राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हमारा आदमी जाकर इस बात की तहक़ीकात करे। इसलिए शेख इनायतुल्ला नियत किया जाता है कि वह पूरा हाल मालूम कर जो वास्त- विकता हो वह हमारे सामने निवेदन करे। यदि अभी तक युद्ध हो रहा हो तो शेख उसे रोक देगा। उम्मेद है कि हमारी आज्ञा के अनुसार कार्य किया जायगा'।” मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने बादशाह की इच्छा के विरुद्ध श्रीनाथजी आदि की मूर्तियों को मेवाड़ में रखा; जज़िया के संबंध में [मेवाड़ पर बादशाह] बादशाह को बड़ा कठोर पत्र लिखा और जोधपुर [औरंगज़ेब की चढ़ाई और] के महाराजा जसवंतसिंह के बालक पुत्र अजीतसिंह [महारावत के नाम फ़रमान] को अपने यहां आश्रय दिया। इन सब कारणों से [पहुंचना] बादशाह महाराणा से अप्रसन्न हो गया और उसने उसको सज़ा देने का विचार कर अपने शाहज़ादों को, जो बाहिर सूबों पर नियत थे, मेवाड़ में सेना-सहित जाने की आज्ञा भेजी। फिर वि० सं० १७३६ (ई० स० १६७६) में बादशाह ने स्वयं अजमेर जाकर मेवाड़ पर चढ़ाई की। इस अवसर पर सन् जुलूस २३ (हि० सन् १०६० = वि० सं० १७३६ = ई० स० १६७६) में बादशाह ने महारावत के नाम नीचे लिखा फ़रमान भेजा- “ता० ७ ज़िल्काद (मार्गशीर्ष सुदि ६ = ता० १ दिसंबर) को हमारी बहा- दुर सेना राणा राजसिंह को सज़ा देने के लिए अजमेर से प्रस्थान करेगी। इसलिए यह फ़रमान भेजा जाता है कि राणा के इलाक़े को लूटने के लिए अपने आदमी नियत कर दो और स्वयं मंदसोर में रहकर हमारी सेना के लिए रसद का प्रबंध करो, क्योंकि हम ता० २१ ज़िल्काद (पौष वदि ८ = ता० १५ दिसंबर) को रवाना होकर मंदसोर पहुंचेंगे। राणा से बदला लेने की तुम्हारी सदैव इच्छा रही है, अतएव यह अवसर तुम्हें सौभाग्य से मिल गया है। तुम्हें चाहिये कि राणा के इलाक़े में, जो तुम्हारी ज़मींदारी से मिला हुआ है, लूट से वरी न समझो और जिस क़द्र लूट-खसोट तुमसे उसके इलाक़े में हो सके उसमें कमी न करो। इस काम को बादशाही आज्ञा के अनुसार अपनी ( १ ) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद।