ६। ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ४। जगन्नाथसिंह के वंशजों में नागदी का ठिकाना है। ( ३ ) तेजसुतसिंहकी सुता सो तीजी सीसोदनी ॥ व्याह्यो राजकुमारि प्रतापगढ़ लग्नकाल ॥ कर्मवती नाम एक कन्या भई ताकै पीछै, व्याह्यो जसवंत जाहि जोधपुरको नृपाल ॥ १४ ॥ वंशभास्कर; पृ० २५४६ । राजकुंवरी की बनवाई हुई बूंदी में नाहर धौस नाम की बावड़ी है। उसमें वि० सं० १७२१ वैशाख वदि १ ( ई० स० १६६४ ता० १ अप्रेल ) का निम्नलिखित शिलालेख लगा हुआ है- ......संवत १७२१ वैशाख वदि १ महाराजाधिराज हाड़ा दिवाण रावजी श्रीसत्रसाल( शत्रुसाल )जी की राणीजी श्रीसीसोदणीजी राजकुंवरिजी रावतजी श्रीसींघोजी गढ़ देवल्याको धणी तीकी बेटी नै
महारावत सिंहा १२५ कुंवरी दिये हैं१ । बूंदी राज्य के मिश्रण कवि सूर्यमल-रचित 'वंशभास्कर'- नामक वृहद् ग्रंथ से उसके गंगाकुंवरी नामक पुत्री का होना भी पाया जाता है, जिसका विवाह वहां के राव भोज के पुत्र मनोहरदास से हुआ था२ । महारावत सिंहा का अधिक इतिहास उपलब्ध नहीं होता । उसके समय के केवल नीचे लिखे दो लेख मिले हैं, जिनसे उसका समय निश्चित करने के अतिरिक्त और कुछ इतिहास प्रकट नहीं होता है— (१) वि० सं० १६७६ कार्तिक सुदि ११ (ई० स० १६२२ ता० ४ नवं- बर) सोमवार का जोशी ईसरदास के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें बहु राठोड़ तथा बहुरणी खानण का ३१ बीघा भूमि सूर्य-ग्रहण के अवसर पर दान करने का उल्लेख है३ । बाग बावड़ी करि परणाया ई राणीजी कै बेटी बाइ करमैतीजी त्या परणाइ छै गढ जोधपुर को धणी महाराजाजी श्रीजसवंतसिंघजी राठोड़ ...... । मूल शिलालेख की छाप से । (१) प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० ६ । (२) ॰॰॰क्रम दुव व्याह मनोहर के किय, तहँ प्रभु राम सुनहु जिम जे किय ॥ ६६ ॥ सीसोदनि प्रथम सिंहसुता जो गंगा अभिधान गुनजुता॰॰॰ ॥ ६७ ॥ पृ० २४३१-३२ । (३) महाराज श्रीरावत सीगाजी वचनातु जोसी इसरदास योग्य अप्रंच खेत वीगा ३१ अंके अकतीस दीदा जेरी वगत खेत वीगा ११ बहुजी राठोड़ कमल्या महे दीदा खेत वीगा २० बहुजी रणी षानण महे घर षेती रु भड़ा सो दीदो अणी वगते वीगा ३१ सुरजपरब महे दीदा उदक अघाट कर दीदां मारा वंसरो कोही कद करसी नहीं स्वदत परदत
१२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास (२) वि० स० १६८४ वैशाख सुदि ३ (ई० स० १६२७ ता० ८ अप्रेल ) का गयासपुर की चावंडी का शिलालेख, जिसमें महारावत सिंहा के समय आभ्यन्तर वणजारा जाति के नायक गिरा-द्वारा उक्त बावड़ी के बनवाये जाने का उल्लेख है १ । महारावत सिंहा नीतिमान राजा था और वह युद्ध की अपेक्षा मेल को अधिक पसंद करता था । मेवाड़ और देवलिया राज्यों की सीमा मिली हुई होने से समय-समय पर सीमा-संबंधी बखेड़े हो महारावत का व्यक्तित्व जाते थे; पर महारावत सिंहा ने बुद्धिमत्ता से कोई झगड़ा बढ़ने न दिया और मेवाड़ के महाराणाओं से मेल रख अपने राज्य की स्थिति सुदृढ़ की । उसके किसी युद्ध में भाग लेने के उदाहरण देखने में नहीं आये । उसने बादशाह जहांगीर के