भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

महारावत रायसिंह ८५ महाराणा की विजय होना आदि कथन¹ भी उसका ज्यों का त्यों स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि अनेक प्रमाणों से उपर्युक्त युद्ध में बाघसिंह की मृत्यु होना और बहादुरशाह की विजय होकर थोड़े दिनों तक उसका चित्तौड़ पर अधिकार रहना सिद्ध है, जैसा कि हम ऊपर बतला चुके हैं। बाघसिंह का कोई शिलालेख तथा ताम्रपत्र नहीं मिला है, जिससे उसके जीवन पर अधिक प्रकाश पड़ना कठिन है, तो भी उसका जो-कुछ इतिहास प्राप्त है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वह देशभक्त और वीर क्षत्री था ! रायसिंह बाघसिंह के वि० सं० १५६१ (ई० स० १५३५) में मालवे की जागीर छोड़ने पर मेवाड़-राज्य ने सादड़ी आदि की पैतृक जागीर पुनः उसको [राज्य-प्राप्ति] बहाल कर दी, अतएव उसका कुटुंब सादड़ी में ही रहने लगा और जब बाघसिंह का बहादुरशाह की चढ़ाई के समय युद्ध में परलोकवास हो गया, तब उसका पुत्र रायसिंह अपने पिता की संपत्ति का अधिकारी हुआ। चित्तौड़ पर उसके पिता के वीरतापूर्वक काम आने से उसको मेवाड़-राज्य की तरफ़ से धरियावद की जागीर भी प्रदान की गई²। चित्तौड़ से गुजरात की सेना को भगाकर राजपूतों ने वहां पर पीछा अधिकार कर लिया और फिर विक्रमादित्य को बूंदी से बुलाकर उसको [धाय पन्ना का बनवीर के डर] चित्तौड़ का राज्य सौंप दिया; किन्तु उसका [से उदयसिंह को रायसिंह के] आचरण न सुधरा । उसने बात-बात पर सरदारों [पास ले जाना] का अपमान करना जारी रखा, यहां तक कि अपने पिता संग्रामसिंह (सांगा) को कुंवरपदे में भ्रातृ-विरोध के समय आश्रय देनेवाले पंवार कर्मचंद्र का भी उसने अपमान किया। यह देख सरदारों ( १ ) वही; सर्ग ५, श्लोक १-२० । ( २ ) अर्शकिंन; राजपूताना गैज़ेटियर (मेवार रेज़िडेंसी); जि० २ ए, पृ० १६७ (ई० स० १६०८)। एक ख्यात में साटोला भी जागीर में मिलने का उल्लेख है।