भारतकोश
संग्रह पर लौटें

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

महारावत जसवंतसिंह १२७

बादशाह जहांगीर से वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१५) में संधि होने के पीछे उदयपुर का महाराणा अमरसिंह (प्रथम) पांच वर्ष तक उदयपुर के महाराणा जगत- जीवित रहा। उसको बादशाह से संधि करने से सिंह (प्रथम) से महारावत इतनी ग्लानि हुई कि उसने राज्य-भार अपने का विरोध होना ज्येष्ठ राजकुमार कर्णसिंह को सौंपकर एकांत- वास स्वीकार कर लिया। वि० सं० १६७६ (ई० स० १६२०) में उसका देहांत होने पर कुंवर कर्णसिंह महाराणा हुआ। उसने अपना समय देश को समृद्ध करने में लगाकर अन्य बाहरी राज्यों से छेड़-छाड़ न की। वि० सं० १६८४ कार्तिक वदि ३० (ई० स० १६२७ ता० २८ अक्टूबर) को बादशाह जहांगीर का देहांत हो गया और उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहां नाम से बादशाह हुआ। उसी वर्ष के फाल्गुन (ई० स० १६२८ मार्च) मास में महाराणा कर्णसिंह का भी परलोकवास हो गया और उसका कुंवर जगतसिंह उदयपुर राज्य का स्वामी हुआ। बादशाह जहांगीर के पिछले दिनों में शाहज़ादगी के समय खुर्रम विद्रोही होकर उदयपुर में रहा था, इसलिए महाराणा जगतसिंह (प्रथम) बादशाह शाहजहां को अपने अनुकूल समझ राज्यसिंहासन पाते ही बादशाह जहांगीर के वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) के फ़रमान के अनुसार डूंगरपुर, बांसवाड़ा और देवलिया के राज्यों को अपनी अधीनता में लाने का प्रयत्न करने लगा, किन्तु उन (डूंगरपुर, बांसवाड़ा और देवलिया के राज्यों) को महाराणा के अधीन होना स्वीकार न था, इसलिये वे अपने-

वदि ३० (ई० स० १६१६ ता० ६ अप्रेल) का मिला है, जिसमें जोशी श्रीकंठ को अरनोद गांव में ज़मीन बीघा ३५ पैंतीस मंदाकिनी पर सूर्य-ग्रहण में दान देने का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र में वैशाख वदि ३० को सोमवार लिखा है, परंतु उस दिन सोमवार नहीं, शनिवार था और सूर्य ग्रहण भी न था। ग़यासपुर की बावड़ी के वि० सं० १६८४ वैशाख सुदि ३ (ई० स० १६२७ ता० ८ अप्रेल) के शिलालेख से प्रकट है कि उस समय महारावत सिंहा विद्यमान था। ऐसी अवस्था में उस शिलालेख से ११ वर्ष पूर्व जसवंतसिंह (सिंहा का पुत्र) महारावत नहीं हो सकता एवं वार और ग्रहण का मिलान न होने से इस ताम्रपत्र की वास्तविकता में संदेह है।

१२८ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

अपने राज्यों का कुंवर कर्णसिंह के नाम फ़रमान होने के समय से ही शाही दरबार से अपना पृथक् संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। महा- रावत सिंहा के देहांत के पीछे शाहजहां के राज्य-काल में महारावत जस- वंतसिंह भी दरबार में महाबतखां¹ की प्रधानता समझ महाराणा की इच्छा के विरुद्ध चलने लगा, क्योंकि बसाड़ और अरनोद के परगने कर्णसिंह के नाम लिखे जाने से वह (जसवंतसिंह) मेवाड़वालों से प्रसन्न न था। महाराणा कर्णसिंह के समय से ही बसाड़ परगने के मोड़ी (पान- मोड़ी) गांव के थाने पर रावत जसवंतसिंह शक्तावत² (नरहरदास का पुत्र) नियत था। महारावत जसवंतसिंह ने मंदसोर के फ़ौजदार जांनिसारखां को बहकाया³ कि बसाड़ का परगना उपजाऊ है, इसलिए उसे जागीर में लिखवालो। इसपर उसने प्रयत्न कर बसाड़ के परगने का बादशाह शाह- जहां से अपने नाम फ़रमान करवा लिया, परन्तु जसवन्तसिंह शक्तावत ने


(१) इसका असली नाम ज़मानाबेग था और यह काबुल-निवासी ग़ोरबेग का पुत्र था। यह बादशाह अकबर के समय पांचसौ सवारों का मंसबदार बना और बाद- शाह जहांगीर के समय बहुत उच्च पद पर पहुंच गया था। पीछे से बादशाह की इसपर अप्रसन्नता हुई, जिससे यह कुछ समय तक इधर-उधर भटकता रहा। फिर शाहजहां के बादशाह होने पर पुनः इसे उच्च पद प्राप्त हुआ। वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में दक्षिण में इसकी मृत्यु हुई। (२) रावत जसवंतसिंह शक्तावत, उदयपुर के महाराणा उदयसिंह के पुत्र और प्रतापसिंह के छोटे भाई शक्तिसिंह का प्रपौत्र और अचलदास का पौत्र था। अचल- दास का पुत्र नरहरदास हुआ, जिसका ज्येष्ठ पुत्र जसवंतसिंह था। इसके वंशजों में मुख्य बानसी के रावत हैं, जो प्रथम वर्ग के सरदार हैं। मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में शक्तिसिंह के वंशजों का वंशवृक्ष दिया है (ख्यात; प्रथम भाग पृ० ६७)। उसमें अचलदास के पुत्रों में से केवल नारायणदास और केसरीसिंह का उल्लेख कर उनके वंशजों के ही नाम दिये हैं, परंतु बानसी ठिकाने की ख्यात से स्पष्ट है कि अचलदास के ११ पुत्र थे, जिनमें से नरहरदास उस (अचलदास) का उत्तराधिकारी हुआ। उसमें केसरीसिंह का नाम नहीं है, जो संभवतः ख्यात-लेखकों की असावधानी के कारण छूट गया हो। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७।

