राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास क्योंकि वहां महावतखां की मित्रता के कारण महारावत का भी परिचय था। उधर महाराणा ने, जो देवलियावालों से अत्यंत अप्रसन्न था और उक्त राज्य को नष्ट करना चाहता था, राठोड़ रामसिंह के साथ देवलिया पर सेना रवाना की, जिसने राजधानी देवलिया को लूटकर बरबाद किया १ । प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त ख्यातों में देवलिया पर महाराणा की सेना जाने का कुछ भी उल्लेख नहीं है, किंतु अमरकाव्य से प्रकट है कि महाराणा की सेना के देवलिया जाने पर वहां वालों ने उसका मुक़ाबला किया था २; परंतु महाराणा की बड़ी सेना के आगे उसकी कामयाबी नहीं हुई। सेना आने के समय उसके साथ धमोतर के ठाकुर गोपालदास का भी नाम दिया है और जोधसिंह को कुंवर लिखा है। वहां यह उल्लेख है कि मेवाड़ की सेना देवलिया में आने पर जब महारावत हरिसिंह दिल्ली गया, उस समय गोपालदास और उसके पुत्र जोधसिंह के अतिरिक्त महारावत का भाई केसरीसिंह भी उसके साथ विद्यमान था। वहां दिल्ली में गायें मारने के सम्बन्ध में क़साइयों से उसका झगड़ा हो गया, जिसमें केसरीसिंह मारा गया। बादशाह ने उक्त स्थान पर गोवध बन्द कर दिया और वहां उसकी आज्ञा से महारावत ने राममंदिर बनवाया। बादशाह अकबर के समय भारत में गौ-वध बन्द हो गया था और शाहजहां ने भी उसका अनुकरण किया था। ऐसी स्थिति में शाहजहां के समय गोवध का जारी रहना और महारावत का, जो शाही दरबार में अपने राज्य की प्राप्ति के लिए गया था, वहां इस संबंध में लड़ाई करना कुछ विपरीत जान पड़ता है। इस विषय में जब तक कोई पुष्ट प्रमाण न मिलें वास्त- विकता पर प्रकाश पड़ना असंभव है। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१६ और पृ० १०६० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५२२। राजप्रशस्ति महाकाव्य में महाराणा की सेना- द्वारा देवलिया लूटने का निम्नलिखित उल्लेख है— पुर्यां देवलियायां च लुंठनं रचितं जनैः ॥ २१ ॥ सर्ग पांचवां। (२) तदनु देवलियानगरस्य वा समररंगनटैश्च महाभटैः । रचितमेव विखंडनमंजसा जनगणैश्च विलुंठनमुत्कटैः ॥ अमरकाव्य ।