राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरके देवलिया पर फ़ौज भेजते, लेकिन उन्होंने धोखे के साथ कार्रवाई की और रामसिंह राठोड़ को फ़ौज देकर आधी रात के वक़्त चंपा बाग़ में महा- रावत को घेर लेने का हुक्म दिया । रामसिंह ने वैसा ही किया। जसंवतसिंह मय अपने कुंवर महासिंह व एक हज़ार राजपूतों के अच्छी तरह लड़कर मारा गया । महाराणा के बहुत से राजपूत काम आये । यह झगड़ा विक्रमी १६८५ ( हि० १०३८ = ई० १६२८ ) में हुआ¹ ।” ‘वीरविनोद’ के ग्यारहवें प्रकरण में प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रसङ्ग में उक्त कविराजा ने इस घटना पर अधिक प्रकाश डालकर लिखा है— “बादशाह ने जांनिसारखां को लिख भेजा कि परगने बसाड़ पर दख़ल न करे । शाहजहां जानता था कि कैसी-कैसी ताक़त काम में लाने पर महा- राणा उदयपुर का फ़साद दूर हुआ है । अब छोटी बात के लिए उसी आग को भड़काना अक़्लमंदी का काम नहीं। इसके सिवाय बादशाह का भी शुरू तख़्तनशीनी का अहद था। इसलिए जांनिसारखां को धमकाया और महाराणा को नसीहतों का फ़रमान लिख भेजा, परंतु देवलिया के रावत जसवतसिंह से महाराणा बहुत नाराज़ रहे और उससे जसंवतसिंह शक्तावत का बदला लेना चाहा । महाबतखां की हिमायत के सबब महाराणा को देवलिया पर फ़ौजकशी करने का मौक़ा न मिला । तब धीरे-धीरे रावत जसवतसिंह को धोखा दिया और विक्रमी १६६० (?) [ हि० १०४३ = ई० १६३३ ] में उसे मय उसके बेटे महासिंह के उदयपुर बुलाया । उसे पूरा विश्वास नहीं था, इससे वह एक हज़ार चुने हुए राजपूत साथ ले गया और चंपा बाग़ में डेरा किया। राठोड़ रामसिंह कर्मसेनोत को, जो महाराणा की बहिन का बेटा था, महा- राणा ने रात के वक़्त फ़ौज देकर भेजा । उसने चम्पाबाग़ पर घेरा डाला और तोपें व सोकड़ों² की गाड़ियां मोर्चों पर जमा दीं । रावत जसवतसिंह
( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१८-६ । ( २ ) इन गाड़ियों में गोली बारूद से भरी हुई बंदूकें रहती थीं, जिनकी संख्या सौ तथा दो सौ तक भी होती थी । जब शत्रु-सैन्य से लड़ाई का अवसर होता, उस समय चारों तरफ़ से घेरा डालने के लिए ऐसी गाड़ियां खड़ी करदी जातीं