राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
महारावत प्रतापसिंह १८३ पारस्परिक झगड़े मिटाने का भार उसके ऊपर रहा हो, जैसा कि सन् जुलूस ३२ ता० ६ शव्वाल ( हि० १०६६=वि० सं० १७४५ श्रावण सुदि ७ = ई० स० १६८८ ता० २४ जुलाई ) के निम्नलिखित पत्र से, जो उसके नाम शाही दरबार से पहुंचा था, पाया जाता है— “तुम्हारी अर्ज़ी अवलोकन हुई। तुम्हारे लेखानुसार शाही कृपा के साथ मीर जैनुल्याबदीन के नाम आज्ञापत्र जारी किया जाता है । तुमको चाहिये कि जो काम पेश आवे उसमें पूरी सहायता करो और उस सेवा को शाही कृपा का साधन समझो¹ ।” राजधानी देवलिया के चारों ओर पहाड़ियाँ होने से वह स्थान अधिक आबादी बढ़ने के उपयुक्त न था एवं वहां का जलवायु भी आरो- ग्यप्रद न था² । अतएव महारावत प्रतापसिंह ने [हाशिया: ‘महारावत का प्रतापगढ़ का क़स्वा आबाद करना’] वि० सं० १७५५ ( ई० स० १६६६ ) के आस-पास अपने नाम पर समान भूमि पर, जहां पहले डोडे- रिया खेड़ा था, प्रतापगढ़ क़स्बा बसाकर वहां रहना अख्तियार किया³, जो इस समय राज्य की राजधानी है । मेवाड़ के स्वामी महाराणा जयसिंह ने अपने राज्य-काल में देवलिया- राज्य से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न की, जिससे देवलिया-राज्य में [हाशिया: महाराणा अमरसिंह (दूसरा) का महारावत से छेड़-छाड़ करना] सुख-शांति रही और महारावत को अपना देश आबाद करने का अवसर मिला । वि० सं० १७५५ ( ई० स० १६६८ ) में उक्त महाराणा का देहांत ( १ ) मूल फ़ारसी पत्र का अनुवाद । ( २ ) नैणसी का कथन है कि जाजली और जाखम नदियां देवलिया के पहाड़ों से निकलती और देवलिया से पांच कोस ( १० मील ) दूर उदयपुर के मार्ग में पड़ती हैं। उनका जल यहां तक ख़राब है कि पीनेवाला तो रोगग्रस्त होता ही है, परन्तु जो उस नाले के जल में होकर जाता है वह भी कष्ट पाता है ( मुंहणोत नैणसी की ख्यात; भाग १, पृ० ६३ ) । ( ३ ) मेजर के० डी० अर्स्किन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० २२२ ( राज- पूताना गैज़ेटियर; जि० २ ए के अन्तर्गत ) ।
१८४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हो गया और उसका कुंवर अमरसिंह (दूसरा) वहां का महाराणा हुआ । अपनी गद्दीनशीनी के अवसर पर डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के अधीशों के स्वयं टीका लेकर न पहुंचने के कारण अमरसिंह ने अप्रसन्न होकर तीनों जगह सेनाएं भेजने की आज्ञा दी । डूंगरपुर में सेना पहुंचने पर महारावल खुमाणसिंह ने महाराणा की सेना से मुक़ाबला किया और शाही दरबार में महाराणा की शिकायत की। इसी प्रकार बांसवाड़ा के स्वामी अजबसिंह ने भी वहां सेना पहुंचने पर महाराणा की शिकायत की, जिससे महाराणा ने फिर अपनी जंगी कार्रवाई रोक दी । महाराणा की सेना के उस समय प्रतापगढ़ राज्य में जाने पर उसने वहां क्या-क्या बिगाड़ किया और उस सेना का सेनापति कौन था, इसका वृत्तांत कहीं नहीं मिलता, परंतु शाही सेवक केशवदास के हि० स० ११११ (वि० सं० १७५६ = ई० स० १६६६) के महाराणा अमरसिंह के नाम के पत्र से प्रकट है कि महाराणा की सेना ने देवलिया के इलाक़े में भी जाकर नुक़सान किया था, जिसकी शिकायत महारावत प्रतापसिंह की तरफ़ से बादशाह के पास होने पर, उस(केशवदास) ने महाराणा को शुरू गद्दी- नशीनी के समय ऐसी कार्रवाई करने से मना किया था¹ । इसपर महाराणा ने फिर देवलिया के स्वामी से छेड़-छाड़ न की, परंतु महाराणा और महारावत के बीच वैमनस्य बना ही रहा । प्रतापगढ़ राज्य से पिपलोदा ठिकाने (मालवे) की सीमा मिली हुई है। उन्हीं दिनों वहां के डोडिये राजपूतों ने उद्दंडता कर लूट-मार आरंभ महारावत की पिपलोदे पर चढ़ाई की और एक ब्राह्मण को मार डाला एवं उसकी संपत्ति लूट ली। महारावत ने डोडियों को कहलाया कि ब्राह्मण को मारकर तुमने बड़ा भारी पाप किया है, इसलिए भविष्य में ऐसा काम करना छोड़ दो और लूटा हुआ माल लौटा दो। इस बात को डोडियों ने स्वीकार न किया और सामना करने को उद्यत हो गये। इसपर महारावत ने अपने राजपूतों को लेकर (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ७३५-३६ ।