वहां उसका अधिकार न होने दिया। फिर जब जांनिसारखां उक्त परगने पर अधिकार करने के लिए अपनी सेना लेकर गया, उस समय महारावत जसवंतसिंह ने भी अपने राजपूत उसके साथ कर दिये। इसपर जसवंतसिंह शक्तावत मोड़ी के थाने के राजपूतों को लेकर जानिसारखां से भिड़ गया, जिसमें वह (जसवंतसिंह शक्तावत) अपने कुटुंबी कान्ह, सादूल (नरहरोत), जगमाल (वाघावत), पीथा (वाघावत) एवं पूरबिया सबलसिंह आदि सहित मारा गया और महारावत के भी कई आदमी काम आये¹। महाराणा को जांनिसारखां और महारावत जसवंतसिंह के राजपूतों के मोड़ी के थाने पर चढ़ आने और उसमें शक्तावत जसवंतसिंह के काम आने का समाचार सुनकर बड़ा क्रोध हुआ और उसने अपने मंत्री अक्षयराज² को देवलिया पर सेना लेकर जाने की आज्ञा दी³ एवं उधर बादशाह से जांनि- सारखां की ज़्यादती की शिकायत भी करवाई। जब जांनिसारखां की ज़्यादती की शिकायत बादशाह शाहजहां के पास महाराणा के वकीलों-द्वारा पेश हुई तो उसने जांनिसारखां के नाम (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७। (२) यह ओसवाल जाति के कावड़िया गोत्र के प्रसिद्ध महाजन भामाशाह का पौत्र और जीवाशाह का पुत्र था (देखो, मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ४७५, जि० २ पृ० ६६२-४)। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६। नैणसी का यह भी कथन है कि महाराणा की आज्ञा पाकर अक्षयराज ससैन्य धरियावद तक पहुंच गया था, परंतु आगे नहीं बढ़ा। संभव है शाही दरबार में महारावत का पक्ष होने से देवलिया पर सेना भेज अधिकार करने में उसे बादशाह की अप्रसन्नता का भय हुआ हो; अतएव मुसाहबों के निवेदन करने पर महाराणा ने देवलिया पर सेना भेजना स्थगित रख, जांनिसारखां और महारावत की अनुचित कार्यवाही की शाही दरबार में शिकायत कर पहले बसाड़ पर अधिकार करना और फिर शक्तावत जसवंतसिंह का बदला लेने के लिए देवलिया पर सेना भेजना ठीक समझा हो। १७

१३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

·आज्ञा-पत्र भेजा कि वह बसाड़ परगने पर दख़ल न करे और महाराणा के नाम ता० १७ आज़र सन् जुलूस १ (हि० स० १०३८ ता० १२, रवी उस्सानी = वि० सं० १६८५ मार्गशीर्ष सुदि १३ = ई० स० १६२८ ता० २६ नवम्बर) को महाराणा के नाम इस आशय का फ़रमान लिखा—"हमारे अहलकारों को यह मालूम न था कि परगना बसाड़ उस(महाराणा) की अगली जागीर में शामिल है, इसलिए जांनिसारखां की जागीर में बहाल किया गया था। अब यह बात मालूम होने पर पहले के अनुसार बसाड़ · का परगना उस(महाराणा) को प्रदान किया जाता है और जांनिसारखां को दूसरी जागीर दी जावेगी। इस मामले में जांनिसारखां के नाम फ़रमान जारी हुआ है कि परगना बसाड़ उस(महाराणा) से ताल्लुक़ रखता है, इस वास्ते उसको उस(महाराणा) के क़ब्ज़े में छोड़कर इस बाबत लड़ाई-झगड़ा न करे। उस लड़ाई और फ़िसाद से जो उस(महाराणा) के आदमियों और जांनिसारखां के बीच हुआ, बादशाही लोगों को ताज्जुब हुआ। जब कि उस- (महाराणा) का काका और वकील शाही दरबार में विद्यमान थे, उचित था कि पहले इस मामले को शाही दरबार में पेश किया जाता और फिर जैसा हुक्म होता वैसा करते। विश्वास है कि उस(महाराणा) को इस कार्यवाही पर इत्तिला न होगी। मुनासिब है कि वह अपने आदमियों को तब तक रोके, जब तक कि ऐसे मामले शाही दरबार में पेश न हो जायं १।" शाही दरबार से बसाड़ के परगने पर अधिकार बनाये रखने का महाराणा ने पुनः फ़रमान लिखवाकर वहां अधिकार कर लिया, (१)·मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५८-६-। (२) बसाड़ का परगना वि० सं० १६६४ (ई० स० १६३७) तक महाराणा के अधिकार में रहा। फिर बादशाही अफ़सर पैज़ारखां (जांनिसारखां) ने महाराणा के सरदार रावत केसरीसिंह शक्तावत को मारकर वहां पर अधिकार जमाया (मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ७२)। महाराणा जगतसिंह की नीति से बादशाह शाहजहां थोड़े ही समय बाद अप्रसन्न हो गया था। उसने वि० सं० १६६४ (ई० स० १६३७) में फूलिया, जीरण, भैंसरोड, नीमच, बसाड़, सुगोर और डूंगरपुर को मेवाड़ से पृथक्

