राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंवहां उसका अधिकार न होने दिया। फिर जब जांनिसारखां उक्त परगने पर अधिकार करने के लिए अपनी सेना लेकर गया, उस समय महारावत जसवंतसिंह ने भी अपने राजपूत उसके साथ कर दिये। इसपर जसवंतसिंह शक्तावत मोड़ी के थाने के राजपूतों को लेकर जानिसारखां से भिड़ गया, जिसमें वह (जसवंतसिंह शक्तावत) अपने कुटुंबी कान्ह, सादूल (नरहरोत), जगमाल (वाघावत), पीथा (वाघावत) एवं पूरबिया सबलसिंह आदि सहित मारा गया और महारावत के भी कई आदमी काम आये¹। महाराणा को जांनिसारखां और महारावत जसवंतसिंह के राजपूतों के मोड़ी के थाने पर चढ़ आने और उसमें शक्तावत जसवंतसिंह के काम आने का समाचार सुनकर बड़ा क्रोध हुआ और उसने अपने मंत्री अक्षयराज² को देवलिया पर सेना लेकर जाने की आज्ञा दी³ एवं उधर बादशाह से जांनि- सारखां की ज़्यादती की शिकायत भी करवाई। जब जांनिसारखां की ज़्यादती की शिकायत बादशाह शाहजहां के पास महाराणा के वकीलों-द्वारा पेश हुई तो उसने जांनिसारखां के नाम (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७। (२) यह ओसवाल जाति के कावड़िया गोत्र के प्रसिद्ध महाजन भामाशाह का पौत्र और जीवाशाह का पुत्र था (देखो, मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ४७५, जि० २ पृ० ६६२-४)। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। नैणसी का यह भी कथन है कि महाराणा की आज्ञा पाकर अक्षयराज ससैन्य धरियावद तक पहुंच गया था, परंतु आगे नहीं बढ़ा। संभव है शाही दरबार में महारावत का पक्ष होने से देवलिया पर सेना भेज अधिकार करने में उसे बादशाह की अप्रसन्नता का भय हुआ हो; अतएव मुसाहबों के निवेदन करने पर महाराणा ने देवलिया पर सेना भेजना स्थगित रख, जांनिसारखां और महारावत की अनुचित कार्यवाही की शाही दरबार में शिकायत कर पहले बसाड़ पर अधिकार करना और फिर शक्तावत जसवंतसिंह का बदला लेने के लिए देवलिया पर सेना भेजना ठीक समझा हो। १७