राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को उस (विक्रमादित्य) से पूर्ण घृणा हो गई और वे उसको राज्यच्युत करने का उद्योग करने लगे। इस षड्यंत्र में महाराणा संग्रामसिंह के परलोकवासी कुंवर पृथ्वीराज के दासी-पुत्र वनवीर को भी (जो विक्रमादित्य का कृपापात्र था) सरदारों ने शामिल कर लिया। कुछ समय बाद ही अपना प्रभुत्व स्थापित हो जाने पर विक्रमादित्य तथा उदयसिंह को मार निष्कंटक राज्य करने का विचारकर वनवीर ने वि० सं० १५६३ (ई० स० १५३६) में एक दिन रात्रि के समय विक्रमादित्य को मार डाला १। विद्युत्-वेग की भांति यह समाचार राज-महलों में फैल गया और अन्तःपुर में कुहराम मच गया। मध्य रात्रि में; राज-महलों में रोना-पीटना शुरू हो जाने से लोग आश्चर्यान्वित हो गये और एक बारी (पत्तल आदि बनानेवाले) ने उदयसिंह की धाय पन्ना खींची से भी यह बात कह सुनाई। बारी के मुख से वनवीर-द्वारा विक्रमादित्य के मारे जाने की बात सुनकर धाय को बड़ी चिंता हुई और उसे भय हुआ कि वह अब उदयसिंह को भी अवश्य मारेगा। अतएव उसने बड़ी फुर्ती से उदयसिंह को बारी के साथ बाहर निकाल दिय और उसके स्थान पर अपने पुत्र को सुला दिया, जो उदयसिंह की अवस्था का था। धाय ने यह परिवर्त्तन इतनी शीघ्रता से किया कि दूसरा कोई इस भेद को न जान सका। इतने में हाथ में नंगी तलवार लिए वनवीर वहां पहुंचा और उसने धाय से पूछा कि उदयसिंह कहां है। तब पन्ना ने पलंग पर सोये हुए बालक की तरफ़ संकेत किया। बनवीर, उदयसिंह को मारकर निष्कंटक राज्य करना चाहता था; इसलिए पूरी-पूरी जांच किये बिना ही उसने शीघ्रतापूर्वक उस सोये हुए बालक पर तलवार का प्रहार किया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई २। (१) टॉड; राजस्थान; जि०-१, पृ० ३६७ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३३। मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमाजीत का जीवनचरित्र; पृ० ७८-७६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०१ । (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६७-८ । वीरविनोद; द्वितीयं भाग, पृ० ३३ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०१ ।