राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
DevanagariHindipublished534 पृष्ठ
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११० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
उन्हें नये सिरे से जागीरें दीं। वि० सं० १६५३ (ई० स० १५६७) में उसका परलोकवास होने पर उसका पुत्र अमरसिंह (प्रथम) मेवाड़ का स्वामी हुआ। महाराणा उदयसिंह के पौत्र और शक्तिसिंह के पुत्र जोधसिंह¹ ने उन दिनों महाराणा की आज्ञानुसार मोखम, कराड़िया, कुंडल की सादड़ी (छोटी सादड़ी) और जीरण के कुछ गांव ठेके पर लेकर अपने भाई बाघसिंह के साथ वहां रहना आरंभ किया²। फिर महाराणा ने उसको नीमच और जीरण का पट्टा कर दिया³। जोधसिंह वीर-प्रकृति का पुरुष था। क्रमशः अपना बल बढ़ाकर उसने देवलिया के गांवों को लूटना आरंभ किया और नीमच से भी वह चौथ मांगने लगा⁴। इससे देवलिया के स्वामी भानुसिंह को भय हुआ कि वह देवलिया पर भी कभी दांत लगावेगा। निदान उसने जीरण के शाही फ़ौजदार को बहकाया कि जोधसिंह और बाघसिंह को तुम यहां क्यों रहने देते हो ? वे बड़े आपत्तिकारक हैं और तुमको मार डालेंगे⁵। भानुसिंह के शाही अफ़सरों से मेल-मिलाप रखने की नीति से जोधसिंह पहले से ही असंतुष्ट था। भानुसिंह-द्वारा मंदसोर के शाही फ़ौज- [पार्श्व टिप्पणी: महारावत भानुसिंह और शक्तावत जोधसिंह के बीच युद्ध होना] दार के अपने विरुद्ध भड़काये जाने की ख़बर पाकर वह क्रुद्ध हो गया और उसकी उस(भानुसिंह) से पूरी शत्रुता हो गई। मंदसोर के शाही फ़ौजदार ने, जो सय्यद था, जोधसिंह के विरुद्ध महाराणा अमरसिंह से शिकायत की, परंतु वहां जोधसिंह का प्रबल प्रभाव होने से उसके विरुद्ध होनेवाली शिकायतों
(१) इसके वंशधर कणगेटी (मेवाड़ !) के सरदार हैं। (२) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६। (४) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। (५) वही; पृ० ६५।