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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस घटना का वृत्तांत संक्षेप से हमने डूंगरपुर और बांसवाड़ा राज्य के इतिहासों में दिया है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में इस घटना का कुछ भी वर्णन नहीं है। अनुमान होता है कि जब प्रतापसिंह के समय महारावल आसकरण ने किशनसिंह तथा उसके वंशजों को बांसवाड़ा राज्य दिलाने का उद्योग किया, तब उस (आसकरण)- के विरुद्ध विक्रमसिंह को प्रतापसिंह का पक्ष लेकर युद्ध करना पड़ा हो। 'हरिभूषण महाकाव्य' में इस संबंध में विस्तृत वर्णन है, जो अलंकारिक ढंग से है और काव्यों में प्रायः अतिशयोक्ति भी पाई जाती है। इस दृष्टि से वह इस दोष से वंचित नहीं हो सकता, परंतु फिर भी वह इस युद्ध के प्रसंग में बहुत कुछ प्रकाश डालता है, जिसका ख्यातों में अभाव है। उससे महारावत विक्रमसिंह की वीरता, रण-कुशलता एवं मित्र-वत्सलता का यथेष्ट परिचय मिलता है। वहां इस घटना का कोई संवत् नहीं दिया है। ऐसी दशा में आसकरण और विक्रमसिंह के बीच यह युद्ध किस समय हुआ इसके विषय में निश्चित् रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता; परंतु आसकरण का राज्य-समय वि० सं० १६०७-१६३६१ (ई० स० १५५१-१५८०) तक तथा प्रतापसिंह का राज्य-समय वि० सं० १६०७-१६३६२ (ई० स० १५५०-१५७६) तक निश्चित् है और विक्रमसिंह की गद्दीनशीनी वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) तथा देहांत दामाखेड़ी गांव के उस(विक्रमसिंह) के पुत्र तेजसिंह के वि० सं० १६२१ भाद्रपद सुदि ११ (ई० स० १५६४ ता० १८ अगस्त) के ताम्रपत्र३ से वि० सं० १६२० (ई० स० १५६३) के आस-पास होना पाया महान् प्रतापस्य जयस्तदाऽऽसीद्भूतसुरेभ्यो जयपुष्पवृष्टिः । सुखं स वंशल्यमध्यवर्ती निर्विघ्नमन्तःपुरमन्दिरेषु ॥ २१ ॥ सर्ग ६ । (१) देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० ३, भाग १ (डूंगरपुर राज्य का इतिहास), पृ० ६६ । (२) वही; भाग २ (बांसवाड़ा राज्य का इतिहास), पृ० ८१ । (३) ......श्रीमहारावतजी श्रीतेजसीं(सिं)घजी वचनातु आगे