राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास साथ देकर उसको देवलिया पर अधिकार करने को रवाना किया१। इसपर महाराणा ने अपनी सेना को देवलिया से हटा लिया। फिर महाराणा ने धरियावद का परगना (जो मेवाड़वालों की तरफ़ से सादड़ी छूट जाने पर भी देवलियावालों के पास चला आता था२?) जब्त कर लिया, जिसके लिए महारावत ने शाही दरबार में बहुत कुछ उद्योग, किया परंतु उसमें उसको सफलता नहीं हुई। पृथ्वीसिंह को भी शाही दरबार से मन्सब मिले थे, जिससे अनुमान होता है कि महा- रावत हरिसिंह को भी कोई मन्सब अवश्य मिला होगा। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६१। नैणसी लिखता है कि महारावत हरिसिंह के बादशाह के पास जाने पर देवलिया महाराणा के अधिकार से निकाल दिया गया एवं महारावत की नौकरी उज्जैन और अहमदाबाद की तरफ़ नियत की नई (ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६७)। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६१ । महारावत विक्रमसिंह के समय से ही उसकी मेवाड़ की सादड़ी आदि की जागीर छूट गई थी, फिर धरियावद उसके वंशजों के पास कैसे रहा, इसका ख्यातों आदि से कुछ पता नहीं चलता। 'वीरविनोद' के उपर्युक्त कथन से तो यह अनुमान होता है कि विक्रमसिंह की मेवाड़ की जागीर में से सादड़ी आदि का कुछ इलाक़ा ही महाराणा उदयसिंह ने जब्त किया होगा और धरियावद आदि का अंश उसके अधिकार में बना रहा होगा, जिससे संतुष्ट न होकर विक्रमसिंह ने कांठल में रहना अख्तियार किया, परन्तु धरियावद पर उसने अपना अधि- कार बनाये रखा और समय-समय पर देवलिया के राजाओं की तरफ़ से महाराणाओं को शाही चढ़ाइयों के समय सहायता मिलती रही और इसी कारण से महाराणा प्रतापसिंह, अमरसिंह और कर्णसिंह ने उससे छेड़-छाड़ न की । फिर महाराणा जगत्सिंह ने महारावत हरिसिंह के शाही सेना लेकर पहुंचने पर धरियावद खालसे में मिला लिया, जो लगभग एक सौ वर्ष पीछे देवलियावालों को मेवाड़ की तरफ़ से पुनः प्राप्त हुआ, जिसका सविस्तर वर्णन आगे किया जायगा । कहीं-कहीं ऐसा भी लिखा मिलता है कि महारावत हरिसिंह ने देवलिया पर अधिकार हो जाने के पीछे बत्तीस गांवों में से बारे- वरदां और भांतला परगना मेवाड़ में से दबा लिया था। संभव है मेवाड़ के महाराणाओं पर बादशाह की नाराजगी होने पर उसने शाही फ़रमान के द्वारा ही उन्हें कब्जे में किया होगा, अन्यथा ऐसा होना संभव नहीं है। इस सम्बन्ध में अब तक पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री नहीं मिली है, जिससे निश्चित मत प्रकट किया जा सके ।