राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत जसवंतसिंह १३७ जाने का उल्लेख है। इसके विपरीत 'हरिभूषण महाकाव्य' में कवि गंगाराम ने महारावत और कुंवर महासिंह की मृत्युवार्त्ता को छोड़कर महारावत का रामसिंह राठोड़ से युद्ध न करने एवं महासिंह का रामसिंह से युद्ध होने पर उस (रामसिंह) के परास्त होने का वर्णन करते हुए महाराणा का रामसिंह से अप्रसन्न होकर उसको अपने यहां से निकालने का वर्णन किया है, जो माननीय नहीं हो सकता, क्योंकि उसका कथन परंपरागत जन-श्रुति से भी विरुद्ध है। कवि गंगाराम ने अपने काव्य में देवलिया के किसी राजा का मृत्यु-प्रसङ्ग नहीं दिया है, जिससे हमारा तो यही अनुमान है कि नाटकों की भांति उसने अपनी रचना को सुखान्त बनाने का ही लक्ष्य रखा था, जैसा कि हम पहले भी लिख चुके हैं¹। महारावत जसवंतसिंह, उदयपुर में महाराणा की सेना से किस वर्ष लड़कर मारा गया, इस विषय में भी मत भेद है। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातें², माल्कम की रिपोर्ट, प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियर³, कविराजा बांकीदास-कृत 'ऐतिहासिक बातें'⁴ आदि में इस घटना का वि० सं० १६६० (ई० स० १६३३) में होना लिखा है; परंतु अमरकाव्य⁵ और राजप्रशस्ति महाकाव्य⁶ में इस युद्ध का वि० सं० १६८५ (ई० स० १६२८) में होना बतलाया है। स्वयं कविराजा श्यामलदास ने वीरविनोद में राजप्रशस्ति काम आने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है। मानसिंह, महारावत प्रतापसिंह के समय तक विद्यमान था। अमरकाव्य से स्पष्ट है कि महारावत जसवन्तसिंह के साथ कुंवर महासिंह काम आया था, जैसा कि उपर्युक्त अवतरण में उल्लिखित है। (१) देखो ऊपर पृ० ११४। (२) प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० ७। (३) मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट, पृ० १६८। (४) संख्या ३३७, १११५ और १५६६। (५) देखो; ऊपर पृ० १३६, टिप्पण ५। (६) देखो; ऊपर पृ० १३६, टिप्पण ६। १८