महारावत जसवन्तसिंहः १३१ महाराणा जगतसिंह का महारावत को उदयपुर में बुलाकर मरवाना । परन्तु उसके हृदय में जांनिसारखां के साथ बसाड़ पर अधिकार करने में महारावत जसवंतसिंह के अपने आदमी भेजने की बात खटकती थी । उसने इस बात को दबाकर जसवंतसिंह शक्तावत का बदला लेने के लिए महारावत को उदयपुर बुलाया । इसपर महारावत अपने ज्येष्ठ पुत्र महासिंह को साथ लेकर उदयपुर गया । महाराणा ने उसका चंपा बाग़ में मुक़ाम कर- वाया और एक दिन रात्रि के समय राठोड़ रामसिंह¹ को सेना-सहित भेजकर बाग़ पर घेरा दिलवा दिया । महारावत भी मरने-मारने का इरादा कर अपने राजपूतों के साथ महाराणा की सेना के सम्मुख हुआ और कुंवर महासिंह सहित वीरतापूर्वक युद्ध करता हुआ मारा गया² । प्रतापगढ़ राज्य की कर दिये थे (वही; पृ० ७२)। केसरीसिंह शक्तावत के लिए देखो ऊपर पृ० १२८ टिप्पण २ । (१) राठोड़ रामसिंह, जोधपुर के राव चंद्रसेन का प्रपौत्र, उग्रसेन का पौत्र और कर्मसेन का पुत्र था । वह महाराणा जगतसिंह के साथ रिश्तेदारी होने से मेवाड़ में जाकर रहा था और वहां उसे जोजावर का पट्टा जागीर में मिला था । मेवाड़ में रहते समय उसने कई युद्धों में भाग लिया था । स्वभाव का वीर होने के कारण महाराणा के दरबार में उसका अच्छा सम्मान था । महाराणा की सेवा त्यागकर बादशाह शाहजहां के चौदहवें सन् जुलूस (वि० सं० १६६७ = ई० स० १६४०) में वह शाही दरबार में जाकर मंसबदार बना । प्रारंभ में उसको एक हज़ारी ज़ात व छःसौ सवारों का मंसब मिला । फिर बढ़ते-बढ़ते शाहजहां के समय में उसका मंसब तीन हज़ार ज़ात और पंद्रह सौ सवारों तक पहुंच गया । उसने शाही सेना में रहकर कई युद्धों में पूर्ण वीरता प्रदर्शित की । वि० सं० १७१५ (ई० स० १६५८) में जब शाहजहां के पुत्रों में परस्पर कलह का सूत्रपात हुआ; तब समूनगर के युद्ध में वह शाहज़ादे दाराशिकोह के पक्ष में शाही सेना में रहकर शाहज़ादे औरंगज़ेब और मुराद के मुक़ाबले में बड़ी वीरता से युद्ध करता हुआ मुराद के तीर से मारा गया । अकाल के समय उसने क्षुधातुर लोगों को रोटियां बांटी थीं, जिससे वह 'रामसिंह रोटला' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अब बूंदी राज्य में उसके वंशजों का एक ठिकाना 'बरवादा' है । (२) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५२२ ।

१३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ख्यातों में इसका अधिक वर्णन नहीं है। वहां केवल महारावत और कुंवर महासिंह के उदयपुर में काम आने का ही उल्लेख है। कविराजा बांकीदास- कृत 'ऐतिहासिक बातें'—नामक ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि उपर्युक्त युद्ध में महारावत जसवंतसिंह की राठोड़ सुजानसिंह भगवानदासोत के हाथ मृत्यु हुई१। 'वीरविनोद' के कर्त्ता महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास ने अपने इतिहास में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है, जो इस प्रकार है— "देवलिया का जसवंतसिंह, सिंहा की गद्दी पर वि० सं० १६७६ (हि० स० १०३१=ई० स० १६२२) में बैठा था। जब वह महावतखां की तरफ़दारी से उदयपुर के हुक्म की बरखिलाफ़ी कर सरकशी करने लगा, तब कई दफ़े लिखा गया, लेकिन उसने हिमायत से जगतसिंह के हुक्म को बिलकुल न माना। महाराणा ने किसी आदमी को भेजकर तसल्ली के साथ रावत को उदयपुर बुलवाया। जसवंतसिंह के दिल में महाराणा की तरफ़ से खटका होने के कारण अपने छोटे बेटे हरिसिंह को देवलिया का कुल बंदोबस्त सौंपकर वह बड़े बेटे महासिंह तथा एक हज़ार अच्छे राजपूतों के साथ उदयपुर गया और चंपा बाग़ में डेरा किया, जो महाराणा कर्णसिंह का बनवाया हुआ शहर से एक मील के फ़ासले पर पूर्व की तरफ़ है। जसवंतसिंह को महाराणा ने यहां की फ़र्मांबर्दारी के ख़िलाफ़ न रहने की बाबत बहुतसी नसीहत की, लेकिन उसके दिल में महावतखां की हिमायत का ज़ोर भरा हुआ था, जिससे महाराणा की मनशा से ख़िलाफ़ जवाब दिया। महाराणा ने अपने सलाहकारों से पूछा तो सबने अर्ज़ की कि यदि जसवंतसिंह यहां से चला गया तो आपकी हुकूमत से बिल्कुल अलहदा हो जावेगा। तब महाराणा ने अपने सलाहकारों के कहने पर अमल करके अपने बड़प्पन को बट्टा लगानेवाली बात यानी जसवंतसिंह को मार डालना इख़्तियार किया। "महाराणा को मुनासिब था कि जसवंतसिंह को अपने यहां से विदा (१) संख्या, ३३७।

करके देवलिया पर फ़ौज भेजते, लेकिन उन्होंने धोखे के साथ कार्रवाई की और रामसिंह राठोड़ को फ़ौज देकर आधी रात के वक़्त चंपा बाग़ में महा- रावत को घेर लेने का हुक्म दिया । रामसिंह ने वैसा ही किया। जसंवतसिंह मय अपने कुंवर महासिंह व एक हज़ार राजपूतों के अच्छी तरह लड़कर मारा गया । महाराणा के बहुत से राजपूत काम आये । यह झगड़ा विक्रमी १६८५ ( हि० १०३८ = ई० १६२८ ) में हुआ¹ ।” ‘वीरविनोद’ के ग्यारहवें प्रकरण में प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रसङ्ग में उक्त कविराजा ने इस घटना पर अधिक प्रकाश डालकर लिखा है— “बादशाह ने जांनिसारखां को लिख भेजा कि परगने बसाड़ पर दख़ल न करे । शाहजहां जानता था कि कैसी-कैसी ताक़त काम में लाने पर महा- राणा उदयपुर का फ़साद दूर हुआ है । अब छोटी बात के लिए उसी आग को भड़काना अक़्लमंदी का काम नहीं। इसके सिवाय बादशाह का भी शुरू तख़्तनशीनी का अहद था। इसलिए जांनिसारखां को धमकाया और महाराणा को नसीहतों का फ़रमान लिख भेजा, परंतु देवलिया के रावत जसवतसिंह से महाराणा बहुत नाराज़ रहे और उससे जसंवतसिंह शक्तावत का बदला लेना चाहा । महाबतखां की हिमायत के सबब महाराणा को देवलिया पर फ़ौजकशी करने का मौक़ा न मिला । तब धीरे-धीरे रावत जसवतसिंह को धोखा दिया और विक्रमी १६६० (?) [ हि० १०४३ = ई० १६३३ ] में उसे मय उसके बेटे महासिंह के उदयपुर बुलाया । उसे पूरा विश्वास नहीं था, इससे वह एक हज़ार चुने हुए राजपूत साथ ले गया और चंपा बाग़ में डेरा किया। राठोड़ रामसिंह कर्मसेनोत को, जो महाराणा की बहिन का बेटा था, महा- राणा ने रात के वक़्त फ़ौज देकर भेजा । उसने चम्पाबाग़ पर घेरा डाला और तोपें व सोकड़ों² की गाड़ियां मोर्चों पर जमा दीं । रावत जसवतसिंह


( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१८-६ । ( २ ) इन गाड़ियों में गोली बारूद से भरी हुई बंदूकें रहती थीं, जिनकी संख्या सौ तथा दो सौ तक भी होती थी । जब शत्रु-सैन्य से लड़ाई का अवसर होता, उस समय चारों तरफ़ से घेरा डालने के लिए ऐसी गाड़ियां खड़ी करदी जातीं

१३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास केसरिया पोशाक के साथ सिर पर सेहरा और तुलसी की मंजरी लगाकर चंपा बाग़ से बाहर निकला और अपने साथियों-सहित महाराणा की फ़ौज पर टूट पड़ा, परंतु तोप और सोकड़ें की गाड़ियों के कारण सबके सब भुन गये, तो भी किसी-किसी ने रामसिंह को ललकारा और तलवारें चलाईं । आखिरकार महारावत जसंवंतसिंह अपने बेटे महासिंह और एक हज़ार राजपूतों-सहित बहादुरी के साथ मारा गया और महाराणा की इस दग़ादिली से बड़ी बदनामी हुई १ ।” 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्ता कवि गंगाराम इस युद्ध का विचित्र प्रकार से वर्णन करता है। उसका कथन है—“महारावत जसंवंतसिंह महा- राणा जगतसिंह के दरबार में आधे सिंहासन पर बैठा हुआ था, उस समय कुछ सरदारों ने जसंवंतसिंह को नज़राना कर दिया, जिससे महाराणा क्रुद्ध हो गया और महारावत को मारने की गुप्त मन्त्रणा कर उसने राठोड़ रामसिंह को इस काम के लिए नियत किया । महाराणा की आज्ञा पाकर रामसिंह देवलिया की तरफ़ विदा हुआ और उसने गुप्त रूप से देवलिया जाने का मार्ग रोक दिया । महारावत भी देवलिया जाने को आगे बढ़ा और मार्ग में रामसिंह को लड़ने के लिए उद्यत देख विश्वासघाती जान उसने उससे युद्ध न किया; किंतु कुंवर महासिंह के साथ उस (रामसिंह) का युद्ध हुआ, जिसमें वह (रामसिंह) परास्त हुआ । इसपर महाराणा ने अप्रसन्न होकर रामसिंह को अपने यहां से निकाल दिया २ ।” और उनमें क्रमानुसार बंदूकें इस प्रकार सटी हुई रहती थीं कि एक बार बत्ती लगाने पर सब बंदूकें एक साथ चल जायं । इन बंदूकों से निकली हुई गोलियां दूर-दूर तक जाकर शत्रु-सैन्य को विदलित करती हुई अधिकांशतः उन्हें नष्ट कर देती थीं । ( वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६० ) । ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६० । ( २ ) एकस्मिन् समये रराज विलसन् राणासभायां नृपः कान्त्या भूमिभृतोऽपरानधरयंस्तस्यार्धसिंहासने ।

महारावत जसवन्तसिंह १३५ 'प्रतापगढ़ राज्य की ख्यात'१, बांकीदास-कृत 'ऐतिहासिक बातें'२, नानादेशनिवासिनां क्षितिभृतां भृत्यैश्च मुख्यैर्यदा नत्वोपायनमग्रतो विनिहितं श्रीदेवलेन्द्रप्रभोः ॥ ३ ॥ दृष्ट्वा क्रोधहुताशने निपतितः श्रीचित्रकूटाधिपोऽ- प्येतत्कर्णसूतो बभूव बलिनां कर्णेषु कर्णेजपः । वीरः कोऽपि ममास्ति सांप्रतममुं यो हन्ति मध्येसभं विश्वासेन समुत्थितोऽनुचितकृद्रामः स्वयं सज्जितः ॥ ४ ॥ दत्ताज्ञोऽथ जगाम देवलपुरं पन्थानमग्रे ततो बध्वा चोरसखश्च रामनृपतिर्विश्वांसघातोत्सुकः । दृष्ट्वा श्रीजसवंतमागतमयं खङ्गैकमित्रं रणे निस्त्रिंशैः प्रतिबोधयन्सचकितः संप्राप तस्यान्तिकम् ॥ ५ ॥ संख्यं तत्र तयोर्भून्मिलितयोरन्योन्यमत्यद्भुतं वीराणां तदनन्तरं कथमिदं को वेति कस्यासि रे । भूयः श्रीजसवंतसिंहविभूनेत्येक्तुं तदोवाचसः कुत्तो राणनृपोऽहमस्मि सुभटो रामोऽरिहिंसाग्रणीः ॥ ६ ॥ संग्रामे किल भारते बहुतरं कृत्वा रणं वीर्यवान् गाङ्गेयो विरराम चार्जुनमपि दृष्ट्वा शिखण्डान्वितम् । खड्गेनैव हतं हि रे तव यशस्तत्सानुमया सङ्गरे विश्वासोपहतस्य दुर्मुख मुखं नालोकनीयं च ते ॥ ७ ॥ पश्चान्माहकुमारकेण बहुभिर्विक्रान्तमन्तर्लस- न्मानेन प्रभुणा भटैरथ तदा भग्नः स रामः स्वयम् । तच्छ्रुत्वाऽऽशु चुकोप राणनृपतिर्निष्कासयामास तं देशानम्लेच्छपुरेषु खेलतितरामद्याप्यगस्तीशवत् ॥ ८ ॥ सर्ग ८ । ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ७ । ( २ ) संख्या ३३७, १११५, १४६६-१६०१ ।