महारावत प्रतापसिंह १८५ पिपलोदे पर चढ़ाई की और वहां के दुर्ग को घेर लिया। डोडियों ने भी वीरतापूर्वक महारावत की सेना का मुक़ाबला किया। अन्त में महारावत के भाई मोहकमसिंह ने क़िले में प्रवेश कर वहां अधिकार कर लिया। फिर डोडियों ने अपने अपराध के लिए क्षमा याचना कर लूट-मार न करने की प्रतिज्ञा की। तब महारावत ने उनको माफ़कर पीछा उनका इलाक़ा उन्हें सौंप दिया¹। बादशाह औरंगज़ेब के समय शाहज़ादे मुअज्ज़म का दूसरा पुत्र अज़ीमुश्शान बंगाल की तरफ़ नियत था। उसने बादशाह की तरफ़ से अपने पास रहनेवाले एक नाज़िर को, जो महारावत का शेरबुलंदखां को अपने यहां आश्रय देना बादशाह का कृपापात्र और ख़बरनवीसी का कार्य करता था, अपने सेवक शेरबुलंदखां-द्वारा मरवा डाला। इसपर बादशाह ने शेरबुलंदखां को बंदी करने का हुक्म भेजा, जिससे अज़ीमुश्शान को बड़ी चिंता हुई। फिर उसने महारावत प्रतापसिंह के नाम पत्र भेजा कि शेरबुलंदखां को वहां आश्रय दिया जावे। अज़ीमुश्शान के इस पत्र के पहुंचने पर महारावत के सरदारों में दो दल हो गये। एक शेरबुलंदखां को आश्रय देने के पक्ष में और दूसरा इसके विपक्ष में था। अंत में महारावत के भाई मोहकमसिंह-द्वारा दृढ़ सम्मति मिलने पर महारावत ने मोहकमसिंह को ही शेरबुलंदखां के स्वागत को भेजकर उसे अपने यहां बुला लिया²। वि० सं० १७६२ (ई० स० १७०६) में बांसवाड़ा के स्वामी महा- रावल अजवसिंह का देहांत हो गया और उसका पुत्र भीमसिंह वहां का बादशाह का महारावत को शाही दरबार में बुलाना स्वामी हुआ, परंतु उन दिनों बादशाह औरंगज़ेब के दक्षिण में होने और फिर उसकी वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में मृत्यु हो जाने तथा शाह- (१) महाराज बहादुरसिंह; रावत प्रतापसिंह ने मोहकमसिंह हरिसिंघोत, देवगढ़ रा धणी री वार्ता; पृ० २६-६६ । (२) वही; पृ० १६-२४ । २४
१८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ज़ादे मुअज्जम (शाह आलम बहादुरशाह) और आज़म के बीच तख़्त के लिए झगड़ा होने आदि कारणों से बांसवाड़ा और देवलिया के स्वामी शाही दरबार में नहीं जा सके थे। बहादुरशाह ने बादशाह बनने पर ई० स० १७०८ के जनवरी (वि० सं० १७६४ माघ) मास में इन दोनों राज्यों के नरेशों को शाही दरबार में लाने के लिए दो शाही सेवकों को भेजा¹। इससे अनुमान होता है कि महारावत शाही दरबार में गया हो, पर इससे आगे का वृत्तांत अप्राप्य है। ऊपर बतलाया गया है कि वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में दक्षिण में बादशाह औरंगज़ेब का देहांत हो गया। उस समय उसके दोनों शाह- महाराजा अजीतसिंह और ज़ादे मुअज्जम और आज़म के बीच बादशाह बनने सवाई जयसिंह का देवलिया के लिए वि० सं० १७६४ (ई० स० १७०७) में जजाओ में जाना के मैदान में बड़ा भारी युद्ध हुआ, जिसमें शाहज़ादे मुअज्जम की विजय हुई और आज़म मारा गया। फिर मुअज्जम अपना नाम शाहआलम बहादुरशाह रखकर मुग़ल साम्राज्य का स्वामी हुआ। जजाओ के युद्ध में आंबेर का स्वामी महाराजा सवाई जयसिंह आज़म के पक्ष में और उसका भाई विजयसिंह मुअज्जम के पक्ष में रहकर लड़ा था। इस कारण बहादुरशाह ने बादशाह बनने पर जयसिंह के स्थान में विजयसिंह को आंबेर का स्वामी बनाना चाहा। उन्हीं दिनों जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह ने औरंगज़ेब की मृत्यु से उत्पन्न अव्यवस्था से लाभ उठाकर अपने राज्य से शाही खालसा उठा दिया। इससे बहादुरशाह ने अजीतसिंह को दंड देकर जोधपुर पर पुनः अधिकार करने एवं आंबेर विजयसिंह को दिलाने के लिए अपने शाहज़ादे अज़ीमुश्शान और ख़ानखाना मुनइमखां आदि को ससैन्य रवाना किया और आप भी अजमेर होता हुआ जोधपुर के समीप जा पहुंचा। उस समय अजीतसिंह ने शाही सेना से मुक़ाबला करने में हानि समझ बादशाह के पास उपस्थित होना ही ठीक (१) बहादुरशाह के राज्य समय के अख़बारात-इ-दरवार-इ-मुअल्ला से। ये अख़बारात जयपुर राज्य के संग्रह में सुरक्षित हैं।