कोप-भाजन सरदार महावतखां को अपने यहां रखकर शरणागतवत्सलता का परिचय दिया । मुंहणोत नैणसी की ख्यात से यह अधिक पाया जाता है कि उसने सोनगरे चौहानों से ८४ गांव छीन लिये थे २ । उसने शाही दरबार से अपना संपर्क न बढ़ाया । यदि वह अन्य राजपूत नरेशों की भांति शाही दरबार से सम्बन्ध बढ़ाता, तो बहुत कुछ लाभ उठा सकता था । जसवंतसिंह महारावत सिंहा का देहांत होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र जसवंतसिंह वि० सं० १६८५ (ई० स० १६२८) के लगभग राज्य-प्राप्ति देवलिया-राज्य का स्वामी हुआ ३ । वा यो हरेत वसुंधरा षष्टी वर्ष सहस्राणी वीष्ठायां जायते करमी संवत् १६७६ वर्षे काती सुद ११ वार भोम दीने ...... । मूल ताम्रपत्र की छाप से। (१) मूललेख के लिए देखो ऊपर पृ० १२३ टि० ४ । (२) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६३ । (३) महारावत जसवंतसिंह के नाम का एक ताम्रपत्र वि० सं० १६७३ वैशाख-
महारावत जसवंतसिंह
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महारावत जसवंतसिंह १२७
बादशाह जहांगीर से वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१५) में संधि होने के पीछे उदयपुर का महाराणा अमरसिंह (प्रथम) पांच वर्ष तक उदयपुर के महाराणा जगत- जीवित रहा। उसको बादशाह से संधि करने से सिंह (प्रथम) से महारावत इतनी ग्लानि हुई कि उसने राज्य-भार अपने का विरोध होना ज्येष्ठ राजकुमार कर्णसिंह को सौंपकर एकांत- वास स्वीकार कर लिया। वि० सं० १६७६ (ई० स० १६२०) में उसका देहांत होने पर कुंवर कर्णसिंह महाराणा हुआ। उसने अपना समय देश को समृद्ध करने में लगाकर अन्य बाहरी राज्यों से छेड़-छाड़ न की। वि० सं० १६८४ कार्तिक वदि ३० (ई० स० १६२७ ता० २८ अक्टूबर) को बादशाह जहांगीर का देहांत हो गया और उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहां नाम से बादशाह हुआ। उसी वर्ष के फाल्गुन (ई० स० १६२८ मार्च) मास में महाराणा कर्णसिंह का भी परलोकवास हो गया और उसका कुंवर जगतसिंह उदयपुर राज्य का स्वामी हुआ। बादशाह जहांगीर के पिछले दिनों में शाहज़ादगी के समय खुर्रम विद्रोही होकर उदयपुर में रहा था, इसलिए महाराणा जगतसिंह (प्रथम) बादशाह शाहजहां को अपने अनुकूल समझ राज्यसिंहासन पाते ही बादशाह जहांगीर के वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) के फ़रमान के अनुसार डूंगरपुर, बांसवाड़ा और देवलिया के राज्यों को अपनी अधीनता में लाने का प्रयत्न करने लगा, किन्तु उन (डूंगरपुर, बांसवाड़ा और देवलिया के राज्यों) को महाराणा के अधीन होना स्वीकार न था, इसलिये वे अपने-
वदि ३० (ई० स० १६१६ ता० ६ अप्रेल) का मिला है, जिसमें जोशी श्रीकंठ को अरनोद गांव में ज़मीन बीघा ३५ पैंतीस मंदाकिनी पर सूर्य-ग्रहण में दान देने का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र में वैशाख वदि ३० को सोमवार लिखा है, परंतु उस दिन सोमवार नहीं, शनिवार था और सूर्य ग्रहण भी न था। ग़यासपुर की बावड़ी के वि० सं० १६८४ वैशाख सुदि ३ (ई० स० १६२७ ता० ८ अप्रेल) के शिलालेख से प्रकट है कि उस समय महारावत सिंहा विद्यमान था। ऐसी अवस्था में उस शिलालेख से ११ वर्ष पूर्व जसवंतसिंह (सिंहा का पुत्र) महारावत नहीं हो सकता एवं वार और ग्रहण का मिलान न होने से इस ताम्रपत्र की वास्तविकता में संदेह है।
