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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 534 में से

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महारावत प्रतापसिंह १८४ कैसी वीरता दिखलाई, इसका पता नहीं चलता। बादशाह के उपर्युक्त फ़रमान से तो यही जान पड़ता है कि देवलिया से मिले हुए महाराणा के इलाक़े को लूटने आदि के लिए ही उसकी नियुक्ति की गई हो। प्रतापगढ़ राज्य के कुशलपुरा गांव में, जो झांतला ठिकाने का गांव है, एक स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर वि० सं० १७६८ (ई० स० १७११) का लेख खुदा है। उसका सारांश यह है कि वि० सं० १७३७ (ई० स० १६८०) में रावत महासिंह मृत्यु को प्राप्त हुआ, जिसका स्मारक वि० सं० १७६८ (ई० स० १७११) में राव (त) देवीसिंह ने बनवाया १ । रावत महासिंह और देवीसिंह कहां के सरदार थे, प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त ऐतिहासिक साधनों से इसका पता नहीं चलता; परंतु उदयपुर राज्य के संबंध की प्राप्त ऐतिहासिक सामग्री से पाया जाता है कि उदयपुर पर बादशाह औरंगज़ेब की चढ़ाई हुई, उस समय महाराणा की सेना में बेगूं का सरदार रावत महासिंह चूंडावत भी विद्यमान था एवं जब महाराणा की सेना का शाहज़ादे अक़बर की फ़ौज से मुक़ाबला हुआ, उस समय उसने बड़ी वीरता दिखलाई थी। शाहज़ादा अकबर इस युद्ध के समय चित्तौड़ से लगाकर नीमच, मंदसोर और उदयपुर तक महाराणा की सेना से लड़ने, रसद लूटने, रिआया को पकड़कर क़ैद करने आदि के लिए नियत था। कुशलपुरा गांव नीमच से मिला हुआ है। संभव है रावत महासिंह के उधर से बढ़कर शाही सेना पर आक्रमण करने पर वह शाही फ़ौज और प्रतापगढ़ राज्य की सेना से, जो विशेषतः मालवे की ओर नियुक्त थी, लड़कर काम आया हो तथा उसका स्मारक उसके वंशज देवीसिंह ने, जो वि० सं० १७६८ (ई० स० १७११) में विद्यमान था, कुशलपुरा में बनवाया हो। (१) संवत १७३७ रावत श्री माहासींघजी राम कयो बायां च्यार काठा चढ्या संवत १७६८ चौतरो बणयो राव्त(वत) श्री देवीसींघजी .................. । मूल शिलालेख की छाप से।