राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत रायसिंह ८७ कठोर हृदय करके धाय पन्ना ने वनवीर द्वारा अपने पुत्र का मारा जाना देखा और जब वह वहां से चला गया तो वह अपने मृतक पुत्र का अग्नि संस्कार कर वहां से चल दी। लुक-छिपकर क़िले के बाहर निकल वह पूर्व संकेत के अनुसार जहां बारी उदयसिंह को लेकर ठहरा हुआ था वहां गई। फिर वह उदयसिंह को लेकर रावत रायसिंह के पास सादड़ी पहुंची। रावत रायसिंह ने धाय पन्ना के मुख से विक्रमादित्य के मारे जाने की बात सुनकर खेद प्रकट किया और उसको आश्वासन देकर अपने यहां ठहराया; किन्तु स्थायी- रूप से उन्हें अपने यहां रख बनवीर का विरोधी बनने की उसमें शक्ति न थी, इसलिए उसने उस (उदयसिंह) को सुरक्षित रूप से डूंगरपुर भिजवा दिया¹। डूंगरपुर पहुंचने पर वहां के महारावल पृथ्वीराज ने उसका सम्मान तो किया; परन्तु वनवीर से विरोध होने में हानि समझ उसको अपने यहां [हाशिया: वनवीर को चित्तौड़ से निका- / लने के लिए रावत रायसिंह / का महाराणा की सहायतार्थ / जाना] थोड़े ही समय तक रखा और उदयसिंह के लिए सबसे सुरक्षित स्थान कुंभलगढ़ समझ सवारी आदि का यथोचित प्रबंध कर उसने उस (उदयसिंह) को वहां पहुंचा दिया। वहां के दुर्गाध्यक्ष आशाशाह नामक देपुरा (माहेश्वरी) महाजन ने अपनी माता के आग्रह करने पर उदयसिंह को अपने पास रक्खा²। धीरे-धीरे यह बात प्रकाश में आने लगी कि उदयसिंह मारा नहीं गया है और धाय-सहित कुंभलगढ़ पहुंच गया है, जहां वह सही-सलामत है। तब चौहान खान (कोठारिये के रावत का पूर्वज) आदि बड़े-बड़े सरदार कुंभलगढ़ पहुंचे और उन्होंने दूसरे सरदारों को भी वहां बुलाया। फिर (१) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६१। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०३। कर्नल टॉड और 'वीरविनोद' के इस कथन से कि धाय पन्ना उदयसिंह को लेकर देवलिया के स्वामी रायसिंह के पास देवलिया पहुंची थी, पाया जाता है कि उस समय रायसिंह देवलिया में रहता होगा। (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६८-६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६२। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०३।