राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास केसरिया पोशाक के साथ सिर पर सेहरा और तुलसी की मंजरी लगाकर चंपा बाग़ से बाहर निकला और अपने साथियों-सहित महाराणा की फ़ौज पर टूट पड़ा, परंतु तोप और सोकड़ें की गाड़ियों के कारण सबके सब भुन गये, तो भी किसी-किसी ने रामसिंह को ललकारा और तलवारें चलाईं । आखिरकार महारावत जसंवंतसिंह अपने बेटे महासिंह और एक हज़ार राजपूतों-सहित बहादुरी के साथ मारा गया और महाराणा की इस दग़ादिली से बड़ी बदनामी हुई १ ।” 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्ता कवि गंगाराम इस युद्ध का विचित्र प्रकार से वर्णन करता है। उसका कथन है—“महारावत जसंवंतसिंह महा- राणा जगतसिंह के दरबार में आधे सिंहासन पर बैठा हुआ था, उस समय कुछ सरदारों ने जसंवंतसिंह को नज़राना कर दिया, जिससे महाराणा क्रुद्ध हो गया और महारावत को मारने की गुप्त मन्त्रणा कर उसने राठोड़ रामसिंह को इस काम के लिए नियत किया । महाराणा की आज्ञा पाकर रामसिंह देवलिया की तरफ़ विदा हुआ और उसने गुप्त रूप से देवलिया जाने का मार्ग रोक दिया । महारावत भी देवलिया जाने को आगे बढ़ा और मार्ग में रामसिंह को लड़ने के लिए उद्यत देख विश्वासघाती जान उसने उससे युद्ध न किया; किंतु कुंवर महासिंह के साथ उस (रामसिंह) का युद्ध हुआ, जिसमें वह (रामसिंह) परास्त हुआ । इसपर महाराणा ने अप्रसन्न होकर रामसिंह को अपने यहां से निकाल दिया २ ।” और उनमें क्रमानुसार बंदूकें इस प्रकार सटी हुई रहती थीं कि एक बार बत्ती लगाने पर सब बंदूकें एक साथ चल जायं । इन बंदूकों से निकली हुई गोलियां दूर-दूर तक जाकर शत्रु-सैन्य को विदलित करती हुई अधिकांशतः उन्हें नष्ट कर देती थीं । ( वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६० ) । ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६० । ( २ ) एकस्मिन् समये रराज विलसन् राणासभायां नृपः कान्त्या भूमिभृतोऽपरानधरयंस्तस्यार्धसिंहासने ।