१२८ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
अपने राज्यों का कुंवर कर्णसिंह के नाम फ़रमान होने के समय से ही शाही दरबार से अपना पृथक् संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। महा- रावत सिंहा के देहांत के पीछे शाहजहां के राज्य-काल में महारावत जस- वंतसिंह भी दरबार में महाबतखां¹ की प्रधानता समझ महाराणा की इच्छा के विरुद्ध चलने लगा, क्योंकि बसाड़ और अरनोद के परगने कर्णसिंह के नाम लिखे जाने से वह (जसवंतसिंह) मेवाड़वालों से प्रसन्न न था। महाराणा कर्णसिंह के समय से ही बसाड़ परगने के मोड़ी (पान- मोड़ी) गांव के थाने पर रावत जसवंतसिंह शक्तावत² (नरहरदास का पुत्र) नियत था। महारावत जसवंतसिंह ने मंदसोर के फ़ौजदार जांनिसारखां को बहकाया³ कि बसाड़ का परगना उपजाऊ है, इसलिए उसे जागीर में लिखवालो। इसपर उसने प्रयत्न कर बसाड़ के परगने का बादशाह शाह- जहां से अपने नाम फ़रमान करवा लिया, परन्तु जसवन्तसिंह शक्तावत ने
(१) इसका असली नाम ज़मानाबेग था और यह काबुल-निवासी ग़ोरबेग का पुत्र था। यह बादशाह अकबर के समय पांचसौ सवारों का मंसबदार बना और बाद- शाह जहांगीर के समय बहुत उच्च पद पर पहुंच गया था। पीछे से बादशाह की इसपर अप्रसन्नता हुई, जिससे यह कुछ समय तक इधर-उधर भटकता रहा। फिर शाहजहां के बादशाह होने पर पुनः इसे उच्च पद प्राप्त हुआ। वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में दक्षिण में इसकी मृत्यु हुई। (२) रावत जसवंतसिंह शक्तावत, उदयपुर के महाराणा उदयसिंह के पुत्र और प्रतापसिंह के छोटे भाई शक्तिसिंह का प्रपौत्र और अचलदास का पौत्र था। अचल- दास का पुत्र नरहरदास हुआ, जिसका ज्येष्ठ पुत्र जसवंतसिंह था। इसके वंशजों में मुख्य बानसी के रावत हैं, जो प्रथम वर्ग के सरदार हैं। मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में शक्तिसिंह के वंशजों का वंशवृक्ष दिया है (ख्यात; प्रथम भाग पृ० ६७)। उसमें अचलदास के पुत्रों में से केवल नारायणदास और केसरीसिंह का उल्लेख कर उनके वंशजों के ही नाम दिये हैं, परंतु बानसी ठिकाने की ख्यात से स्पष्ट है कि अचलदास के ११ पुत्र थे, जिनमें से नरहरदास उस (अचलदास) का उत्तराधिकारी हुआ। उसमें केसरीसिंह का नाम नहीं है, जो संभवतः ख्यात-लेखकों की असावधानी के कारण छूट गया हो। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७।
