राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत भानुसिंह १०६ भानुसिंह ˙महारावत भानुसिंह, जिसको 'भाना' अथवा 'भवानीसिंह' भी कहते राज्य-प्राप्ति थे, विक्रम संवत् १६५० (ई० स० १५६३ ) में देवलिया की गद्दी पर बैठा । ग्वालियर राज्य के जीरण और नीमच के परगने, जो इस समय मालवे में हैं, पहले मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत थे । महाराणा उदयसिंह और प्रतापसिंह के राज्य-काल में शाही सेना की चढ़ाइयों भानुसिंह और शक्तावत के समय वे महाराणा के हाथ से निकल गये और जोधसिंह सीसोदिया के बीच विरोध होना उनपर वादशाही अधिकार हो गया । वहां के शाही थानों पर बादशाह की तरफ़ से सय्यद लोग नियत हुए । महाराणा प्रतापसिंह की तरफ़ से रावत गोविन्ददास खंगारोत ( बेगमवालों का पूर्वज ) नउवे वाघरेड़े ( वाठरडे ? ) के थाने पर नियत था । वह सय्यदों से लड़कर मारा गया । वि० सं० १६४३ ( ई० स० १५८६ ) में उक्त महाराणा ने चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़कर सारे मेवाड़ पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया । उस (प्रतापसिंह )- के पिछले समय में मेवाड़ पर बादशाही सेना का आक्रमण न हुआ, जिससे उसे अपने देश की स्थिति सुधारने का अवसर मिला और उसने विपत्ति के समय अपना साथ देनेवाले सरदारों आदि की सेवाओं के एवज़ में करते हैं, जिससे काल पाकर वास्तविकता केवल कवि-कल्पना ही मान ली जाती है । ऐतिहासिक अंश अल्प होने पर भी वे घटनाओं को अपनी रचना में तिल का ताड़ बना कर दिखलाते हैं। कवि गंगाराम ने भी 'हरिभूषणमहाकाव्य' में ऐसा ही किया है, अतएव उक्त काव्य में महारावत तेजसिंह के विषय का जो वर्णन है, वह अति- शयोक्तिपूर्ण है और समय को देखते हुए महारावत तेजसिंह के समय के इतिहास के विपरीत है।