३. महाराणा कुम्भा (विजय स्तम्भ व दुर्ग निर्माण)

१३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास 'वीरविनोद'१, 'मालकम की रिपोर्ट'२, एवं 'प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियरों'३, आदि में महारावत जसवंतसिंह का उदयपुर में महाराणा जगतसिंह की सेना से लड़कर मारे जाने का उल्लेख है, जिसका समर्थन नैणसी की ख्यात से भी होता है४, जो उपर्युक्त पुस्तकों में अधिक प्राचीन और महारावत हरिसिंह के समय की संगृहीत है। इनके अतिरिक्त 'अमरकाव्य'५ और 'राजप्रशस्ति महाकाव्य'६ में भी उसके महाराणा राजसिंह से लड़कर मारे (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१८-६ और १०६० । (२) सर जॉन मालकम; रिपोर्ट ऑन दि प्रॉविन्स ऑव् मालवा एंड एड्ज्वान्- निंग डिस्ट्रिक्ट्स; पृ० २२४ । (३) कैप्टन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६८ । (४) प्रथम भाग, पृ० ६६ । (५) पूर्णे षोडशके शते च उदिते पंचाग्रकाशीतिके राणोक्त्योत्कटरामसिंह इति यो राठोडचूडामणिः । प्रोद्दंडं जसवंतरावतपरं कुंतैर्जघान द्रुतं वीरं देवलियाप(तिं) किल महासिंहाख्यपुत्रान्वितं ॥ तदनुदेवलियानगरस्य वा समररंगनटैश्च महाभटैः ॥ रचितमेव विखंडनमंजसा जनगणैश्च विलुंटनमुत्कटैः ॥ स रामसिंहो जसवंतसंज्ञं तं रावतं पुत्रयुतं निहत्य । चक्रे जगत्सिंहनृपस्य तोषं संतोषपोषं समवाप तस्मात् ॥ अमर काव्य । (६) जगत्सिंहाज्ञया यातो राठोडोरामसिंहकः । प्रतिदेवलियां सेनायुक्तो रावतमुद्भटं ॥ २० ॥ जसवन्तं मानसिंहपुत्रयुक्तं जघान सः । पुर्यां देवलियायां च लुंटनं रचितं जनैः ॥ २१ ॥ सर्ग पांचवां । राजप्रशस्ति महाकाव्य में कुंवर मानसिंह के महारावत जसवन्तसिंह के साथ

महारावत जसवंतसिंह १३७ जाने का उल्लेख है। इसके विपरीत 'हरिभूषण महाकाव्य' में कवि गंगाराम ने महारावत और कुंवर महासिंह की मृत्युवार्त्ता को छोड़कर महारावत का रामसिंह राठोड़ से युद्ध न करने एवं महासिंह का रामसिंह से युद्ध होने पर उस (रामसिंह) के परास्त होने का वर्णन करते हुए महाराणा का रामसिंह से अप्रसन्न होकर उसको अपने यहां से निकालने का वर्णन किया है, जो माननीय नहीं हो सकता, क्योंकि उसका कथन परंपरागत जन-श्रुति से भी विरुद्ध है। कवि गंगाराम ने अपने काव्य में देवलिया के किसी राजा का मृत्यु-प्रसङ्ग नहीं दिया है, जिससे हमारा तो यही अनुमान है कि नाटकों की भांति उसने अपनी रचना को सुखान्त बनाने का ही लक्ष्य रखा था, जैसा कि हम पहले भी लिख चुके हैं¹। महारावत जसवंतसिंह, उदयपुर में महाराणा की सेना से किस वर्ष लड़कर मारा गया, इस विषय में भी मत भेद है। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातें², माल्कम की रिपोर्ट, प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियर³, कविराजा बांकीदास-कृत 'ऐतिहासिक बातें'⁴ आदि में इस घटना का वि० सं० १६६० (ई० स० १६३३) में होना लिखा है; परंतु अमरकाव्य⁵ और राजप्रशस्ति महाकाव्य⁶ में इस युद्ध का वि० सं० १६८५ (ई० स० १६२८) में होना बतलाया है। स्वयं कविराजा श्यामलदास ने वीरविनोद में राजप्रशस्ति काम आने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है। मानसिंह, महारावत प्रतापसिंह के समय तक विद्यमान था। अमरकाव्य से स्पष्ट है कि महारावत जसवन्तसिंह के साथ कुंवर महासिंह काम आया था, जैसा कि उपर्युक्त अवतरण में उल्लिखित है। (१) देखो ऊपर पृ० ११४। (२) प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० ७। (३) मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट, पृ० १६८। (४) संख्या ३३७, १११५ और १५६६। (५) देखो; ऊपर पृ० १३६, टिप्पण ५। (६) देखो; ऊपर पृ० १३६, टिप्पण ६। १८

