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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 534 में से

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८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास. सेना ने दुर्ग में प्रवेश किया। राजमाता कर्मवती ने जब दुर्ग बचने की आशा न देखी तो बहुतसी स्त्रियों के साथ जौहर किया। इस युद्ध में सुलतान बहादुरशाह विजयी हुआ और उसने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। यह युद्ध चित्तौड़ का 'दूसरा शाका' कहलाता है१। बहादुरशाह का थोड़े समय तक ही चित्तौड़ पर अधिकार रहा। वह अपना अधिकार स्थिर भी न करने पाया था कि बादशाह हुमायूं ने उसपर चढ़ाई कर दी। मन्दसोर के निकट दोनों में लड़ाई हुई, जिसमें बहादुरशाह हारकर मांडू की तरफ़ भाग गया। फिर तो हुमायूं ने उसका पीछाकर (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ५४-५। टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३०३। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६६ । मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमादित्य का जीवनचरित्र; पृ० ६६-७३ । मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३३) में बहादुरशाह की चित्तौड़ पर चढ़ाई होने और दुर्ग पर सुलतान का अधिकार होने का उल्लेख किया है (भाग १, पृ० ५५), परन्तु उसका वि० सं० १५८६ में सुलतान का चित्तौड़ पर अधिकार होने का कथन ठीक नहीं जान पड़ता, क्योंकि वहीं पहली बार की चढ़ाई में सुलतान के चित्तौड़ को घेर लेने और फिर संधि होकर लौट जाने तथा दूसरी बार की चढ़ाई में सरदारों के काम आने एवं जौहर होने के पीछे सुलतान का अधिकार होने का वर्णन है। ऐसी स्थिति में पहली चढ़ाई वि० सं० १५८६ में और दूसरी वि० सं० १५६१ में होकर उस समय जौहर होना एवं चित्तौड़ पर सुलतान का अधिकार होना मानना पड़ेगा। फ़ारसी तवारीखों में बहादुरशाह की चित्तौड़ की दोनों चढ़ाइयों की घटना आस-पास की होने से उनका वर्णन एक ही स्थल पर किया है और वर्णन भी कुछ अस्पष्ट है। इसलिए यह संभव है कि कर्नल टॉड ने भी ये दोनों घटनाएं एक ही समझ उनका संवत् १५८६ में घटित होना लिख दिया हो। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में एक स्थान पर माघ सुदि ४ शुक्रवार को बाघसिंह की मृत्यु होना लिखा है, परन्तु वि० सं० १५६१ माघ सुदि ४ को शुक्रवार नहीं, अपितु मंगलवार था। इसलिए ख्यात के लेखानुसार माघ सुदि ४ को मृत्यु होना माना नहीं जा सकता। 'वीरविनोद' में वि० सं० १५६२ चैत्र सुदि ५ को अंतिम युद्ध होना लिखा है, जो फ़ारसी तवारीखों से भी ठीक जान पड़ता है।