राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ख्यातों में इसका अधिक वर्णन नहीं है। वहां केवल महारावत और कुंवर महासिंह के उदयपुर में काम आने का ही उल्लेख है। कविराजा बांकीदास- कृत 'ऐतिहासिक बातें'—नामक ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि उपर्युक्त युद्ध में महारावत जसवंतसिंह की राठोड़ सुजानसिंह भगवानदासोत के हाथ मृत्यु हुई१। 'वीरविनोद' के कर्त्ता महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास ने अपने इतिहास में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है, जो इस प्रकार है— "देवलिया का जसवंतसिंह, सिंहा की गद्दी पर वि० सं० १६७६ (हि० स० १०३१=ई० स० १६२२) में बैठा था। जब वह महावतखां की तरफ़दारी से उदयपुर के हुक्म की बरखिलाफ़ी कर सरकशी करने लगा, तब कई दफ़े लिखा गया, लेकिन उसने हिमायत से जगतसिंह के हुक्म को बिलकुल न माना। महाराणा ने किसी आदमी को भेजकर तसल्ली के साथ रावत को उदयपुर बुलवाया। जसवंतसिंह के दिल में महाराणा की तरफ़ से खटका होने के कारण अपने छोटे बेटे हरिसिंह को देवलिया का कुल बंदोबस्त सौंपकर वह बड़े बेटे महासिंह तथा एक हज़ार अच्छे राजपूतों के साथ उदयपुर गया और चंपा बाग़ में डेरा किया, जो महाराणा कर्णसिंह का बनवाया हुआ शहर से एक मील के फ़ासले पर पूर्व की तरफ़ है। जसवंतसिंह को महाराणा ने यहां की फ़र्मांबर्दारी के ख़िलाफ़ न रहने की बाबत बहुतसी नसीहत की, लेकिन उसके दिल में महावतखां की हिमायत का ज़ोर भरा हुआ था, जिससे महाराणा की मनशा से ख़िलाफ़ जवाब दिया। महाराणा ने अपने सलाहकारों से पूछा तो सबने अर्ज़ की कि यदि जसवंतसिंह यहां से चला गया तो आपकी हुकूमत से बिल्कुल अलहदा हो जावेगा। तब महाराणा ने अपने सलाहकारों के कहने पर अमल करके अपने बड़प्पन को बट्टा लगानेवाली बात यानी जसवंतसिंह को मार डालना इख़्तियार किया। "महाराणा को मुनासिब था कि जसवंतसिंह को अपने यहां से विदा (१) संख्या, ३३७।