'१३८ 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आदि के अनुसार एक स्थल पर वि० सं० १६८५^१ और दूसरे स्थल पर 'वि० सं० १६६०^२ में इस घटना के घटित होने का उल्लेख किया है । इस विभिन्न कथन का निर्णय करने के लिए और भी प्रमाणों की आवश्यकता हैं, परंतु वे अप्राप्य हैं। ऐसी स्थिति में अमरकाव्य और राजप्रशस्ति महाकाव्य में वर्णित संवत् १६८५ ही ठीक मानना पड़ेगा, क्योंकि उपर्युक्त काव्य इस घटना के थोड़े ही समय पीछे के बने हुए हैं एवं उनमें प्रत्येक घटनाएं यथा क्रम लिखी गई हैं। महारावत जसवंतसिंह के आठ राणियां थीं । उसके महासिंह, हरिसिंह, मानसिंह^३, केसरीसिंह^४, उदयसिंह नामक पांच कुंवर और रूपकुंवरी तथा सूरजकुंवरी नामक दो कन्याएं हुईं^५। महारावत की संतति आदि उसने थोड़े ही समय तक राज्य किया, इसलिए उसकी जीवन संबंधी महत्त्वप्रद घटनाओं पर प्रकाश डालना नितान्त असंभव है, तो भी यह कहा जा सकता है कि ( १ ) देखो; ऊपर पृ० १३३ । ( २ ) देखो; ऊपर पृ० १३३ । ( ३ ) मानसिंह को अरणोद की जागीर मिली थी और वह महारावत प्रताप- सिंह के समय तक विद्यमान था । प्रतापप्रशस्ति (खंडित काव्य ) में इसकी बहुत कुछ प्रशंसा की गई है । ( ४ ) इसके वंशजों के अधिकार में भांतला का ठिकाना प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में है । ( ५ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ७। बड़वे की ख्यात में सूरजकुंवरी का नाम न होकर 'हरकुंवरी' नामक दूसरी कुंवरी बतलाई है, पृ० ४ । प्रतापगढ़ राज्य की उपर्युक्त पुरानी ख्यात और बड़वे की ख्यात में जो राणियों के नाम दिये हैं, उनमें से कुछ नाम नहीं मिलते और न उनके पिता आदि के नामों का ही मिलान होता है, परन्तु उसके एक राणी चंपाकुंवरी, चौहान खान की पुत्री थी, जिसने देवलिया में गोवर्धननाथ का मंदिर बनवाकर वि० सं० १७०५ ( ई० स० १६४८ ) में उसकी प्रतिष्ठा करवाई थी । इस राणी का नाम दोनों ख्यातों में मिलता है और गोवर्धननाथ के मंदिर की प्रशस्ति में भी यही नाम दिया है और महारावत हरिसिंह का उक्त राणी के उदर से उत्पन्न होना बतलाया है ।

महारावत जसवंतसिंह १३६ वह क्षात्र-धर्म से पराङ्मुख न था और उसमें स्वात्माभिमान की मात्रा विद्यमान थी । महाराणा की विशाल सेना-द्वारा अचानक रात्रि में घेरे जाने पर भी वह विचलित न हुआ और वीरता पूर्वक लड़कर मारा गया । वह भाषा साहित्य का ज्ञाता और कवि था । प्रतापगढ़ राज्य से उसके रचे हुए कुछ दोहों का संग्रह प्राप्त हुआ है, जिससे जान पड़ता है कि वह शृङ्गार युक्त रचना करता था और उसकी रचना सुंदर होती थी१ । (१) महारावत जसवंतसिंह-रचित दोहों को उसके पौत्र महारावत प्रताप- सिंह ने एकत्रित करवाकर अपने पढ़ने के लिए सुन्दर चिकने कागज पर पुस्तकाकार लिखवाया था जिसके अंतमें लेखक का नाम और संवत् नीचे लिखे अनुसार दिया है— “इति श्रीमन्महाराजाधिराजमहाराजश्रीजसवन्तसंघजीकृत दूहा सम्पूर्ण । महादीवाण श्रीप्रतापसंघजीपठनार्थे विद्याशिरोमणिजी वचनात् लिखितं पन्यास सुन्दरसागरेण । संवत् १७५६ वर्षे चैत्रसितत्रयोदश्याम्”॥ प्रतापगढ़ के पंडित जगन्नाथ शास्त्री ने उक्त महारावत तथा उसके पौत्र महारावत प्रतापसिंह-रचित दोहों को वहां के वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी की आज्ञानुसार वि० सं० १६६५ (ई० स० १६३८) में 'काव्य-कुसुम' नाम से प्रकाशित किया है, जिनके अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि महारावत जसवंतसिंह की भाषाकाव्य की रचना में अच्छी गति थी । उसके दोहों में अधिकांश नायका भेद और नख शिख वर्णन है । रचना अलंकारयुक्त और अनूठी उपमाओं से पूर्ण है । उदाहरण के लिए नीचे उसके कुछ दोहे उद्धृत किये जाते हैं— मुकतमाल हिय देत रुचि, दृग पहुंचे स्रुतिपार । ता परि हू मोहति रहै, सो यह कोन विचार ॥ यह अचरज देख्यौ दृगनि, कहि आवत कछु नांहि । विजुली में वारिज प्रगट, जुगल मीन तिहि मांहि ॥ प्रेम-लाज-पानिप-भरे, भरे-तरुनता जोत । अनिमिष लोचन रस-भरे, सौंहें कापर होत ॥

१४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हरिभूषण महाकाव्य में उक्त महारावत को शत्रुओं पर कुल्हाड़ा चलाने में कुशल, स्वरूपवान, स्वाभिमानी और दानी राजा बतलाया १ है, जो संभव है, परंतु कवि गंगाराम का महारावत जसवंतसिंह के लिए यह कथन कि प्रतिदिन एक करोड़ पैदल और एक लाख कच्छी सवार नक्कारे की आवाज होते ही उसके चरणों में सिर नमाते थे, अतिशयोक्तिपूर्ण है। सुधा भरत ससि सब कहै, नई रीति यह आहि । चंद लगे जु चकोर है, विष डारत ये ताहि ॥ तरुनि सरोवर कुच कमल, अलि ऊपर ये स्याम । कैधौं सरवस आप धरि, छाप दई है काम ॥ भौंह धनुष मनमथ गहै, तिरछी चितवनि बानि । फूलन को आवध कहा, ऐसे करत निदानि ॥ मुग्धा-तन त्रिवली बनी, रोमावलि के संग । डोरी गहि पौरी मनौं, अव ही चढ्यौ अनंग ॥ अरुन वदन अति रोस ते, सतर भौंह नहीं धीर । लाल कमल ता पर मनौं, भौर रहे करि भीर ॥ काव्यकुसुम । ( १ ) आसीच्छ्रीजसवन्तसिंहनृपतिः सिंहात्मजो वीर्यवा- न्वैरिवातकुठारपातकुशलः स्फूर्जत्प्रतापानिलः । नेमुः कोटिपदातयः स्वगृहिणः श्रुत्वैक दम्मामकं लक्षं कच्छतुरङ्गमादिनिवहा नित्यं हि यस्य प्रभोः ॥ १ ॥ कान्त्या मन्मथमङ्गितैर्मधुरिपुं कीर्त्या सुधाशुं धिया वागीशं बहुना धनेन धनपं वीर्येण जम्भापहम् । शक्त्या शक्तिधरं क्रुधा हुतवहं मानेन दुर्योधनं । दानेन प्रचुरेण कर्णमपि यो विस्मारयन् संवभौ ॥ २ ॥ सर्ग आठवां ।

