राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
अपने राज्यों का कुंवर कर्णसिंह के नाम फ़रमान होने के समय से ही शाही दरबार से अपना पृथक् संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। महा- रावत सिंहा के देहांत के पीछे शाहजहां के राज्य-काल में महारावत जस- वंतसिंह भी दरबार में महाबतखां¹ की प्रधानता समझ महाराणा की इच्छा के विरुद्ध चलने लगा, क्योंकि बसाड़ और अरनोद के परगने कर्णसिंह के नाम लिखे जाने से वह (जसवंतसिंह) मेवाड़वालों से प्रसन्न न था। महाराणा कर्णसिंह के समय से ही बसाड़ परगने के मोड़ी (पान- मोड़ी) गांव के थाने पर रावत जसवंतसिंह शक्तावत² (नरहरदास का पुत्र) नियत था। महारावत जसवंतसिंह ने मंदसोर के फ़ौजदार जांनिसारखां को बहकाया³ कि बसाड़ का परगना उपजाऊ है, इसलिए उसे जागीर में लिखवालो। इसपर उसने प्रयत्न कर बसाड़ के परगने का बादशाह शाह- जहां से अपने नाम फ़रमान करवा लिया, परन्तु जसवन्तसिंह शक्तावत ने
(१) इसका असली नाम ज़मानाबेग था और यह काबुल-निवासी ग़ोरबेग का पुत्र था। यह बादशाह अकबर के समय पांचसौ सवारों का मंसबदार बना और बाद- शाह जहांगीर के समय बहुत उच्च पद पर पहुंच गया था। पीछे से बादशाह की इसपर अप्रसन्नता हुई, जिससे यह कुछ समय तक इधर-उधर भटकता रहा। फिर शाहजहां के बादशाह होने पर पुनः इसे उच्च पद प्राप्त हुआ। वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में दक्षिण में इसकी मृत्यु हुई। (२) रावत जसवंतसिंह शक्तावत, उदयपुर के महाराणा उदयसिंह के पुत्र और प्रतापसिंह के छोटे भाई शक्तिसिंह का प्रपौत्र और अचलदास का पौत्र था। अचल- दास का पुत्र नरहरदास हुआ, जिसका ज्येष्ठ पुत्र जसवंतसिंह था। इसके वंशजों में मुख्य बानसी के रावत हैं, जो प्रथम वर्ग के सरदार हैं। मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में शक्तिसिंह के वंशजों का वंशवृक्ष दिया है (ख्यात; प्रथम भाग पृ० ६७)। उसमें अचलदास के पुत्रों में से केवल नारायणदास और केसरीसिंह का उल्लेख कर उनके वंशजों के ही नाम दिये हैं, परंतु बानसी ठिकाने की ख्यात से स्पष्ट है कि अचलदास के ११ पुत्र थे, जिनमें से नरहरदास उस (अचलदास) का उत्तराधिकारी हुआ। उसमें केसरीसिंह का नाम नहीं है, जो संभवतः ख्यात-लेखकों की असावधानी के कारण छूट गया हो। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७।