राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत प्रतापसिंह, इस युद्ध के समय बादशाह के पक्ष में था और संभवतः मालवे की तरफ़ नियत था। उसने अपनी कारगुज़ारी की दर्खास्त शाहज़ादे मुअज्जम के पास, जो देबारी (उदयसागर के निकट) में नियत था, भेजी। उसके उत्तर में सन् जुलूस २३ ता० २ शाबान (हि० सन् १०९१ = वि० सं० १७३७ भाद्रपद सुदि ३ = ई० स० १६८० ता० १७ अगस्त) को उक्त शाहज़ादे ने महारावत के नाम इस आशय का निशान भेजा— "तुमने अपनी सेवाओं की पुख्तगी के लिए हमारे मुसाहबों के द्वारा अर्ज़ी भेज हमारे पास उपस्थित होने की इच्छा प्रकट की है, इसलिए हमने अपने विश्वासपात्र और प्रतिष्ठित कर्मचारी वृंदावन के द्वारा तुमको हाज़िर होने की इजाज़त दी है। उम्मीद है कि तुम रवाना हो गये होगे। अगर रवाना न हुए हो तो अब फ़ौरन हाज़िर हो¹।" शाहज़ादों ने महाराणा पर विजय पाने के लिए यथासाध्य उद्योग किया, परंतु उसमें उनको सफलता न मिली। इसी बीच महाराणा राजसिंह वि० सं० १७३७ (ई० स० १६८०) में परलोक सिधारा और उसका कुंवर जयसिंह मेवाड़ का महाराणा हुआ। उसने भी अपने पिता की भांति शाही सेना से युद्ध जारी रखा और बादशाह के घर में झगड़ा मचाने के लिए दुर्गादास आदि राजपूतों ने शाहज़ादे अकबर को बादशाह बनाने का लालच देकर अपनी तरफ़ मिला लिया, परन्तु इस प्रयत्न में उन्हें सफलता न मिली। उन दिनों दक्षिण में मरहटों का उपद्रव बढ़ रहा था, इसलिए राजपूताने के उपद्रव को मिटाकर बादशाह शीघ्रतापूर्वक उधर जाने को उत्सुक था। निदान महाराणा के कुटुंबी श्यामसिंह (गरीबदास का पुत्र, जो शाही सेवा में रहता था) के द्वारा संधि कर लेने का सन्देश पहुंचने पर वि० सं० १७३८ (ई० स० १६८१) में बादशाह और महाराणा जयसिंह के बीच संधि हो गई। तब शाही सेना मेवाड़ से लौट गई। बादशाह और महाराणा के बीच की लड़ाई के समय महारावत प्रतापसिंह, शाही सेना में किस स्थान पर नियत था और उसने युद्ध में (१) शाहज़ादे मुअज्जम के फ़ारसी निशान का अनुवाद।