राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
·आज्ञा-पत्र भेजा कि वह बसाड़ परगने पर दख़ल न करे और महाराणा के नाम ता० १७ आज़र सन् जुलूस १ (हि० स० १०३८ ता० १२, रवी उस्सानी = वि० सं० १६८५ मार्गशीर्ष सुदि १३ = ई० स० १६२८ ता० २६ नवम्बर) को महाराणा के नाम इस आशय का फ़रमान लिखा—"हमारे अहलकारों को यह मालूम न था कि परगना बसाड़ उस(महाराणा) की अगली जागीर में शामिल है, इसलिए जांनिसारखां की जागीर में बहाल किया गया था। अब यह बात मालूम होने पर पहले के अनुसार बसाड़ · का परगना उस(महाराणा) को प्रदान किया जाता है और जांनिसारखां को दूसरी जागीर दी जावेगी। इस मामले में जांनिसारखां के नाम फ़रमान जारी हुआ है कि परगना बसाड़ उस(महाराणा) से ताल्लुक़ रखता है, इस वास्ते उसको उस(महाराणा) के क़ब्ज़े में छोड़कर इस बाबत लड़ाई-झगड़ा न करे। उस लड़ाई और फ़िसाद से जो उस(महाराणा) के आदमियों और जांनिसारखां के बीच हुआ, बादशाही लोगों को ताज्जुब हुआ। जब कि उस- (महाराणा) का काका और वकील शाही दरबार में विद्यमान थे, उचित था कि पहले इस मामले को शाही दरबार में पेश किया जाता और फिर जैसा हुक्म होता वैसा करते। विश्वास है कि उस(महाराणा) को इस कार्यवाही पर इत्तिला न होगी। मुनासिब है कि वह अपने आदमियों को तब तक रोके, जब तक कि ऐसे मामले शाही दरबार में पेश न हो जायं १।" शाही दरबार से बसाड़ के परगने पर अधिकार बनाये रखने का महाराणा ने पुनः फ़रमान लिखवाकर वहां अधिकार कर लिया, (१)·मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५८-६-। (२) बसाड़ का परगना वि० सं० १६६४ (ई० स० १६३७) तक महाराणा के अधिकार में रहा। फिर बादशाही अफ़सर पैज़ारखां (जांनिसारखां) ने महाराणा के सरदार रावत केसरीसिंह शक्तावत को मारकर वहां पर अधिकार जमाया (मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ७२)। महाराणा जगतसिंह की नीति से बादशाह शाहजहां थोड़े ही समय बाद अप्रसन्न हो गया था। उसने वि० सं० १६६४ (ई० स० १६३७) में फूलिया, जीरण, भैंसरोड, नीमच, बसाड़, सुगोर और डूंगरपुर को मेवाड़ से पृथक्