राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत प्रतापसिंह १८३ पारस्परिक झगड़े मिटाने का भार उसके ऊपर रहा हो, जैसा कि सन् जुलूस ३२ ता० ६ शव्वाल ( हि० १०६६=वि० सं० १७४५ श्रावण सुदि ७ = ई० स० १६८८ ता० २४ जुलाई ) के निम्नलिखित पत्र से, जो उसके नाम शाही दरबार से पहुंचा था, पाया जाता है— “तुम्हारी अर्ज़ी अवलोकन हुई। तुम्हारे लेखानुसार शाही कृपा के साथ मीर जैनुल्याबदीन के नाम आज्ञापत्र जारी किया जाता है । तुमको चाहिये कि जो काम पेश आवे उसमें पूरी सहायता करो और उस सेवा को शाही कृपा का साधन समझो¹ ।” राजधानी देवलिया के चारों ओर पहाड़ियाँ होने से वह स्थान अधिक आबादी बढ़ने के उपयुक्त न था एवं वहां का जलवायु भी आरो- ग्यप्रद न था² । अतएव महारावत प्रतापसिंह ने [हाशिया: ‘महारावत का प्रतापगढ़ का क़स्वा आबाद करना’] वि० सं० १७५५ ( ई० स० १६६६ ) के आस-पास अपने नाम पर समान भूमि पर, जहां पहले डोडे- रिया खेड़ा था, प्रतापगढ़ क़स्बा बसाकर वहां रहना अख्तियार किया³, जो इस समय राज्य की राजधानी है । मेवाड़ के स्वामी महाराणा जयसिंह ने अपने राज्य-काल में देवलिया- राज्य से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न की, जिससे देवलिया-राज्य में [हाशिया: महाराणा अमरसिंह (दूसरा) का महारावत से छेड़-छाड़ करना] सुख-शांति रही और महारावत को अपना देश आबाद करने का अवसर मिला । वि० सं० १७५५ ( ई० स० १६६८ ) में उक्त महाराणा का देहांत ( १ ) मूल फ़ारसी पत्र का अनुवाद । ( २ ) नैणसी का कथन है कि जाजली और जाखम नदियां देवलिया के पहाड़ों से निकलती और देवलिया से पांच कोस ( १० मील ) दूर उदयपुर के मार्ग में पड़ती हैं। उनका जल यहां तक ख़राब है कि पीनेवाला तो रोगग्रस्त होता ही है, परन्तु जो उस नाले के जल में होकर जाता है वह भी कष्ट पाता है ( मुंहणोत नैणसी की ख्यात; भाग १, पृ० ६३ ) । ( ३ ) मेजर के० डी० अर्स्किन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० २२२ ( राज- पूताना गैज़ेटियर; जि० २ ए के अन्तर्गत ) ।