वहां उसका अधिकार न होने दिया। फिर जब जांनिसारखां उक्त परगने पर अधिकार करने के लिए अपनी सेना लेकर गया, उस समय महारावत जसवंतसिंह ने भी अपने राजपूत उसके साथ कर दिये। इसपर जसवंतसिंह शक्तावत मोड़ी के थाने के राजपूतों को लेकर जानिसारखां से भिड़ गया, जिसमें वह (जसवंतसिंह शक्तावत) अपने कुटुंबी कान्ह, सादूल (नरहरोत), जगमाल (वाघावत), पीथा (वाघावत) एवं पूरबिया सबलसिंह आदि सहित मारा गया और महारावत के भी कई आदमी काम आये¹। महाराणा को जांनिसारखां और महारावत जसवंतसिंह के राजपूतों के मोड़ी के थाने पर चढ़ आने और उसमें शक्तावत जसवंतसिंह के काम आने का समाचार सुनकर बड़ा क्रोध हुआ और उसने अपने मंत्री अक्षयराज² को देवलिया पर सेना लेकर जाने की आज्ञा दी³ एवं उधर बादशाह से जांनि- सारखां की ज़्यादती की शिकायत भी करवाई। जब जांनिसारखां की ज़्यादती की शिकायत बादशाह शाहजहां के पास महाराणा के वकीलों-द्वारा पेश हुई तो उसने जांनिसारखां के नाम (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७। (२) यह ओसवाल जाति के कावड़िया गोत्र के प्रसिद्ध महाजन भामाशाह का पौत्र और जीवाशाह का पुत्र था (देखो, मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ४७५, जि० २ पृ० ६६२-४)। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। नैणसी का यह भी कथन है कि महाराणा की आज्ञा पाकर अक्षयराज ससैन्य धरियावद तक पहुंच गया था, परंतु आगे नहीं बढ़ा। संभव है शाही दरबार में महारावत का पक्ष होने से देवलिया पर सेना भेज अधिकार करने में उसे बादशाह की अप्रसन्नता का भय हुआ हो; अतएव मुसाहबों के निवेदन करने पर महाराणा ने देवलिया पर सेना भेजना स्थगित रख, जांनिसारखां और महारावत की अनुचित कार्यवाही की शाही दरबार में शिकायत कर पहले बसाड़ पर अधिकार करना और फिर शक्तावत जसवंतसिंह का बदला लेने के लिए देवलिया पर सेना भेजना ठीक समझा हो। १७
१३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
·आज्ञा-पत्र भेजा कि वह बसाड़ परगने पर दख़ल न करे और महाराणा के नाम ता० १७ आज़र सन् जुलूस १ (हि० स० १०३८ ता० १२, रवी उस्सानी = वि० सं० १६८५ मार्गशीर्ष सुदि १३ = ई० स० १६२८ ता० २६ नवम्बर) को महाराणा के नाम इस आशय का फ़रमान लिखा—"हमारे अहलकारों को यह मालूम न था कि परगना बसाड़ उस(महाराणा) की अगली जागीर में शामिल है, इसलिए जांनिसारखां की जागीर में बहाल किया गया था। अब यह बात मालूम होने पर पहले के अनुसार बसाड़ · का परगना उस(महाराणा) को प्रदान किया जाता है और जांनिसारखां को दूसरी जागीर दी जावेगी। इस मामले में जांनिसारखां के नाम फ़रमान जारी हुआ है कि परगना बसाड़ उस(महाराणा) से ताल्लुक़ रखता है, इस वास्ते उसको उस(महाराणा) के क़ब्ज़े में छोड़कर इस बाबत लड़ाई-झगड़ा न करे। उस लड़ाई और फ़िसाद से जो उस(महाराणा) के आदमियों और जांनिसारखां के बीच हुआ, बादशाही लोगों को ताज्जुब हुआ। जब कि उस- (महाराणा) का काका और वकील शाही दरबार में विद्यमान थे, उचित था कि पहले इस मामले को शाही दरबार में पेश किया जाता और फिर जैसा हुक्म होता वैसा करते। विश्वास है कि उस(महाराणा) को इस कार्यवाही पर इत्तिला न होगी। मुनासिब है कि वह अपने आदमियों को तब तक रोके, जब तक कि ऐसे मामले शाही दरबार में पेश न हो जायं १।" शाही दरबार से बसाड़ के परगने पर अधिकार बनाये रखने का महाराणा ने पुनः फ़रमान लिखवाकर वहां अधिकार कर