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समझा। वादशाह ने उसका पहले का अपराध क्षमाकर उसको साढ़े तीन हज़ारी मंसब देकर जागीर में सोजत, सिवाणा और फलोधी के पर- गनों का फ़रमान कर दिया एवं जोधपुर तथा मेड़ता आदि पर शाही- ख़ालसा भेज दिया। वहीं आंबेर से सवाई जयसिंह भी जाकर वादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। वादशाह ने उस (जयसिंह) की सेवा स्वीकार कर उसको अपने सरदारों में शुमार किया और आंबेर पर हुसेनअलीखां को बंदोबस्त के लिए भेज दिया। फिर बहादुरशाह वहां से दोनों राजाओं को साथ लेकर अपनी राजधानी पहुंचा। उन्हीं दिनों बहादुरशाह के पास उसके भाई कामबख़्श के दक्षिण में अपने को वादशाह घोषित कर फ़साद उठाने की ख़बर पहुंची। निदान वह कामबख़्श को सज़ा देने के लिए दक्षिण की ओर रवाना हुआ। उस समय राठोड़ दुर्गादास-सहित महाराजा अजीतसिंह और सवाई जयसिंह अपने-अपने राज्य मिलने की आशा से मंडेश्वर (मंडलेश्वर, नर्मदा के तट पर) तक वादशाह के साथ रहे, परंतु जब देखा कि राज्य मिलने की कोई आशा नहीं है और उनपर वादशाह की तरफ़ से निगरानी की जाती है, तब उसे बिना सूचना दिये ही वे अपने डेरे-डंडे वहीं छोड़कर उदयपुर की ओर चले गये। मार्ग में देवलिया में पहुंचने पर महारावत प्रतापसिंह ने उनका उचित आतिथ्य कर उन्हें उदयपुर को रवाना किया, जहां महाराणा अमरसिंह (दूसरा) ने उन्हें अपने यहां सम्मानपूर्वक रक्खा¹। उदयपुर में उनके पहुंचने की ख़बर पाकर शाहज़ादे मुईज़ुद्दीन जहां- दारशाह ने महाराणा को लिखा कि उन्हें अपने पास नौकर न रक्खे और [हाशिया: किशनगढ़ के राजा राजसिंह का देवलिया जाकर रहना] उन्हें समझा दे कि वे वादशाह के पास अर्जियां भेजें; मैं उनके अपराध क्षमा करा दूंगा और जागीरें दिलवा दूंगा। वहां से महाराणा अमरसिंह की सहा- यता पाकर महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर आदि पर और सवाई जयसिंह ने आंबेर आदि पर अपना अधिकार कर लिया। उन दिनों बादशाह, काम-
[Footnote] (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ७६८-७८। जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ८३-४।
१८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बख़्श को पराजित करने में व्यस्त था, इसलिए उन्होंने यह अवसर उपयुक्त देख शाही इलाक़े में भी उपद्रव करना चाहा। तब रूपनगढ़ (किशनगढ़) का स्वामी राजा राजसिंह (जो बादशाह का आज्ञाकारी सेवक था) उक्त दोनों राजाओं का साथ न देने से अपने इलाक़े की भी बरबादी समझ देवलिया में चला गया और जब तक उनका उपद्रव शांत नहीं हुआ, वह वहां के महारावत का मेहमान रहा। इस बीच उसने उपर्युक्त दोनों राजाओं के उपद्रवों को मिटाने के लिए उनके इलाक़े के फ़रमान उनके नाम हो जाने की बादशाह के पास शाहज़ादे अज़ीमुश्शान-द्वारा अर्जी भेजी, जो स्वीकृत होकर दोनों राजाओं के नाम के शाही फ़रमान उसके पास बादशाह की ओर से पहुंच गये। उनको लेकर वह देवलिया से विदा हुआ और उसने उक्त दोनों राजाओं को शाही फ़रमान देकर बढ़ता हुआ उपद्रव रोक दिया¹। लगभग ३५ वर्ष राज्य करने के पश्चात् अनुमान ७५ वर्ष की आयु में महारावत प्रतापसिंह का देहांत हुआ। एक जगह उसके देहांत का समय महारावत का परलोकवास वि० सं० १७६४ पौष वदि ३ (ई० स० १७०७ ता० ३० नवंबर) दिया है², जो ठीक नहीं है, क्योंकि "जोधपुर राज्य की ख्यात" एवं "वीरविनोद" के अनुसार, जैसा कि ऊपर बतलाया गया है, वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ मास (ई० स० १७०८ मई) के प्रारंभ में महाराजा अजीतसिंह तथा महाराजा सवाई जयसिंह के देवलिया में जाने पर महारावत प्रतापसिंह का उनका आतिथ्य करना स्पष्ट है³। ऐसी अवस्था में वि० सं० १७६४ (ई० स० १७०८) में उसका परलोकवास होना माना नहीं जा सकता। संभव है कि महारावत प्रतापसिंह का देहांत वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ (ई० स० १७०८ मई) मास के पीछे किसी समय हुआ हो और ख्यात-लेखकों ने वि० सं० १७६५ (१) जोधपुर राज्य की ख्यात; द्वितीय भाग, पृ० ६०। "वीरविनोद" से पाया जाता है कि महाराणा अमरसिंह (दूसरा) ने भी इस सम्बन्ध में यथेष्ट प्रयत्न किया था (द्वि० भा०, पृ० ७७३-८)। (२) पंडित जगन्नाथ शास्त्री; काव्यकुसुम (प्रस्तावना); पृ० २२। (३) देखो ऊपर पृ० १८७, टिप्पण १।
