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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास [बाघसिंह की राणियां और संतति] पांच राणियां थीं, जिनसे छः पुत्र—रायसिंह, जेतमाल भारमल, कान्हा, खानजी¹, मानजी—तथा दो पुत्रियां रामकुंवरी और शामकुंवरी उत्पन्न हुईं² । रावत बाघसिंह युद्ध-वीर, धर्मप्रिय और दानी नरेश था । स्वदेश- प्रेम और कुलाभिमान उसकी नसों में कूट-कूट कर भरा हुआ था । [रावत बाघसिंह का व्यक्तित्व] उसने निःस्वार्थ भाव से चित्तौड़ की रक्षा के लिए अपने प्राण उत्सर्गकर संसार के सामने एक बड़ा आदर्श उपस्थित किया । उसमें एक विशेष गुण यह भी था कि अपने पूर्वजों-द्वारा दान में दी हुई भूमि उसने पीछी नहीं ली; अपितु जब वह युद्ध क्षेत्र में महाराणा का प्रतिनिधि बन कर लड़ने गया, उस समय उसने राजमाता कर्मवती हाड़ी से अपने पिता सूरजमल-द्वारा मेवाड़ में दान किये हुए गांव सदा के लिए बहाल रहने की प्रतिज्ञा करा ली। इस उदाहरण से उसके चरित्र की महत्ता सिद्ध होती है। यदि उस अवसर पर वह राजमाता से नया पट्टा तथा अधिक सम्मान मांगता तो वह भी मिल सकता था; परन्तु उस वीर ने अपने वंशजों के लिए राजपूती स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी याचना न कर केवल उपरिलिखित याचना की, जो उसके निर्मल चरित्र का परिचय देती है । 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्त्ता कवि गंगाराम महारावत बाघसिंह की प्रशंसा करता हुआ, उसको विलासप्रिय नरेश बतलाता है³; किंतु गंगाराम का यह मत ग्राह्य नहीं हो सकता, क्योंकि यदि वह विलासप्रिय व्यक्ति होता तो युद्ध-क्षेत्र में मरने को कभी सन्नध नहीं होता । गंगाराम, बहादुरशाह से युद्ध होना तो लिखता है; किंतु बाघसिंह के धराशायी होने का कुछ भी वर्णन नहीं करता । गुजराती सैन्य का भाग जाना और

( १ ) खानजी के वंशज आंवीरामा और बोड़ी सालथली के प्रथम वर्ग के सर- दार हैं और वे खानावत कहलाते हैं । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २ । ( ३ ) गंगाराम; हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग ४, श्लोक ३-३१ ।