लिया, (१)·मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५८-६-। (२) बसाड़ का परगना वि० सं० १६६४ (ई० स० १६३७) तक महाराणा के अधिकार में रहा। फिर बादशाही अफ़सर पैज़ारखां (जांनिसारखां) ने महाराणा के सरदार रावत केसरीसिंह शक्तावत को मारकर वहां पर अधिकार जमाया (मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ७२)। महाराणा जगतसिंह की नीति से बादशाह शाहजहां थोड़े ही समय बाद अप्रसन्न हो गया था। उसने वि० सं० १६६४ (ई० स० १६३७) में फूलिया, जीरण, भैंसरोड, नीमच, बसाड़, सुगोर और डूंगरपुर को मेवाड़ से पृथक्
महारावत जसवन्तसिंहः १३१ महाराणा जगतसिंह का महारावत को उदयपुर में बुलाकर मरवाना । परन्तु उसके हृदय में जांनिसारखां के साथ बसाड़ पर अधिकार करने में महारावत जसवंतसिंह के अपने आदमी भेजने की बात खटकती थी । उसने इस बात को दबाकर जसवंतसिंह शक्तावत का बदला लेने के लिए महारावत को उदयपुर बुलाया । इसपर महारावत अपने ज्येष्ठ पुत्र महासिंह को साथ लेकर उदयपुर गया । महाराणा ने उसका चंपा बाग़ में मुक़ाम कर- वाया और एक दिन रात्रि के समय राठोड़ रामसिंह¹ को सेना-सहित भेजकर बाग़ पर घेरा दिलवा दिया । महारावत भी मरने-मारने का इरादा कर अपने राजपूतों के साथ महाराणा की सेना के सम्मुख हुआ और कुंवर महासिंह सहित वीरतापूर्वक युद्ध करता हुआ मारा गया² । प्रतापगढ़ राज्य की कर दिये थे (वही; पृ० ७२)। केसरीसिंह शक्तावत के लिए देखो ऊपर पृ० १२८ टिप्पण २ । (१) राठोड़ रामसिंह, जोधपुर के राव चंद्रसेन का प्रपौत्र, उग्रसेन का पौत्र और कर्मसेन का पुत्र था । वह महाराणा जगतसिंह के साथ रिश्तेदारी होने से मेवाड़ में जाकर रहा था और वहां उसे जोजावर का पट्टा जागीर में मिला था । मेवाड़ में रहते समय उसने कई युद्धों में भाग लिया था । स्वभाव का वीर होने के कारण महाराणा के दरबार में उसका अच्छा सम्मान था । महाराणा की सेवा त्यागकर बादशाह शाहजहां के चौदहवें सन् जुलूस (वि० सं० १६६७ = ई० स० १६४०) में वह शाही दरबार में जाकर मंसबदार बना । प्रारंभ में उसको एक हज़ारी ज़ात व छःसौ सवारों का मंसब मिला । फिर बढ़ते-बढ़ते शाहजहां के समय में उसका मंसब तीन हज़ार ज़ात और पंद्रह सौ सवारों तक पहुंच गया । उसने शाही सेना में रहकर कई युद्धों में पूर्ण वीरता प्रदर्शित की । वि० सं० १७१५ (ई० स० १६५८) में जब शाहजहां के पुत्रों में परस्पर कलह का सूत्रपात हुआ; तब समूनगर के युद्ध में वह शाहज़ादे दाराशिकोह के पक्ष में शाही सेना में रहकर शाहज़ादे औरंगज़ेब और मुराद के मुक़ाबले में बड़ी वीरता से युद्ध करता हुआ मुराद के तीर से मारा गया । अकाल के समय उसने क्षुधातुर लोगों को रोटियां बांटी थीं, जिससे वह 'रामसिंह रोटला' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अब बूंदी राज्य में उसके वंशजों का एक ठिकाना 'बरवादा' है । (२) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५२२ ।
