राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शाहज़ादे आज़म के द्वारा महाराणा जयसिंह और बादशाह औरंग- ज़ेब के बीच संधि हो जाने पर बादशाह को उधर का खटका न रहा। फिर शाहज़ादे मुअज्जम का उसने दक्षिण की तरफ़ कूच किया। इस अवसर महारावत के नाम निशान पर महारावत प्रतापसिंह ने अपना वकील भेज भेजना शाही दरबार में कई बातें निवेदन करवाईं। इस- पर शाहज़ादे मुअज्जम ने सन् जुलूस २५ ता० १७ रमज़ान (हि० स० १०६२ = वि० सं० १७३८ द्वितीय आश्विन वदि ३ = ई० स० १६८१ ता० २० सितम्बर) को निशान भेज लिखा—"तुम्हारा जैसा भरोसा है, उसी प्रकार सेवाओं का वृत्तांत तुम्हारे वकील के द्वारा हमको हमारे मुसाहबों से मालूम हुआ। इसलिए तुम्हारी प्रतिष्ठा-वृद्धि के लिए यह आज्ञापत्र भेजा जाता है। उचित है कि हृदय में विश्वास रख अपने आदमियों को एकत्र कर हमारे उधर आने के समय हाज़िर हो और अच्छी सेवा का सौभाग्य प्राप्त करो। कुछ समय तक हमारी सेवा में रहने के बाद तुम्हारी इच्छा के अनुसार मंसब और जागीर प्रदान की जायगी¹।" इस निशान के ऊपरी भाग में शाहज़ादे ने अपने हाथ से यह भी लिखा कि हमारी आज्ञा के अनुसार उस प्रदेश में हमारे पहुंचने तक जहां तक तुमसे बन सके झगड़े और लड़ाई को मिटाओ, जो तुम्हारे लिए लाभदायक हो। इससे पाया जाता है कि उधर कोई लड़ाई-झगड़े चल रहे हों, जिनको मिटाने के लिए महारावत को शाहज़ादे ने ताकीद की हो; पर यह झगड़े और फ़साद किनके साथ चल रहे थे इसका कुछ पता नहीं चलता। महारावत प्रतापसिंह का इसके पीछे शाही दरबार से कैसा सम्बन्ध रहा और उसके मंसब, जागीर आदि में कितनी वृद्धि हुई, इस विषय का फ़ारसी तवारीख़ों, ख्यातों और तत्समयक पत्रों आदि से कुछ भी हाल ज्ञात नहीं हो सका। संभव तो यही जान पड़ता है कि महारावत विशेषकर मालवे की तरफ़ रहा हो और उस प्रान्त की रक्षा तथा वहां के (१) शाहज़ादे मुअज्जम के फ़ारसी निशान का अनुवाद।