राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत हरिसिंह १४३ वह वादशाह शाहजहां की गद्दीनशीनी का आरंभिक युग था और महाराणा का भी शाही दरबार में अच्छा प्रभाव था । तथापि वादशाह [हाशिया: महारावत का शाही सेना के साथ जाकर देवलिया पर अधिकार करना] महाराणा से खिंच गया क्योंकि उन्हीं दिनों उस- (महाराणा) ने डूंगरपुर के स्वामी महारावल पुंजराज के समय वहां सेना भेज जंगी कार्यवाही की थी । फलतः वादशाह शाहजहां ने महारावत हरिसिंह को अपने अमीरों में प्रविष्टकर मंसब आदि से उसका सम्मान बढ़ाया१, एवं शाही सेना ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा मिलता है कि महारावत हरिसिंह के वादशाह के पास जाने पर बादशाह ने उसको सात हज़ारी मन्सब, 'महाराजा-धिराज- महारावत' की उपाधि, निशान आदि प्रदान किये । इस कथन की पुष्टि कैप्टन सी० ई० येट के 'गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़' से भी होती है। उसमें लिखा है कि शाहजहां ने महा- रावत हरिसिंह को खासा खिलअत, प्रदानकर नौ लाख रुपये आय की कांठल की जागीर का फ़रमान उसके नाम कर दिया एवं पन्द्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज़ दाख़िल करना स्थिर हुआ । साथ ही 'महाराजाधिराज-महारावत' की उपाधि-सहित सात हज़ारी मन्सब भी उसको मिला और मन्दसोर के हाकिम को मेवाड़ की सेना को हटाकर देव- लिया पर उसका अधिकार कराने का हुक्म दिया गया । उसने देवलिया पर अधिकार करने के पीछे वसाड़, आमलसर, अमलावदा, पानमोड़ी और मगरोदा पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया ( पृ० ७६ ) । मेजर के० डी० अर्सकिन ने भी अपने 'गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट' ( पृ० १६८ ) में संक्षेप में इन बातों का उल्लेख किया है। इनके विरुद्ध सर जॉन माल्कम अपनी रिपोर्ट ऑन दि प्राविंस ऑव् मालवा एंड एडजॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स (पृ० २२४-५) में महारावत हरिसिंह को बादशाह औरंगज़ेब से सनद, उच्च उपाधि, खिलअत झंडा आदि मिलना लिखता है, किंतु तत्सामयिक फ़ारसी तवारीख़ों बादशाहनामा और औरंगज़ेबनामा में इस सम्बन्ध का कुछ भी उल्लेख नहीं मिलता है। शाहजहां के समय के मंसबदारों की सूची में भी उसका कहीं नाम नहीं है और न इस सम्बन्ध का कोई फ़रमान प्रतापगढ़ राज्य में विद्यमान है। ऐसी दशा में इसका ठीक निर्णय होना कठिन है तथापि प्रतापगढ़ राज्य में महारावत हरिसिंह के नाम के वाद- शाह शाहजहां और औरंगज़ेब के समय के कई फ़रमान, शाहजादों के निशान आदि विद्यमान हैं, जिनको देखने से कहा जाता है कि वह वादशाह शाहजहां का विश्वास पात्र था । साथ ही वह शक्तिशाली भी था, जिससे शाहज़ादों ने पारस्परिक युद्ध में उसको अपनी-अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न किया था । उसके पुत्र प्रतापसिंह और पौत्र