१३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ख्यातों में इसका अधिक वर्णन नहीं है। वहां केवल महारावत और कुंवर महासिंह के उदयपुर में काम आने का ही उल्लेख है। कविराजा बांकीदास- कृत 'ऐतिहासिक बातें'—नामक ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि उपर्युक्त युद्ध में महारावत जसवंतसिंह की राठोड़ सुजानसिंह भगवानदासोत के हाथ मृत्यु हुई१। 'वीरविनोद' के कर्त्ता महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास ने अपने इतिहास में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है, जो इस प्रकार है— "देवलिया का जसवंतसिंह, सिंहा की गद्दी पर वि० सं० १६७६ (हि० स० १०३१=ई० स० १६२२) में बैठा था। जब वह महावतखां की तरफ़दारी से उदयपुर के हुक्म की बरखिलाफ़ी कर सरकशी करने लगा, तब कई दफ़े लिखा गया, लेकिन उसने हिमायत से जगतसिंह के हुक्म को बिलकुल न माना। महाराणा ने किसी आदमी को भेजकर तसल्ली के साथ रावत को उदयपुर बुलवाया। जसवंतसिंह के दिल में महाराणा की तरफ़ से खटका होने के कारण अपने छोटे बेटे हरिसिंह को देवलिया का कुल बंदोबस्त सौंपकर वह बड़े बेटे महासिंह तथा एक हज़ार अच्छे राजपूतों के साथ उदयपुर गया और चंपा बाग़ में डेरा किया, जो महाराणा कर्णसिंह का बनवाया हुआ शहर से एक मील के फ़ासले पर पूर्व की तरफ़ है। जसवंतसिंह को महाराणा ने यहां की फ़र्मांबर्दारी के ख़िलाफ़ न रहने की बाबत बहुतसी नसीहत की, लेकिन उसके दिल में महावतखां की हिमायत का ज़ोर भरा हुआ था, जिससे महाराणा की मनशा से ख़िलाफ़ जवाब दिया। महाराणा ने अपने सलाहकारों से पूछा तो सबने अर्ज़ की कि यदि जसवंतसिंह यहां से चला गया तो आपकी हुकूमत से बिल्कुल अलहदा हो जावेगा। तब महाराणा ने अपने सलाहकारों के कहने पर अमल करके अपने बड़प्पन को बट्टा लगानेवाली बात यानी जसवंतसिंह को मार डालना इख़्तियार किया। "महाराणा को मुनासिब था कि जसवंतसिंह को अपने यहां से विदा (१) संख्या, ३३७।
करके देवलिया पर फ़ौज भेजते, लेकिन उन्होंने धोखे के साथ कार्रवाई की और रामसिंह राठोड़ को फ़ौज देकर आधी रात के वक़्त चंपा बाग़ में महा- रावत को घेर लेने का हुक्म दिया । रामसिंह ने वैसा ही किया। जसंवतसिंह मय अपने कुंवर महासिंह व एक हज़ार राजपूतों के अच्छी तरह लड़कर मारा गया । महाराणा के बहुत से राजपूत काम आये । यह झगड़ा विक्रमी १६८५ ( हि० १०३८ = ई० १६२८ ) में हुआ¹ ।” ‘वीरविनोद’ के ग्यारहवें प्रकरण में प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रसङ्ग में उक्त कविराजा ने इस घटना पर अधिक प्रकाश डालकर लिखा है— “बादशाह ने जांनिसारखां को लिख भेजा कि परगने बसाड़ पर दख़ल न करे । शाहजहां जानता था कि कैसी-कैसी ताक़त काम में लाने पर महा- राणा उदयपुर का फ़साद दूर हुआ है । अब छोटी बात के लिए उसी आग को भड़काना अक़्लमंदी का काम नहीं। इसके सिवाय बादशाह का भी शुरू तख़्तनशीनी का अहद था। इसलिए जांनिसारखां को धमकाया और महाराणा को नसीहतों का फ़रमान लिख भेजा, परंतु देवलिया के रावत जसवतसिंह से महाराणा बहुत नाराज़ रहे और उससे जसंवतसिंह शक्तावत का बदला लेना चाहा । महाबतखां की हिमायत के सबब महाराणा