(ई० स० १९०८) के स्थान पर वि० सं० १७६४ (ई० स० १७०७) लिख दिया हो। महारावत प्रतापसिंह के दस राणियां थीं¹, जिनमें एक बीकानेर के स्वामी महाराजा कर्णसिंह की पौत्री और पद्मसिंह की पुत्री प्रेमकुंवरी थी²। [महारावत की राणियां] इस विवाह के अवसर पर महारावत ने चारण- [और संतति] भाटों आदि को बहुत कुछ द्रव्य देकर बड़ी उदा- रता प्रकट की थी³। उसके पृथ्वीसिंह, कीर्तिसिंह⁴ भीमसिंह, दौलतसिंह और इंद्रसिंह नामक पांच कुंवर हुए⁵। (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ५-६। प्रतापगढ़ से प्राप्त एक पुरानी ख्यात में उक्त महारावत के केवल ६ राणियां होने का उल्लेख है। (२) प्रतापगढ़ से प्राप्त पुरानी ख्यात; पृ० ६। इस ख्यात में महारावत की राणियों के जो नाम दिये हैं, वे बड़वे की ख्यात से नहीं मिलते एवं बड़वे की ख्यात में महारावत की राठोड़ राणी प्रेमकुंवरी का नाम ही नहीं है। उस( प्रतापसिंह )के साथ उसकी दो राणियां—गौड़ धर्मकुंवरी, जो अजमेर के प्रसिद्ध राजा विठ्ठलदास की पुत्री और गोपालदास की पौत्री थी तथा कछवाही विजयकुंवरी, जो अमरसिंह की पौत्री और सबलसिंह की पुत्री थी, सती हुईं। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६२। (४) मालवे के सूबेदार शायस्ताखां की ता० ३ शावान सन् जुलूस ४७, हि० स० १११४ (वि० सं० १७५६ पौष सुदि ५ = ई० स० १७०२ ता० १२ दिसंबर) की रिपोर्ट से प्रकट है कि महारावत प्रतापसिंह का छोटा पुत्र कीर्तिसिंह मालवे के शाही सूबेदार के पास (संभवतः देवलिया की सेना के साथ) रहा करता था और उन दिनों महाराणा अमरसिंह (दूसरा) की रामपुरा पर चढ़ाई होने का संवाद सुन वह देवलिया चला गया था, जिसका कारण यही हो सकता है कि उन दिनों उक्त महाराणा की देवलिया पर भी सेना भेजने की ख़बर फैल रही हो (वीरविनोद; जि० २, पृ० ७४७-४८)। (५) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ५। प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त एक पुरानी ख्यात में महारावत के कुंवरों में दौलतसिंह का नाम नहीं है एवं उसकी तीन कुंवरियों के नाम बनेकुंवरी, सौभाग्यकुंवरी और फूलकुंवरी दिये हैं। "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६२) में महारावत की पुत्रियों में से एक का विवाह जोधपुर के स्वामी महाराजा अजीतसिंह से होने का उल्लेख है, जो अन्य किसी ख्यात के आधार पर है। हमारे पास प्रतापगढ़ राज्य से जो ख्यातें आई हैं, उनमें कहीं इस विषय का उल्लेख नहीं है। "वीरविनोद" में जोधपुर राज्य की ख्यात के आधार पर महारावत प्रतापसिंह के कुंवर पृथ्वीसिंह की पुत्री का विवाह महाराजा अजीतसिंह से होना मानकर
१६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत लोकोपयोगी कार्यों की तरफ़ पूर्ण रुचि रखता था। उसने देवलिया में प्रतापवाव नामक बावड़ी और बाग बनवाया। यह बावड़ी देव- महारावत के समय के बने लिया के जलाशयों में सबसे उत्कृष्ट है और अकाल हुए लोकपयोगी कार्य के समय इस बावड़ी से देवलिया के निवासियों का काम चलता है। उसकी माता मनभावती ने केशव भटेवरा के निरीक्षण में मानसरोवर नामक सुरम्य जलाशय, जिसके आस-पास आम्रवृक्षों की प्रचुरता थी, बनवाया¹। उसकी राणी पाटमदें (धर्मकुंवरी) ने भी देवलिया में एक बावड़ी बनवाई तथा धमोतर के ठाकुर जोगीदास के भाई भोगीदास² ने भी वहां एक बावड़ी बनवाकर उक्त महारावत के समय उसका वास्तु-संस्कार किया था। पहले की बात का खंडन किया है। इस बात को स्पष्ट करने के लिये "जोधपुर राज्य की ख्यात" से मिलान करने पर पाया जाता है कि महाराजा अजीतसिंह का एक विवाह. वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में जोधपुर पर अधिकार होने के पूर्व देवलिया में हुआ था और उसके उदर से कुंवर उदोतसिंह का जन्म हुआ था, जो बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के पीछे जोधपुर पर अधिकार होने के समय विद्यमान था। उसके. पीछे वि० सं० १७६६ (ई० स० १७०६) में उक्त महाराजा ने देवलिया में जाकर फिर अपना विवाह किया था। जोधपुर राज्य की ख्यात में जहां महाराजा अजीतसिंह की राणियों के नाम दिये हैं, वहां उसकी दो राणियों का देवलिया की होना बतलाकर एक को महारावत पृथ्वीसिंह की कुंवरी और प्रतापसिंह की पौत्री लिखा है, किंतु उसका नाम नहीं दिया है और दूसरी का कुछ भी परिचय नहीं दिया है। मुंशी देवीप्रसाद-द्वारा संगृहीत जोधपुर के राजाओं की राणियों और कुंवरों की नामावली में भी उक्त महाराजा के देवलिया की दो राणियां होना लिखा