इस चित्र में कोई पाठ (text) या सामग्री दिखाई नहीं दे रही है (चित्र पूर्णतः रिक्त/सफेद है)।

महारावत हरिसिंह

महारावत हरिसिंह १४१ हरिसिंह महारावत हरिसिंह, जसवंतसिंह का दूसरा पुत्र था । उसका जन्म उक्त महारावत (जसवंतसिंह) की राणी चौहान खान की पुत्री राज्य प्राप्ति चंपाकुंवरी के उदर से हुआ था¹। जब महारावत जसवंतसिंह, महाराणा जगतसिंह के बुलाने पर उदयपुर गया, तब वह अपने ज्येष्ठ पुत्र महासिंह को तो अपने साथ ले गया था और छोटे पुत्र हरिसिंह को महाराणा की तरफ़ से धोखा होने के ख्याल से देवलिया में छोड़ गया था² । वि० सं० १६८५ (ई० स० १६२८) में उदयपुर में महाराणा की सेना द्वारा जसवंतसिंह और कुंवर महासिंह के मारे जाने का समाचार देवलिया में पहुंचने पर धमोतर के ठाकुर जोधसिंह (गोपालदास का पुत्र) ने हरिसिंह की गद्दीनशीनी की रसम पूरी की³ । उस समय उदयपुर के महाराणा जगतसिंह के कोप से बचने का महाराव के लिए बादशाही दरबार की शरण प्राप्त करने के अतिरिक्त महाराणा का देवलिया अन्य कोई साधन न था । इसलिए गद्दीनशीनी पर सेना भेजना के उपरांत ठाकुर जोधसिंह⁴ ने शीघ्रता पूर्वक उसको शाही दरबार में लेजाना ही उचित समझा (१) श्रीसिंहरावतजनुर्जसवन्तपत्नी चौहाणवंशवरभूषणखानपुत्री । श्रीरावतेन्द्रहरिसिंहकरावमाता चाम्पा इति व्यधित सा त्रिदशप्रतिष्ठाम् ॥ देवलिया के गोवर्धननाथ के मंदिर की प्रशस्ति । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१८ । (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६६ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६० । (४) एक ख्यात में महारावत हरिसिंह के समय देवलिया पर महाराणा की

१४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास क्योंकि वहां महावतखां की मित्रता के कारण महारावत का भी परिचय था। उधर महाराणा ने, जो देवलियावालों से अत्यंत अप्रसन्न था और उक्त राज्य को नष्ट करना चाहता था, राठोड़ रामसिंह के साथ देवलिया पर सेना रवाना की, जिसने राजधानी देवलिया को लूटकर बरबाद किया १ । प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त ख्यातों में देवलिया पर महाराणा की सेना जाने का कुछ भी उल्लेख नहीं है, किंतु अमरकाव्य से प्रकट है कि महाराणा की सेना के देवलिया जाने पर वहां वालों ने उसका मुक़ाबला किया था २; परंतु महाराणा की बड़ी सेना के आगे उसकी कामयाबी नहीं हुई। सेना आने के समय उसके साथ धमोतर के ठाकुर गोपालदास का भी नाम दिया है और जोधसिंह को कुंवर लिखा है। वहां यह उल्लेख है कि मेवाड़ की सेना देवलिया में आने पर जब महारावत हरिसिंह दिल्ली गया, उस समय गोपालदास और उसके पुत्र जोधसिंह के अतिरिक्त महारावत का भाई केसरीसिंह भी उसके साथ विद्यमान था। वहां दिल्ली में गायें मारने के सम्बन्ध में क़साइयों से उसका झगड़ा हो गया, जिसमें केसरीसिंह मारा गया। बादशाह ने उक्त स्थान पर गोवध बन्द कर दिया और वहां उसकी आज्ञा से महारावत ने राममंदिर बनवाया। बादशाह अकबर के समय भारत में गौ-वध बन्द हो गया था और शाहजहां ने भी उसका अनुकरण किया था। ऐसी स्थिति में शाहजहां के समय गोवध का जारी रहना और महारावत का, जो शाही दरबार में अपने राज्य की प्राप्ति के लिए गया था, वहां इस संबंध में लड़ाई करना कुछ विपरीत जान पड़ता है। इस विषय में जब तक कोई पुष्ट प्रमाण न मिलें वास्त- विकता पर प्रकाश पड़ना असंभव है। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१६ और पृ० १०६० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५२२। राजप्रशस्ति महाकाव्य में महाराणा की सेना- द्वारा देवलिया लूटने का निम्नलिखित उल्लेख है— पुर्यां देवलियायां च लुंठनं रचितं जनैः ॥ २१ ॥ सर्ग पांचवां। (२) तदनु देवलियानगरस्य वा समररंगनटैश्च महाभटैः । रचितमेव विखंडनमंजसा जनगणैश्च विलुंठनमुत्कटैः ॥ अमरकाव्य ।