को देवलिया पर फ़ौजकशी करने का मौक़ा न मिला । तब धीरे-धीरे रावत जसवतसिंह को धोखा दिया और विक्रमी १६६० (?) [ हि० १०४३ = ई० १६३३ ] में उसे मय उसके बेटे महासिंह के उदयपुर बुलाया । उसे पूरा विश्वास नहीं था, इससे वह एक हज़ार चुने हुए राजपूत साथ ले गया और चंपा बाग़ में डेरा किया। राठोड़ रामसिंह कर्मसेनोत को, जो महाराणा की बहिन का बेटा था, महा- राणा ने रात के वक़्त फ़ौज देकर भेजा । उसने चम्पाबाग़ पर घेरा डाला और तोपें व सोकड़ों² की गाड़ियां मोर्चों पर जमा दीं । रावत जसवतसिंह
( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१८-६ । ( २ ) इन गाड़ियों में गोली बारूद से भरी हुई बंदूकें रहती थीं, जिनकी संख्या सौ तथा दो सौ तक भी होती थी । जब शत्रु-सैन्य से लड़ाई का अवसर होता, उस समय चारों तरफ़ से घेरा डालने के लिए ऐसी गाड़ियां खड़ी करदी जातीं
१३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास केसरिया पोशाक के साथ सिर पर सेहरा और तुलसी की मंजरी लगाकर चंपा बाग़ से बाहर निकला और अपने साथियों-सहित महाराणा की फ़ौज पर टूट पड़ा, परंतु तोप और सोकड़ें की गाड़ियों के कारण सबके सब भुन गये, तो भी किसी-किसी ने रामसिंह को ललकारा और तलवारें चलाईं । आखिरकार महारावत जसंवंतसिंह अपने बेटे महासिंह और एक हज़ार राजपूतों-सहित बहादुरी के साथ मारा गया और महाराणा की इस दग़ादिली से बड़ी बदनामी हुई १ ।” 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्ता कवि गंगाराम इस युद्ध का विचित्र प्रकार से वर्णन करता है। उसका कथन है—“महारावत जसंवंतसिंह महा- राणा जगतसिंह के दरबार में आधे सिंहासन पर बैठा हुआ था, उस समय कुछ सरदारों ने जसंवंतसिंह को नज़राना कर दिया, जिससे महाराणा क्रुद्ध हो गया और महारावत को मारने की गुप्त मन्त्रणा कर उसने राठोड़ रामसिंह को इस काम के लिए नियत किया । महाराणा की आज्ञा पाकर रामसिंह देवलिया की तरफ़ विदा हुआ और उसने गुप्त रूप से देवलिया जाने का मार्ग रोक दिया । महारावत भी देवलिया जाने को आगे बढ़ा और मार्ग में रामसिंह को लड़ने के लिए उद्यत देख विश्वासघाती जान उसने उससे युद्ध न किया; किंतु कुंवर महासिंह के साथ उस (रामसिंह) का युद्ध हुआ, जिसमें वह (रामसिंह) परास्त हुआ । इसपर महाराणा ने अप्रसन्न होकर रामसिंह को अपने यहां से निकाल दिया २ ।” और उनमें क्रमानुसार बंदूकें इस प्रकार सटी हुई रहती थीं कि एक बार बत्ती लगाने पर सब बंदूकें एक साथ चल जायं । इन बंदूकों से निकली हुई गोलियां दूर-दूर तक जाकर शत्रु-सैन्य को विदलित करती हुई अधिकांशतः उन्हें नष्ट कर देती थीं । ( वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६० ) । ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६० । ( २ ) एकस्मिन् समये रराज विलसन् राणासभायां नृपः कान्त्या भूमिभृतोऽपरानधरयंस्तस्यार्धसिंहासने ।
