भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हरिभूषण महाकाव्य में उक्त महारावत को शत्रुओं पर कुल्हाड़ा चलाने में कुशल, स्वरूपवान, स्वाभिमानी और दानी राजा बतलाया १ है, जो संभव है, परंतु कवि गंगाराम का महारावत जसवंतसिंह के लिए यह कथन कि प्रतिदिन एक करोड़ पैदल और एक लाख कच्छी सवार नक्कारे की आवाज होते ही उसके चरणों में सिर नमाते थे, अतिशयोक्तिपूर्ण है। सुधा भरत ससि सब कहै, नई रीति यह आहि । चंद लगे जु चकोर है, विष डारत ये ताहि ॥ तरुनि सरोवर कुच कमल, अलि ऊपर ये स्याम । कैधौं सरवस आप धरि, छाप दई है काम ॥ भौंह धनुष मनमथ गहै, तिरछी चितवनि बानि । फूलन को आवध कहा, ऐसे करत निदानि ॥ मुग्धा-तन त्रिवली बनी, रोमावलि के संग । डोरी गहि पौरी मनौं, अव ही चढ्यौ अनंग ॥ अरुन वदन अति रोस ते, सतर भौंह नहीं धीर । लाल कमल ता पर मनौं, भौर रहे करि भीर ॥ काव्यकुसुम । ( १ ) आसीच्छ्रीजसवन्तसिंहनृपतिः सिंहात्मजो वीर्यवा- न्वैरिवातकुठारपातकुशलः स्फूर्जत्प्रतापानिलः । नेमुः कोटिपदातयः स्वगृहिणः श्रुत्वैक दम्मामकं लक्षं कच्छतुरङ्गमादिनिवहा नित्यं हि यस्य प्रभोः ॥ १ ॥ कान्त्या मन्मथमङ्गितैर्मधुरिपुं कीर्त्या सुधाशुं धिया वागीशं बहुना धनेन धनपं वीर्येण जम्भापहम् । शक्त्या शक्तिधरं क्रुधा हुतवहं मानेन दुर्योधनं । दानेन प्रचुरेण कर्णमपि यो विस्मारयन् संवभौ ॥ २ ॥ सर्ग आठवां ।