भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१०२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात से ज्ञात होता है कि उस- (विक्रमसिंह) के चार राणियां थीं¹, किंतु एक दूसरी ख्यात में उसके विक्रमसिंह की राणियां पांच राणियां होना लिखा है² । उसके चार पुत्र और संतति तेजसिंह, सुरजन³, शार्दूलसिंह⁴ एवं किशनदास⁵ और किशनकुंवरी नामक पुत्री हुई⁶ । रावत विक्रमसिंह वीर, मित्रवत्सल और स्वतंत्रताभिमानी राजा था । उसको पराधीन रहकर जीवन व्यतीत करना असह्य था । इसलिए विक्रमसिंह का व्यक्तित्व उसने मेवाड़ के बाहर जाकर अपने बाहुबल से कांठल के मीणों एवं अन्य लड़ाकू जातियों पर विजय प्राप्तकर अपनी भावी संतान के लिए एक स्वतंत्र राज्य क़ायम किया, ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २-३ । इस ख्यात में विक्रमसिंह के पुत्रों के नाम तेजसिंह, शार्दूलसिंह, सुरजन, केशवदास और किशनसिंह तथा पुत्रियों के नाम वल्लभकुंवरी और लालकुंवरी दिये हैं । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ४ । ( ३ ) सुरजन के वंशज प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में रायपुर के सरदार हैं । उसके पुत्र रामदास को रायपुर की जागीर मिलकर उसका पृथक् ठिकाना क़ायम हुआ । ( ४ ) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त एक पुरानी ख्यात में शार्दूलसिंह को सीधपुरा. और वैरा गांव महारावत विक्रमसिंह-द्वारा मिलने का उल्लेख है । ( ५ ) प्रतापगढ़ राज्य से मिली हुई एक पुरानी ख्यात में महारावत विक्रमसिंह का किशनदास को भांतला की जागीर देने का उल्लेख है एवं उसके लिए ख्यातों में लिखा है कि वह (किशनदास) महाराणा प्रतापसिंह के समय किसी युद्ध में काम आया और इस सेवा के बदले में महाराणा ने किशनसिंह के पुत्र को जीरण के पास अगरान गांव दिया, जो इस समय ग्वालियर राज्य के अन्तर्गत है । ( ६ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ६ । इस ख्यात में केशवदास का नाम विक्रमसिंह के पुत्रों में है एवं वल्लभकुंवरी और लालकुंवरी के नाम पुत्रियों में नहीं हैं । 'वीरविनोद' (द्वितीय भाग, पृ० १०५६) में भी उस (विक्रमसिंह) के पुत्रों के नाम सही होने में बड़वा-भाटों के कथन पर कुछ संदेह प्रकट किया है ।