महारावत जसवन्तसिंह १३५ 'प्रतापगढ़ राज्य की ख्यात'१, बांकीदास-कृत 'ऐतिहासिक बातें'२, नानादेशनिवासिनां क्षितिभृतां भृत्यैश्च मुख्यैर्यदा नत्वोपायनमग्रतो विनिहितं श्रीदेवलेन्द्रप्रभोः ॥ ३ ॥ दृष्ट्वा क्रोधहुताशने निपतितः श्रीचित्रकूटाधिपोऽ- प्येतत्कर्णसूतो बभूव बलिनां कर्णेषु कर्णेजपः । वीरः कोऽपि ममास्ति सांप्रतममुं यो हन्ति मध्येसभं विश्वासेन समुत्थितोऽनुचितकृद्रामः स्वयं सज्जितः ॥ ४ ॥ दत्ताज्ञोऽथ जगाम देवलपुरं पन्थानमग्रे ततो बध्वा चोरसखश्च रामनृपतिर्विश्वांसघातोत्सुकः । दृष्ट्वा श्रीजसवंतमागतमयं खङ्गैकमित्रं रणे निस्त्रिंशैः प्रतिबोधयन्सचकितः संप्राप तस्यान्तिकम् ॥ ५ ॥ संख्यं तत्र तयोर्भून्मिलितयोरन्योन्यमत्यद्भुतं वीराणां तदनन्तरं कथमिदं को वेति कस्यासि रे । भूयः श्रीजसवंतसिंहविभूनेत्येक्तुं तदोवाचसः कुत्तो राणनृपोऽहमस्मि सुभटो रामोऽरिहिंसाग्रणीः ॥ ६ ॥ संग्रामे किल भारते बहुतरं कृत्वा रणं वीर्यवान् गाङ्गेयो विरराम चार्जुनमपि दृष्ट्वा शिखण्डान्वितम् । खड्गेनैव हतं हि रे तव यशस्तत्सानुमया सङ्गरे विश्वासोपहतस्य दुर्मुख मुखं नालोकनीयं च ते ॥ ७ ॥ पश्चान्माहकुमारकेण बहुभिर्विक्रान्तमन्तर्लस- न्मानेन प्रभुणा भटैरथ तदा भग्नः स रामः स्वयम् । तच्छ्रुत्वाऽऽशु चुकोप राणनृपतिर्निष्कासयामास तं देशानम्लेच्छपुरेषु खेलतितरामद्याप्यगस्तीशवत् ॥ ८ ॥ सर्ग ८ । ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ७ । ( २ ) संख्या ३३७, १११५, १४६६-१६०१ ।
३. महाराणा कुम्भा (विजय स्तम्भ व दुर्ग निर्माण)
१३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास 'वीरविनोद'१, 'मालकम की रिपोर्ट'२, एवं 'प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियरों'३, आदि में महारावत जसवंतसिंह का उदयपुर में महाराणा जगतसिंह की सेना से लड़कर मारे जाने का उल्लेख है, जिसका समर्थन नैणसी की ख्यात से भी होता है४, जो उपर्युक्त पुस्तकों में अधिक प्राचीन और महारावत हरिसिंह के समय की संगृहीत है। इनके अतिरिक्त 'अमरकाव्य'५ और 'राजप्रशस्ति महाकाव्य'६ में भी उसके महाराणा राजसिंह से लड़कर मारे (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१८-६ और १०६० । (२) सर जॉन मालकम; रिपोर्ट ऑन दि प्रॉविन्स ऑव् मालवा एंड एड्ज्वान्- निंग डिस्ट्रिक्ट्स; पृ० २२४ । (३) कैप्टन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६८ । (४) प्रथम भाग, पृ० ६६ । (५) पूर्णे षोडशके शते च उदिते पंचाग्रकाशीतिके राणोक्त्योत्कटरामसिंह इति यो राठोडचूडामणिः । प्रोद्दंडं जसवंतरावतपरं कुंतैर्जघान द्रुतं वीरं देवलियाप(तिं) किल महासिंहाख्यपुत्रान्वितं ॥ तदनुदेवलियानगरस्य वा समररंगनटैश्च महाभटैः ॥ रचितमेव विखंडनमंजसा जनगणैश्च विलुंटनमुत्कटैः ॥ स रामसिंहो जसवंतसंज्ञं तं रावतं पुत्रयुतं निहत्य । चक्रे जगत्सिंहनृपस्य तोषं संतोषपोषं समवाप तस्मात् ॥ अमर काव्य । (६) जगत्सिंहाज्ञया यातो राठोडोरामसिंहकः । प्रतिदेवलियां सेनायुक्तो रावतमुद्भटं ॥ २० ॥ जसवन्तं मानसिंहपुत्रयुक्तं जघान सः । पुर्यां देवलियायां च लुंटनं रचितं जनैः ॥ २१ ॥ सर्ग पांचवां । राजप्रशस्ति महाकाव्य में कुंवर मानसिंह के महारावत जसवन्तसिंह के साथ