राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
DevanagariHindipublished534 पृष्ठ
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महारावत जसवंतसिंह १२७
बादशाह जहांगीर से वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१५) में संधि होने के पीछे उदयपुर का महाराणा अमरसिंह (प्रथम) पांच वर्ष तक उदयपुर के महाराणा जगत- जीवित रहा। उसको बादशाह से संधि करने से सिंह (प्रथम) से महारावत इतनी ग्लानि हुई कि उसने राज्य-भार अपने का विरोध होना ज्येष्ठ राजकुमार कर्णसिंह को सौंपकर एकांत- वास स्वीकार कर लिया। वि० सं० १६७६ (ई० स० १६२०) में उसका देहांत होने पर कुंवर कर्णसिंह महाराणा हुआ। उसने अपना समय देश को समृद्ध करने में लगाकर अन्य बाहरी राज्यों से छेड़-छाड़ न की। वि० सं० १६८४ कार्तिक वदि ३० (ई० स० १६२७ ता० २८ अक्टूबर) को बादशाह जहांगीर का देहांत हो गया और उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहां नाम से बादशाह हुआ। उसी वर्ष के फाल्गुन (ई० स० १६२८ मार्च) मास में महाराणा कर्णसिंह का भी परलोकवास हो गया और उसका कुंवर जगतसिंह उदयपुर राज्य का स्वामी हुआ। बादशाह जहांगीर के पिछले दिनों में शाहज़ादगी के समय खुर्रम विद्रोही होकर उदयपुर में रहा था, इसलिए महाराणा जगतसिंह (प्रथम) बादशाह शाहजहां को अपने अनुकूल समझ राज्यसिंहासन पाते ही बादशाह जहांगीर के वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) के फ़रमान के अनुसार डूंगरपुर, बांसवाड़ा और देवलिया के राज्यों को अपनी अधीनता में लाने का प्रयत्न करने लगा, किन्तु उन (डूंगरपुर, बांसवाड़ा और देवलिया के राज्यों) को महाराणा के अधीन होना स्वीकार न था, इसलिये वे अपने-
वदि ३० (ई० स० १६१६ ता० ६ अप्रेल) का मिला है, जिसमें जोशी श्रीकंठ को अरनोद गांव में ज़मीन बीघा ३५ पैंतीस मंदाकिनी पर सूर्य-ग्रहण में दान देने का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र में वैशाख वदि ३० को सोमवार लिखा है, परंतु उस दिन सोमवार नहीं, शनिवार था और सूर्य ग्रहण भी न था। ग़यासपुर की बावड़ी के वि० सं० १६८४ वैशाख सुदि ३ (ई० स० १६२७ ता० ८ अप्रेल) के शिलालेख से प्रकट है कि उस समय महारावत सिंहा विद्यमान था। ऐसी अवस्था में उस शिलालेख से ११ वर्ष पूर्व जसवंतसिंह (सिंहा का पुत्र) महारावत नहीं हो सकता एवं वार और ग्रहण का मिलान न होने से इस ताम्रपत्र की वास्तविकता में संदेह है।