राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'१३८ 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आदि के अनुसार एक स्थल पर वि० सं० १६८५^१ और दूसरे स्थल पर 'वि० सं० १६६०^२ में इस घटना के घटित होने का उल्लेख किया है । इस विभिन्न कथन का निर्णय करने के लिए और भी प्रमाणों की आवश्यकता हैं, परंतु वे अप्राप्य हैं। ऐसी स्थिति में अमरकाव्य और राजप्रशस्ति महाकाव्य में वर्णित संवत् १६८५ ही ठीक मानना पड़ेगा, क्योंकि उपर्युक्त काव्य इस घटना के थोड़े ही समय पीछे के बने हुए हैं एवं उनमें प्रत्येक घटनाएं यथा क्रम लिखी गई हैं। महारावत जसवंतसिंह के आठ राणियां थीं । उसके महासिंह, हरिसिंह, मानसिंह^३, केसरीसिंह^४, उदयसिंह नामक पांच कुंवर और रूपकुंवरी तथा सूरजकुंवरी नामक दो कन्याएं हुईं^५। महारावत की संतति आदि उसने थोड़े ही समय तक राज्य किया, इसलिए उसकी जीवन संबंधी महत्त्वप्रद घटनाओं पर प्रकाश डालना नितान्त असंभव है, तो भी यह कहा जा सकता है कि ( १ ) देखो; ऊपर पृ० १३३ । ( २ ) देखो; ऊपर पृ० १३३ । ( ३ ) मानसिंह को अरणोद की जागीर मिली थी और वह महारावत प्रताप- सिंह के समय तक विद्यमान था । प्रतापप्रशस्ति (खंडित काव्य ) में इसकी बहुत कुछ प्रशंसा की गई है । ( ४ ) इसके वंशजों के अधिकार में भांतला का ठिकाना प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में है । ( ५ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ७। बड़वे की ख्यात में सूरजकुंवरी का नाम न होकर 'हरकुंवरी' नामक दूसरी कुंवरी बतलाई है, पृ० ४ । प्रतापगढ़ राज्य की उपर्युक्त पुरानी ख्यात और बड़वे की ख्यात में जो राणियों के नाम दिये हैं, उनमें से कुछ नाम नहीं मिलते और न उनके पिता आदि के नामों का ही मिलान होता है, परन्तु उसके एक राणी चंपाकुंवरी, चौहान खान की पुत्री थी, जिसने देवलिया में गोवर्धननाथ का मंदिर बनवाकर वि० सं० १७०५ ( ई० स० १६४८ ) में उसकी प्रतिष्ठा करवाई थी । इस राणी का नाम दोनों ख्यातों में मिलता है और गोवर्धननाथ के मंदिर की प्रशस्ति में भी यही नाम दिया है और महारावत हरिसिंह का उक्त राणी के उदर से उत्पन्न होना बतलाया है ।