है, परंतु उनके नाम नहीं दिये हैं एवं एक राणी का वि० सं० १७८१ आषाढ़ सुदि ६ (ई० स० १७२४ ता० १६ जून) को विवाह होना लिखा है। ख्यातों के उपर्युक्त विभिन्न लेखों से इसका ठीक-ठीक निर्णय होना कठिन है; . परंतु यह कहा जा सकता है कि महाराजा अजीतसिंह का एक विवाह महारावत प्रतापसिंह की विद्यमानता में, जैसा कि कर्नल टॉड ने (जि० २, पृ० १०१० में) लिखा है, वि० सं० १७५३ (ई० स० १६९६) में उसकी किसी पुत्री अथवा पौत्री से हुआ हो और दो विवाह उक्त महाराजा के देवलिया की राजकुमारियों से पीछे से भी हुए हों। (१) देखो ऊपर पृ० १६६ टिप्पण संख्या २। (२) देखो ऊपर पृ० १६३ टिप्पण संख्या ५।
महारावत प्रतापसिंह १६१ अपने पिता हरिसिंह की भांति महारावत प्रतापसिंह भी विद्याप्रेमी था। वह विद्वानों को आश्रय देकर अपने यहां रखता और उनका सम्मान महारावत का विद्यानुराग करता था। उसके राज्य-काल में कितने ग्रंथों का निर्माण हुआ इसका तो पता नहीं चलता, परंतु उसके समय में कल्याण कवि-रचित "प्रताप प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य की रचना होने तथा अन्य जगह उसकी राजसभा में रहनेवाले विद्वान् सोमजीभट्ट, मन्नाभट्ट, विश्वनाथ, मेहता जयदेव, मेहता हरिदेव, भगवान- कवि, नृसिंहनागर, केशव पौराणिक, संतोपराय, रामकृष्ण, रामजी बाटी, विजयसूरि, नरू आदि का उल्लेख मिलता है। महारावत स्वयं भाषा में काव्य- रचना किया करता था । उसके रचे हुए कुछ दोहे प्राप्त हुए हैं, जो "काव्य कुसुम" के द्वितीय भाग में मुद्रित हुए हैं। दोहे अधिकतर भक्ति तथा ज्ञान संबंधी हैं एवं उनसे महारावत की अध्यात्म की तरफ़ रुचि होना प्रकट होता है। उसके बनाये हुए दोहों में कुछ शृंगार रस के भी हैं। रचना सरल है और विभिन्न अलंकारों का उनमें अच्छा समावेश है । कुछ दोहों में उसने अपने पिता महारावत हरिसिंह की दानशीलता की प्रशंसा करते हुए तुलनात्मक दृष्टि से मेवाड़ के स्वामी महाराणा जगत- सिंह (प्रथम) के बाद उसको स्थान दिया है१, जिससे पाया जाता है कि वह अपने पिता की विद्यमानता एवं महाराणा जगतसिंह के देहांत अर्थात् वि० सं० १७०६ (ई० स० १६५२) के पूर्व ही काव्य-रचना करने लग गया था। उसके बनाये हुए दोहों में भगवान कवि, हरिदेव, संतोषराय आदि की स्तुति की है, जिनके सत्संग से संभव है उसको काव्य संबंधी ज्ञान हुआ हो। महारावत प्रतापसिंह के समय के वि० सं० १७३१ से १७६४ (ई० स० १६७५ से १७०७) तक के कई दानपत्र और शिलालेख मिले हैं, जिनमें से (१) हरि-इंद जसवेँत-सिंघरा, बहु देणा दातार । जिण दिन नहिं राख्यो जगो, तिण दिन तो शिर भार ॥ काव्य कुसुम; भाग २, पृ० २।
१६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास [हाशिया: महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र] कुछ दानपत्रों की नक़लें और शिलालेखों की छापें हमारे पास आई हैं, जिनका आशय नीचे लिखे अनुसार है— ( १ ) वि० सं० १७३१ फाल्गुन सुदि ७ ( ई० स० १६७५ ता० २१ फ़रवरी ) रविवार का देवलिया में भोगीदासजी की बावड़ी के ताक में लगा हुआ शिलालेख, जिसमें सीसोदिया वंशी गोपाल के पौत्र और जोधा के पुत्र भोगीदास का उक्त बावड़ी बनवाकर महारावत प्रतापसिंह के राज्य- काल में उसकी प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है¹। ( २ ) वि० सं० १७३२ फाल्गुन वदि १३ (ई० स० १६७६ ता० १ फ़रवरी) का मागसा गांव का गढ़वी गोकल के नाम का दानपत्र, जिसमें मागसा गांव चारण गोकल को उक्त महारावत-द्वारा मिलने का उल्लेख है। ( ३ ) पाटणया गांव का वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ ( ई० स० १६७७ ता० ७ फ़रवरी ) का दानपत्र, जिसमें महारावत प्रतापसिंह का पाट- णया गांव मेहता जयदेव को दान करने का उल्लेख है²। यह दानपत्र संस्कृत ( १ ) देखो ऊपर पृ० १६३ टिप्पण संख्या ४। ( २ ) ॰॰॰॰॰॰॰॰॰महेंद्रसमेन श्रीमन्महाराजाधिराजमहाराजरावतश्री- प्रतापसिंहदेवेनालोच्येदेमुक्तं । वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यमापातमात्र- मधुरोविषयोपभोगः। प्राणास्तृणाग्रजलबिंदुसमा नराणां धर्मः सखा पर- महो परलोकयाने। तथा। या स्वसद्मनि पद्मेपिदिनावधि विराजते इन्दिरा मन्दिरे न्यस्य कथं स्थास्यति सा चिरमितो निःसारं संसारमाकलय्य सहेतुकसकलदुःखनाशकसकलनित्यानित्यसुखसाधकसाधनाग्रेसरकृतोभयै- कादशीव्रतोद्यापने द्यमाघशुक्लैका[द]श्यां मया प्रतापसिंहनृपेण महत्तर- जयदेवद्विजाय मतिपितृदत्तविद्यारायापरनाम्ने पाटणपुराख्यो ग्रामः स्वसीमा- वृक्षपर्वतजलाशयकार्मुकहल[ इमं ]राजामात्यादि सर्वलागटस्वीयपरकीय- टंकीचतुराघाटैः सह पञ्चशताधिकनिवर्त्तनोपेतः स्वस्तिपत्रेण चंद्रार्क- यावत् श्रीकृष्णार्पणेन दानवाक्येन दत्तः ॰॰॰॰॰॰॰॰वैजवापायनसगोत्रः
