राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत जसवंतसिंह १३६ वह क्षात्र-धर्म से पराङ्मुख न था और उसमें स्वात्माभिमान की मात्रा विद्यमान थी । महाराणा की विशाल सेना-द्वारा अचानक रात्रि में घेरे जाने पर भी वह विचलित न हुआ और वीरता पूर्वक लड़कर मारा गया । वह भाषा साहित्य का ज्ञाता और कवि था । प्रतापगढ़ राज्य से उसके रचे हुए कुछ दोहों का संग्रह प्राप्त हुआ है, जिससे जान पड़ता है कि वह शृङ्गार युक्त रचना करता था और उसकी रचना सुंदर होती थी१ । (१) महारावत जसवंतसिंह-रचित दोहों को उसके पौत्र महारावत प्रताप- सिंह ने एकत्रित करवाकर अपने पढ़ने के लिए सुन्दर चिकने कागज पर पुस्तकाकार लिखवाया था जिसके अंतमें लेखक का नाम और संवत् नीचे लिखे अनुसार दिया है— “इति श्रीमन्महाराजाधिराजमहाराजश्रीजसवन्तसंघजीकृत दूहा सम्पूर्ण । महादीवाण श्रीप्रतापसंघजीपठनार्थे विद्याशिरोमणिजी वचनात् लिखितं पन्यास सुन्दरसागरेण । संवत् १७५६ वर्षे चैत्रसितत्रयोदश्याम्”॥ प्रतापगढ़ के पंडित जगन्नाथ शास्त्री ने उक्त महारावत तथा उसके पौत्र महारावत प्रतापसिंह-रचित दोहों को वहां के वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी की आज्ञानुसार वि० सं० १६६५ (ई० स० १६३८) में 'काव्य-कुसुम' नाम से प्रकाशित किया है, जिनके अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि महारावत जसवंतसिंह की भाषाकाव्य की रचना में अच्छी गति थी । उसके दोहों में अधिकांश नायका भेद और नख शिख वर्णन है । रचना अलंकारयुक्त और अनूठी उपमाओं से पूर्ण है । उदाहरण के लिए नीचे उसके कुछ दोहे उद्धृत किये जाते हैं— मुकतमाल हिय देत रुचि, दृग पहुंचे स्रुतिपार । ता परि हू मोहति रहै, सो यह कोन विचार ॥ यह अचरज देख्यौ दृगनि, कहि आवत कछु नांहि । विजुली में वारिज प्रगट, जुगल मीन तिहि मांहि ॥ प्रेम-लाज-पानिप-भरे, भरे-तरुनता जोत । अनिमिष लोचन रस-भरे, सौंहें कापर होत ॥