महारावत हरिसिंह १४३ वह वादशाह शाहजहां की गद्दीनशीनी का आरंभिक युग था और महाराणा का भी शाही दरबार में अच्छा प्रभाव था । तथापि वादशाह [हाशिया: महारावत का शाही सेना के साथ जाकर देवलिया पर अधिकार करना] महाराणा से खिंच गया क्योंकि उन्हीं दिनों उस- (महाराणा) ने डूंगरपुर के स्वामी महारावल पुंजराज के समय वहां सेना भेज जंगी कार्यवाही की थी । फलतः वादशाह शाहजहां ने महारावत हरिसिंह को अपने अमीरों में प्रविष्टकर मंसब आदि से उसका सम्मान बढ़ाया१, एवं शाही सेना ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा मिलता है कि महारावत हरिसिंह के वादशाह के पास जाने पर बादशाह ने उसको सात हज़ारी मन्सब, 'महाराजा-धिराज- महारावत' की उपाधि, निशान आदि प्रदान किये । इस कथन की पुष्टि कैप्टन सी० ई० येट के 'गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़' से भी होती है। उसमें लिखा है कि शाहजहां ने महा- रावत हरिसिंह को खासा खिलअत, प्रदानकर नौ लाख रुपये आय की कांठल की जागीर का फ़रमान उसके नाम कर दिया एवं पन्द्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज़ दाख़िल करना स्थिर हुआ । साथ ही 'महाराजाधिराज-महारावत' की उपाधि-सहित सात हज़ारी मन्सब भी उसको मिला और मन्दसोर के हाकिम को मेवाड़ की सेना को हटाकर देव- लिया पर उसका अधिकार कराने का हुक्म दिया गया । उसने देवलिया पर अधिकार करने के पीछे वसाड़, आमलसर, अमलावदा, पानमोड़ी और मगरोदा पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया ( पृ० ७६ ) । मेजर के० डी० अर्सकिन ने भी अपने 'गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट' ( पृ० १६८ ) में संक्षेप में इन बातों का उल्लेख किया है। इनके विरुद्ध सर जॉन माल्कम अपनी रिपोर्ट ऑन दि प्राविंस ऑव् मालवा एंड एडजॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स (पृ० २२४-५) में महारावत हरिसिंह को बादशाह औरंगज़ेब से सनद, उच्च उपाधि, खिलअत झंडा आदि मिलना लिखता है, किंतु तत्सामयिक फ़ारसी तवारीख़ों बादशाहनामा और औरंगज़ेबनामा में इस सम्बन्ध का कुछ भी उल्लेख नहीं मिलता है। शाहजहां के समय के मंसबदारों की सूची में भी उसका कहीं नाम नहीं है और न इस सम्बन्ध का कोई फ़रमान प्रतापगढ़ राज्य में विद्यमान है। ऐसी दशा में इसका ठीक निर्णय होना कठिन है तथापि प्रतापगढ़ राज्य में महारावत हरिसिंह के नाम के वाद- शाह शाहजहां और औरंगज़ेब के समय के कई फ़रमान, शाहजादों के निशान आदि विद्यमान हैं, जिनको देखने से कहा जाता है कि वह वादशाह शाहजहां का विश्वास पात्र था । साथ ही वह शक्तिशाली भी था, जिससे शाहज़ादों ने पारस्परिक युद्ध में उसको अपनी-अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न किया था । उसके पुत्र प्रतापसिंह और पौत्र

१४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास साथ देकर उसको देवलिया पर अधिकार करने को रवाना किया१। इसपर महाराणा ने अपनी सेना को देवलिया से हटा लिया। फिर महाराणा ने धरियावद का परगना (जो मेवाड़वालों की तरफ़ से सादड़ी छूट जाने पर भी देवलियावालों के पास चला आता था२?) जब्त कर लिया, जिसके लिए महारावत ने शाही दरबार में बहुत कुछ उद्योग, किया परंतु उसमें उसको सफलता नहीं हुई। पृथ्वीसिंह को भी शाही दरबार से मन्सब मिले थे, जिससे अनुमान होता है कि महा- रावत हरिसिंह को भी कोई मन्सब अवश्य मिला होगा। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६१। नैणसी लिखता है कि महारावत हरिसिंह के बादशाह के पास जाने पर देवलिया महाराणा के अधिकार से निकाल दिया गया एवं महारावत की नौकरी उज्जैन और अहमदाबाद की तरफ़ नियत की नई (ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६७)। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६१ । महारावत विक्रमसिंह के समय से ही उसकी मेवाड़ की सादड़ी आदि की जागीर छूट गई थी, फिर धरियावद उसके वंशजों के पास कैसे रहा, इसका ख्यातों आदि से कुछ पता नहीं चलता। 'वीरविनोद' के उपर्युक्त कथन से तो यह अनुमान होता है कि विक्रमसिंह की मेवाड़ की जागीर में से सादड़ी आदि का कुछ इलाक़ा ही महाराणा उदयसिंह ने जब्त किया होगा और धरियावद आदि का अंश उसके अधिकार में बना रहा होगा, जिससे संतुष्ट न होकर विक्रमसिंह ने कांठल में रहना अख्तियार किया, परन्तु धरियावद पर उसने अपना अधि- कार बनाये रखा और समय-समय पर देवलिया के राजाओं की तरफ़ से महाराणाओं को शाही चढ़ाइयों के समय सहायता मिलती रही और इसी कारण से महाराणा प्रतापसिंह, अमरसिंह और कर्णसिंह ने उससे छेड़-छाड़ न की । फिर महाराणा जगत्सिंह ने महारावत हरिसिंह के शाही सेना लेकर पहुंचने पर धरियावद खालसे में मिला लिया, जो लगभग एक सौ वर्ष पीछे देवलियावालों को मेवाड़ की तरफ़ से पुनः प्राप्त हुआ, जिसका सविस्तर वर्णन आगे किया जायगा । कहीं-कहीं ऐसा भी लिखा मिलता है कि महारावत हरिसिंह ने देवलिया पर अधिकार हो जाने के पीछे बत्तीस गांवों में से बारे- वरदां और भांतला परगना मेवाड़ में से दबा लिया था। संभव है मेवाड़ के महाराणाओं पर बादशाह की नाराजगी होने पर उसने शाही फ़रमान के द्वारा ही उन्हें कब्जे में किया होगा, अन्यथा ऐसा होना संभव नहीं है। इस सम्बन्ध में अब तक पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री नहीं मिली है, जिससे निश्चित मत प्रकट किया जा सके ।