महारावत प्रतापसिंह १६३ में है और-इतिहास के लिए उपयोगी है, क्योंकि इसके प्रारंभ में गुहिल से लगाकर भर्तृभट्ट तक गुहिल राजाओं के नाम दिये हैं और फिर क्षेमकर्ण से लगाकर हरिसिंह तक प्रतापगढ़ के नरेशों का यथाक्रम वर्णन दिया है। इसके अतिरिक्त महारावत की माता, पट्टराज्ञी, राजकुमारों, भाइयों, सर- दारों, राजगुरु, राजकवियों, मंत्रियों आदि के नाम भी उसमें मिलते हैं। (४) वि० सं० १७५३ श्रावण सुदि २ ( ई० स० १६९६ ता० २१ जुलाई) का देवलिया (देवगढ़) के कोतवाली चबूतरे के पास लगा हुआ शिलालेख, जिसमें महारावत-द्वारा प्रत्येक चतुर्दशी को जानवर मारने और मांस बेचने की मनाई का उल्लेख है¹। महारावत प्रतापसिंह वीर, दानशील, साहसी, उदार और विद्वान् राजा था। वह विद्वानों को आदरपूर्वक अपने राज्य में रखकर उनका महारावत का व्यक्तित्व यथोचित सम्मान करता था, जिससे उसके राज्य- काल में भी वहां साहित्यिक जीवन बना रहा। उसने शाही दरबार से अपना संबंध समयानुकूल रखा और संभव है कि युद्ध आदि अवसरों पर भी शाही सेना के साथ उसने अपनी फ़ौज भेजी हो। राजपूताने के बीकानेर और जोधपुर राज्यों से वैवाहिक संबंध जोड़कर उसने मेल बढ़ाया। उदयपुर के महाराणाओं से भी उसने विरोध प्रतापसिंहदेवो पाटणपुरग्रामं प्रतापपुराख्यां विधाय पञ्चशताधिकनिवर्त्त- नोपेतं वत्ससगोत्राय हरिदेव शिवदेव रंगदेव गोपालदेवादि पुत्रपौत्रादि सहिताय महत्तरजयदेवशर्म्मणे········इत्याचन्द्रार्कयावत् प्रददे···· । संवत् १७३३ वर्षे माघ सुदि पूर्णिमास्यां लिखितमिदम् । सोनी हीरो । मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । (१) इस लेख के अतिरिक्त उक्त महारावत के समय का देवलिया में बड़े जैन मंदिर के बाहिर एक पाषाण लेख लगा हुआ है, जिसके संवत्, मिति आदि का भाग घिस गया है। २५
१६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास नहीं बढ़ने दिया, जो उसकी बुद्धिमत्ता का सूचक है १। उदार स्वभाव का राजा होने के कारण उसने बीकानेर में विवाह के अवसर पर त्याग आदि बंटवाने में अच्छी ख्याति प्राप्त की थी । वह धर्मात्मा और दयालु राजा था। प्रजा की भावनाओं का वह सदा आदर करता तथा उत्तम आचरण रखता था। फलतः उसने देवलिया में प्रत्येक अष्टमी को कुम्हारों-द्वारा आवा न पकाने एवं चतुर्दशी को जीव-हिंसा न करने और मांस न बेचने की आज्ञा जारी कर पाषाण-लेख लगवा दिये थे। इन कार्यों से पाया जाता है कि उसके राज्य-काल में वहां जैन धर्मावलंबियों का पूरा प्रभाव रहा होगा। महारावत के ऐसे कार्यों से बाहर से आकर उसके राज्य में व्यापारी लोग बसने लगे, जिससे राज्य में समृद्धि बढ़ी और थोड़े ही दिनों में उसका बसाया हुआ प्रतापगढ़ क़स्बा अच्छा आबाद हो गया एवं देवलिया की ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६२ । प्रतापगढ़ राज्य-की कुछ ख्यातों में कुछ स्थल पर ऐसा भी लिखा मिलता है कि मेवाड़ के महाराणाओं ने बादशाही सेवा स्वीकार कर लेने के कारण अप्रसन्न होकर कांठल का इलाक़ा जोधपुर के कुंवर रामसिंह को दहेज में दे दिया, जिसपर वह वहां अधिकार करने के लिए गया, परंतु महारावत के एक पिपाड़ा राजपूत के द्वारा मारा गया । उसकी छत्री बमोतर में अंबा- माता के पास विद्यमान है। इस कथन की पुष्टि किसी शिलालेख अथवा उदयपुर और जोधपुर राज्य के इतिहासों से नहीं होती। देवलिया का राज्य सोलहवीं शताब्दी में स्थापित हो गया था और वह एक प्रकार से स्वतंत्र था। मुग़ल बादशाहों के समय उसका शाही दरबार से संबंध था । जहांगीर और औरंगज़ेब के समय उसके कुछ परगनों का मेवाड़ के महाराणाओं के नाम फ़रमान भी हुआ; परंतु उनका अधिकार वहां अस्थायी ही रहा और फिर वे बादशाही दरबार से देवलियावालों को मिल गये । इस अवस्था में मेवाड़ के महाराणाओं का यह राज्य अपने दामाद जोधपुर के राजकुमार रामसिंह को दे देने और उसके वहां जाने पर मारे जाने की बात निर्मूल है । अंबामाता में, जहां रामसिंह की छत्री बताई जाती है, कोई लेख नहीं हैं, न जोधपुर राज्य की ख्यातों में महा- रावत प्रतापसिंह के समकालीन राजकुमारों की नामावली में रामसिंह का नाम है । अतएव उपर्युक्त कथन में संदेह होना स्वाभाविक है, क्योंकि जिस राज्य पर अधिकार नाम मात्र का न हो, वह राज्य दहेज में देना अस्वाभाविक बात है । संभव है इस छत्री का संबंध मालवे के किसी राठोड़ राजा या राजकुमार से हो, जिसके राज्य की सीमा प्रतापगढ़ राज्य से मिलती हो ।
महारावत प्रतापसिंहः १६५ भी उत्तरोत्तर वृद्धि होकर आगे जाकर वहां कई भव्य जिनालय बने। देव- लिया राज्य उसके समय में सम्पन्न रहा। उसका कांठल के मीणों पर पूरा आतंक था एवं चोर और लुटेरों को यथेष्ट दंड देकर उसने सर्वत्र शांति की स्थापना की। एक बार डोडियों ने एक ब्राह्मण को मार डाला, जिस- पर उसने डोडियों के गढ़ पिपलोदा पर चढ़ाई कर अपराधियों को दंड देने में किंचित् भी विलंब न किया। शरणागत-वत्सलता को वह क्षत्रियों का मुख्य धर्म समझता था। उसने बादशाह औरंगज़ेब के पौत्र और बहा- दुरशाह के पुत्र अज़ीमुश्शान के भेजे हुए शेरबुलंदखां नामक शाही सेवक को अपनी शरण में रखकर निर्भीकता का परिचय दिया। वह पूर्ण पितृभक्त और कर्त्तव्यपरायण राजा था। भाषा काव्य में उसकी गति अच्छी थी और रचना सरल होती थी। लोकोपयोगी कार्यों की ओर रुचि होने से उसके राज्य-समय में कई सार्वजनिक स्थानों का निर्माण हुआ। विष्णु का परमभक्त होने के कारण उसने श्रीकृष्ण नाम का साढ़े तीन करोड़ जप करवाया था¹, जिसकी समाप्ति उसने पूर्ण धूमधाम से कर सहस्रों रुपये व्यय-किये थे। उसका रतलाम के स्वामी से भी युद्ध होना ख्यातों में लिखा है, परंतु रतलाम के इतिहास से इसकी पुष्टि नहीं होती तो भी रतलामवालों के साथ युद्ध होने के संबंध में वहां निम्नलिखित पद्य प्रसिद्ध है— पातल थारा पीथला मत भेजे रतलाम। राठोड़े कागद लिख्यो महर करो दीवाण॥ (१) प्राकार्षीन्नितरां प्रतापनृपतिः श्रीदेवदुर्गे वरे स्मारं स्मारमनन्तनामविलसत्सार्धत्रिकोटिव्रतम्। तस्योद्यापनमद्भुतं च कृतवान् यादृङ् निबंधान् बहून् दृष्ट्वा तादृगिहोच्यते हरिपर श्रीमानसिंहाज्ञया॥ रामकृष्ण; नाग माहात्म्य।
१६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कवि कल्याण-रचित "प्रताप-प्रशस्ति" खंडित काव्य¹ में उसकी माता मनभावती, मुख्य राणी पाटमदे, उसके पितृव्य मानसिंह, धमोतर के ठाकुर जोगीदास तथा उसके पुत्र जसकरण, जोगीदास के भाई भोगीदास और रायपुरवालों के पूर्वज दलपत, तुलसीदास, खरोटवालों के पूर्वज रूपसिंह, कल्याणपुरावालों के पूर्वज रणछोड़, भांतलावालों के पूर्वज कुशलसिंह, मंत्री वर्द्धमान, उदयभान हूंवड़, ग़रीबदास एवं महारावत के छोटे भाई अमरसिंह, मोहकमसिंह और माधवसिंह का भी परिचय दिया है। ( १ ) "प्रताप प्रशस्ति" में उसका रचना-काल नहीं दिया है; पर उसमें धमोतर के ठाकुर जोगीदास के भाई भोगीदास का उल्लेख है। देवलिया में भोगीदास के दो स्मारक लेख मिले हैं, जिनसे पाया जाता है कि वि० सं० १७३६ आषाढ वदि ३ ( ई० स० १६७६ ता० १६ जून ) को भोगीदास का देहांत हुआ। अतएव वि० सं० १७३० और १७३६ के बीच "प्रताप प्रशस्ति" की रचना होना संभव है।
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महारावत पृथ्वीसिंह
पांचवां अध्याय महारावत पृथ्वीसिंह से सामन्तसिंह तक
पृथ्वीसिंह
महारावत प्रतापसिंह का परलोकवास होने पर वि० सं० १७६५
(ई० स० १७०८) के लगभग उसका कुंवर पृथ्वी-
राज्य-प्राप्ति सिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ।
जोधपुर के स्वामी महाराजा अजीतसिंह का एक विवाह महारावत
प्रतापसिंह की विद्यमानता में, महारावत पृथ्वीसिंह की राजकुमारी
(कल्याणकुंवरी ?) से, जबकि उक्त महाराजा का
महारावत की पुत्री का
जोधपुर के महाराजा के जालोर में निवास था, वि० सं० १७५३ (ई० स०
साथ विवाह होना १६६६) में हुआ था¹। महाराजा ने पुनः देवलिया
में जाकर वि० सं० १७६६ चैत्र सुदि १२ (ई० स० १७०६ ता० ११ मार्च)
