राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत जसवन्तसिंहः १३१ महाराणा जगतसिंह का महारावत को उदयपुर में बुलाकर मरवाना । परन्तु उसके हृदय में जांनिसारखां के साथ बसाड़ पर अधिकार करने में महारावत जसवंतसिंह के अपने आदमी भेजने की बात खटकती थी । उसने इस बात को दबाकर जसवंतसिंह शक्तावत का बदला लेने के लिए महारावत को उदयपुर बुलाया । इसपर महारावत अपने ज्येष्ठ पुत्र महासिंह को साथ लेकर उदयपुर गया । महाराणा ने उसका चंपा बाग़ में मुक़ाम कर- वाया और एक दिन रात्रि के समय राठोड़ रामसिंह¹ को सेना-सहित भेजकर बाग़ पर घेरा दिलवा दिया । महारावत भी मरने-मारने का इरादा कर अपने राजपूतों के साथ महाराणा की सेना के सम्मुख हुआ और कुंवर महासिंह सहित वीरतापूर्वक युद्ध करता हुआ मारा गया² । प्रतापगढ़ राज्य की कर दिये थे (वही; पृ० ७२)। केसरीसिंह शक्तावत के लिए देखो ऊपर पृ० १२८ टिप्पण २ । (१) राठोड़ रामसिंह, जोधपुर के राव चंद्रसेन का प्रपौत्र, उग्रसेन का पौत्र और कर्मसेन का पुत्र था । वह महाराणा जगतसिंह के साथ रिश्तेदारी होने से मेवाड़ में जाकर रहा था और वहां उसे जोजावर का पट्टा जागीर में मिला था । मेवाड़ में रहते समय उसने कई युद्धों में भाग लिया था । स्वभाव का वीर होने के कारण महाराणा के दरबार में उसका अच्छा सम्मान था । महाराणा की सेवा त्यागकर बादशाह शाहजहां के चौदहवें सन् जुलूस (वि० सं० १६६७ = ई० स० १६४०) में वह शाही दरबार में जाकर मंसबदार बना । प्रारंभ में उसको एक हज़ारी ज़ात व छःसौ सवारों का मंसब मिला । फिर बढ़ते-बढ़ते शाहजहां के समय में उसका मंसब तीन हज़ार ज़ात और पंद्रह सौ सवारों तक पहुंच गया । उसने शाही सेना में रहकर कई युद्धों में पूर्ण वीरता प्रदर्शित की । वि० सं० १७१५ (ई० स० १६५८) में जब शाहजहां के पुत्रों में परस्पर कलह का सूत्रपात हुआ; तब समूनगर के युद्ध में वह शाहज़ादे दाराशिकोह के पक्ष में शाही सेना में रहकर शाहज़ादे औरंगज़ेब और मुराद के मुक़ाबले में बड़ी वीरता से युद्ध करता हुआ मुराद के तीर से मारा गया । अकाल के समय उसने क्षुधातुर लोगों को रोटियां बांटी थीं, जिससे वह 'रामसिंह रोटला' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अब बूंदी राज्य में उसके वंशजों का एक ठिकाना 'बरवादा' है । (२) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५२२ ।