राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत प्रतापसिंह १७७
प्रतापसिंह वि० सं० १७३० (ई० स० १६७३) के लगभग महारावत हरिसिंह [राज्य-प्राप्ति] का परलोकवास हो जाने पर उसका ज्येष्ठ कुंवर प्रतापसिंह देवलिया का स्वामी हुआ। उसकी गद्दीनशीनी के थोड़े ही दिनों बाद बादशाह औरंगज़ेब ने सन् जुलूस १७ (हि० सन् १०८५ = वि० सं० १७३१ = ई० स० १६७४) में [महारावत को खिलअत तथा मंसब मिलना] उसको चार सौ ज़ात और तीन सौ सवारों का मंसब देकर तनख्वाह के एवज़ में जागीर तथा ख़िल- अत प्रदानकर ता० ८ रबीउस्सानी (आषाढ सुदि १० = ता० ३ जुलाई) को उसके पास इस आशय का फ़रमान भेजा—"तुमने अपनी अर्ज़ी में जागीर सौंपी जाने के संबंध में प्रार्थना कर चार वर्ष के भीतर ७०००० रुपये सूबे मालवे के शाही ख़ज़ाने में दाख़िल करना स्वीकार किया है। अपनी तरफ़ से कृपा दिखलाने के लिए हमने तुमको ४०० ज़ात और ३०० सवारों का मंसब देने के साथ ही जागीर और खिलअत बख़्शी है। इसकी पहुंच से सूचित करो। मालवे के सूबे के नाज़िम को प्रसन्न करने का तुमको पूरा उद्योग करना चाहिये¹।" महारावत प्रतापसिंह की गद्दीनशीनी के पीछे सात वर्ष तक मेवाड़ में महाराणा राजसिंह राज्य करता रहा। उक्त महाराणा और महारावत [शाही दरबार से महाराणा राजसिंह और महारावत की तक़रार की जांच के लिए शेख़ इनायतुल्ला का भेजा जाना] प्रतापसिंह के बीच झगड़ा बना ही रहा। महा- रावत ने इस सम्बन्ध में शाही दरबार में अपनी फ़रियाद पहुंचाई। इसपर बादशाह औरंगज़ेब ने तहक़ीक़ात के लिए शेख़ इनायतुल्ला को नियत किया और महारावत के नाम नीचे लिखा आज्ञापत्र भेजा— "इन दिनों तुम्हारी भेजी हुई अर्ज़ी से तुम्हारी और राणा राजसिंह की लड़ाई का हाल ज्ञात हुआ। हमारे हुज़ूर से यह हुक्म दिया जाता है कि (१) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद। २३