राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी सुनवाई नहीं हुई¹। इसी बीच भानुसिंह भी महाराणा के पास पहुंचा और वहां एक दिन उसके तथा जोधसिंह के बीच दरबार में ही कहा-सुनी हो गई। महाराणा के समझाने से उस समय तो बात दब गई और भानुसिंह वहां से देवलिया² तथा जोधसिंह अपने निवासस्थान को लौट गया। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद जब जोधसिंह के उपद्रव में कमी न दीख पड़ी तब भानुसिंह मंदसोर के शाही फ़ौजदार मक्खनखां से मिला और दोनों ने अपनी सम्मिलित सेना-द्वारा जोधसिंह को दंड देना निश्चित किया। एक दिन वे दोनों पंद्रह सौ सवारों की भीड़-भाड़ के साथ जोधसिंह पर चढ़ गये। जोधसिंह भी अपने सौ सवारों और दो सौ पैदलों के साथ उनके सामने जा डटा । चीताखेड़े से कुछ दूरी पर एक वट वृक्ष के पास दोनों दलों में लड़ाई हुई, जिसमें सय्यद मक्खन और महारावत भानुसिंह जोधसिंह के हाथ से मारे गये, साथ ही जोधसिंह भी जीवित न बचा³। 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्त्ता कवि गंगाराम अपने ग्रन्थ में महारावत तेजसिंह के पीछे सिंहा के देवलिया का स्वामी होने और सिंहा की तरफ़ से उसके पितृव्य भानुसिंह के मक्खन की सहायतार्थ शक्तावत जोधसिंह से युद्ध करने का वर्णन करते हुए जोधसिंह और माखन (मक्खनखां)
(१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १०५६ । (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६ । कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६८ । प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात (पृ० ३) में उस (भानुसिंह) का उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) के समय रणवीर (रणबाजख़ां) के साथ की लड़ाई में मारे जाने का उल्लेख है, जो बिल्कुल ग़लत है। उदयपुर का महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) इस घटना के लगभग सौ वर्ष पीछे वि० सं० १७६७ (ई० स० १७१०) में वहां का स्वामी हुआ था।