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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 534 में से

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महारावत बाघसिंह ८३ मालवा और गुजरात के विशाल राज्यों को अपने अधीन कर लिया। अभागा बहादुरशाह अपना राज्य गंवाकर दीव बंदर के पास पोर्चुगीज़ों के हाथ से मारा गया। हुमायूं के मुक़ाबले में बहादुरशाह के परास्त होने का समाचार सुनकर चित्तौड़ में रही-सही गुजराती सेना भी भागने लगी। ऐसा सुअवसर देख मेवाड़ के बचे हुए सरदारों ने थोड़े-बहुत राजपूतों को एकत्र कर गुजराती सेना पर (जो चित्तौड़ में नियत थी) आक्रमण कर दिया, जिससे सुलतान की बची हुई सेना भाग गई और बिना अधिक रक्तपात के ही मेवाड़वालों का पुनः चित्तौड़ पर अधिकार हो गया¹। कर्नल टॉड ने इस युद्ध में महारावत बाघसिंह के काम आने की बड़ी प्रशंसा की है। उसका कथन है कि जिस दिन मेवाड़ का राज्य-चिह्न 'छांगी' सूरजमल के पुत्र (बाघसिंह) के शीश पर उठाई गई, उस दिन उसका जैसा प्रकाश हुआ, वैसा कभी न हुआ²। सचमुच अपने देश की रक्षा के लिए तो वीरों के युद्ध में मारे जाने के इतिहास में अनेक उदाहरण हैं, परन्तु निःस्वार्थ भाव से इस प्रकार आगे बढ़कर काम आने के उदाहरण बहुत कम मिलेंगे। बाघसिंह के पिता सूरजमल और पितामह क्षेमकर्ण से मेवाड़ के महाराणाओं का विरोध रहा था, पर चित्तौड़ पर आपत्ति के समय उन सब बातों को भूलकर अपने प्राणों की बाज़ी लगा देना अवश्य ही बाघसिंह के सद्गुणों का परिचायक है। महाराणा का प्रतिनिधि बन- कर चित्तौड़ की रक्षा में वीरगति प्राप्त करने के कारण उस (बाघसिंह) के वंशजों की उपाधि 'दीवान' हुई और वे देवलिया के दीवान कहलाते हैं³। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में लिखा है कि उस (बाघसिंह) के (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३२-३३। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४००। मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमादित्य का जीवन- चरित्र; पृ० ७४-६। (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६३। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३० टिप्पण १ तथा पृ० १०५४। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६८, टिप्पण २।