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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 534 में से

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प्रतिष्ठा-वृद्धि का कारण समझो, तथा स्वामीभक्ति-पूर्ण सेवा-भावना से शाही कृपा और पुरस्कारों के उम्मीदवार रहो । जिस मार्ग से हम मंदसोर जाते हैं, देवलिया वहां से छः-सात कोस रहता है । तुम हमारे मंदसोर पहुंचने पर अच्छे आदमियों के साथ उपस्थित होकर हमारे दर्शनों का लाभ प्राप्त करो और नियत की हुई सेवा को अपनी उन्नति का उत्तम साधन समझो' ।" इसपर महारावत प्रतापसिंह भी अपनी सेना-सहित मंदसोर में बादशाह के पहुंचने पर शाही सेना के शामिल हो गया । फिर वहां से बाद- शाह ने अपनी विशाल सेना के साथ मेवाड़ में प्रवेश किया और उदयसागर तक जा पहुंचा । शाहज़ादे मुअज्जम, आज़म और अकबर भी मेवाड़ में पहुंच गये और बादशाह की आज्ञानुसार भिन्न-भिन्न मार्गों से उन्होंने महाराणा राजसिंह पर आक्रमण किया । कई महीनों तक शाही फ़ौज और महाराणा की सेना के बीच युद्ध होता रहा । जब बादशाह को शीघ्र मेवाड़ के युद्ध में विजय-प्राप्ति की आशा न दीख पड़ी तो वह वहां से पीछा चित्तौड़ होता हुआ अजमेर लौट गया । उसने मेवाड़ को विजय करने का भार शाहज़ादे मुअज्जम, आज़म और अकबर पर छोड़ा, जो महाराणा के हमलों को रोकने एवं उसपर आक्रमण कर उसका बल तोड़ देने के लिए नियत थे । इस अवसर पर मारवाड़ के राठोड़ सरदार वीर दुर्गादास आदि भी मेवाड़ में रहने के कारण महाराणा के साथ थे। राठोड़ों और सीसोदियों की सम्मिलित सेना ने शाही फ़ौज का वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया । महाराणा के कुंवर जयसिंह ने चित्तौड़ के पास शाही सेना पर आक्रमण कर उसको छिन्न-भिन्न किया । कुंवर भीमसिंह ने गुजरात में जाकर शाही इलाक़े को खूब लूटा और कई मसजिदों को गिरवा दिया। महाराणा के मन्त्री दयालदास ने भी मालवे में जाकर लूट-मार मचाई, जिससे अधिक दिनों तक शाही सेना के पैर मेवाड़ में न टिक सके और शाहज़ादे भी हिम्मत हार गये । (१) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद ।