राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत हरिसिंह १४५ 'वीरविनोद' के कर्त्ता कविराजा श्यामलदास का कथन है—'महा- रावत बाघसिंह से लेकर सिंहा तक महाराणा के फर्माबर्दार और ख़ैरख्वाह रहे और बड़ी बड़ी लड़ाइयों में बहादुरी दिखलाई। अगर महाराणा जगत- सिंह जसवन्तसिंह को धोखे से न मार डालते, तो हरिसिंह महावतखां का वसीला ढूंढ़कर बादशाही नौकर बनने की कोशिश नहीं करता; क्योंकि डूंगरपुर, बांसवाड़ा और रामपुरा के रईस चित्तौड़ छूटने के बाद अक़बर बादशाह से जा मिले थे, लेकिन देवलियावाले इस बात के इख्तियार करने को बहुत बुरा समझते थे' । प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों आदि से यह स्पष्ट नहीं होता कि महारावत हरिसिंह ने शाही सेना की सहायता से किस वर्ष देवलिया पर अधिकार किया, पर मसलाणा (मचलाणा) गांव के वि० सं० १६६६ पौष सुदि ११ (ई० स० १६४२ ता० २१ दिसंबर) के ताम्रपत्र से प्रकट होता है कि उक्त संवत् में महारावत हरिसिंह का वहां पर अधिकार था और उसने उपर्युक्त गांव दान किया। संभव है कि इसके पहले ही वह अपने साथ शाही सेना लाया हो। महावतखां की, जिसका महारावत के साथ पूरा ताल्लुक़ था, दक्षिण में वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में मृत्यु हुई। ऐसी अवस्था में उसका वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) के पूर्व ही देवलिया पर अधिकार होजाने का अनुमान होता है। किन्तु वसाड़ और अरणोद के परगने औरंगज़ेब के समय महारावत हरिसिंह को मिलना पाया जाता है, जिसका उल्लेख आगे किया जायगा। देवलिया राज्य से मेवाड़ की सेना का उत्पात मिटाने के पीछे महा- रावत का प्रायः शाही दरबार में आना-जाना होता रहा। वि० सं० १७०१ (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६१। (२) मचलाणा गांव का बाबा हंसपुरी के नाम का ताम्रपत्र। यह ताम्रपत्र इस समय अप्राप्य है। पंडित जगन्नाथ शास्त्री ने हमारे पास इस ताम्रपत्र की प्रतिलिपि भेजी है, जिससे पाया जाता है कि यह ताम्रपत्र जोशी हरजी के दिए से पंचोली गोविंद ने लिखा था। १६