को महाराजा पृथ्वीसिंह की छोटी राजकुमारी (अनूपकुंवरी ?) से विवाह
किया।
जोधपुर राज्य की ख्यात में इस संबंध में लिखा है कि उन दिनों
अजमेर के सूबेदार शुजा ने महाराजा अजीतसिंह को जोधपुर से अजमेर
बुलवाकर धोखे से मार डालना चाहा। इस कार्य की सफलता के लिए
उसने महाराजा अजीतसिंह के पास समाचार भेजा कि बादशाह ने यह
सूबा मुझसे उतारकर फ़ीरोज़खां के बेटे को दिया है। इसलिए मैं यहां से
अपने घर जाता हूं और फ़ीरोज़खां का बेटा डरकर उज्जैन से आगरे गया
(१) टॉड; राजस्थान; जि० २, पृ० १०१०.।
१६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास है, जहां से वह मौक़ा होने पर अपनी जमीयत के साथ आवेगा । इसलिए अजमेर आकर आप यहां अधिकार कर लें । महाराजा अजीतसिंह यह समाचार मिलते ही अजमेर पहुंचा और कुछ दूर एक गांव में अपनी सेना के साथ ठहर गया । अजमेर में जब उसे खाई में शाही सेना के मोर्चें होने का हाल ज्ञात हुआ तो वह शुजाअतखां का कपट-व्यवहार जान गया । फिर महाराजा ने अजमेर को घेर लिया। महाराजा और शुजाअतखां की सेनाओं के बीच युद्ध भी हुआ । अंत में जब शुजाअतखां ने नगर की हालत खराब देखी तो सुलह का प्रयत्न किया और रूपनगर के राजा राजसिंह के समझाने से महाराजा ने एक हाथी, ८ घोड़े और ४५००० रुपये नक़द लेकर वहां से घेरा उठा दिया। तदनन्तर वह वहां से सीधा देवलिया गया और बिना लग्न के ही उसने वि० सं० १७६६ चैत्र सुदि १२ (ई० स० १७०६ ता० ११ मार्च) को महारावत पृथ्वीसिंह की पुत्री से विवाह किया¹ । ख्यात के इस कथन की पुष्टि बादशाह के राज्य समय के सन् जुलूस ३ ता० ४ सफ़र हि० स० ११२१ (वि० सं० १७६६ प्रथम वैशाख सुदि ६ = ई० स० १७०६ ता० ४ अप्रेल) के 'अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला' से भी होती है। उसमें लिखा है कि अजमेर के निवासियों की संपत्ति लूटने के बाद अजीतसिंह ने वहां का घेरा उठा लिया और फिर वह बीस हज़ार सवारों के साथ मालवे में देवलिया के पृथ्वीसिंह के यहां विवाह के लिए गया । महारावत प्रतापसिंह ने जिस प्रकार शाही दरबार से अपना संबंध रखा था, उसी प्रकार महारावत पृथ्वीसिंह ने भी मुग़ल बादशाह से अपना संबंध बनाये रखा । फिर धसाड़ का परगना, जो महारावत के नाम वसाड़ का पुनः फरमान और उसके मंसब में वृद्धि होना चग़तानखां को दे दिया गया था, बादशाह शाह- आलम बहादुरशाह ने महारावत प्रतापसिंह का देहांत हो जाने से पुनः महारावत पृथ्वीसिंह के नाम पर बहाल कर दिया और सन् जुलूस ३ हि० स० ११२१ ता० ५ जमादिउलूआखिर (वि० सं० १७६६ श्रावण सुदि ७ = ई० स० १७०६ ता० १ अगस्त ) को वसांड़ ( १ ) जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ६३-४।
की प्रजा तथा अधिकारियों के नाम निम्नलिखित आशय का आज्ञापत्र जारी किया— "बसाड़ परगने के, जो सूबा मालवे में सरकार मंदसोर के ताल्लुक़ है, चौधरियों, कानूनगो, प्रजाजनों और काश्तकारों को मालूम हो कि ४३६५८०० दाम की आय के परगने चग़तानखां बहादुर आदि से लेकर आधी साख सियालू तुर्की वर्ष के प्रारम्भ से देवलिया के रावत प्रतापसिंह के पुत्र पृथ्वीसिंह की जागीर में कर दिये गये हैं। इसलिए उचित है कि माल और दीवानी के स्वत्वों से जो आय हो, वह पूर्णरूप से क़ायदे और दस्तूर के अनुसार उक्त रावत को देते रहो और उसकी ताबे- दारी से बाहिर न रहो¹।" महारावत पृथ्वीसिंह का मंसब प्रारंभ में ५०० ज़ात और ५०० सवारों का नियत हुआ था। अपने सन् जुलूस ५ ता० ६ शव्वाल हि० ११२३ (वि० सं० १७६८ कार्तिक सुदि ८ = ई० स० १७११ ता० ६ नवंबर) को बाद- शाह शाहआलम बहादुरशाह ने महारावत के मंसब में ५०० ज़ात और दो सौ सवारों की वृद्धि कर उसका मंसब एक हज़ार ज़ात और ७०० सवार का कर दिया²। वि० सं० १७६८ (ई० स० १७१२) में बादशाह शाहआलम बहादुर- शाह की मृत्यु हो जाने पर उसका बड़ा शाहज़ादा जहांदारशाह बादशाह हुआ। महारावत पृथ्वीसिंह का उक्त बादशाह से जहांदारशाह के पास से बसाड़ परगने का फ़रमान होना | भी अच्छा संबंध रहा। फलतः बसाड़ के परगने का फ़रमान, जो बहादुरशाह के समय हुआ था, बादशाह जहांदारशाह ने भी बहाल रखा तथा सन् जुलूस २ ता० १६ रबीउल्अव्वल हि० स० ११२४ (वि० सं० १७६६ वैशाख वदि २ = ई० स० १७१२ ता० १२ अप्रेल) को वज़ीर आसफ़ुद्दौला ने मीर (१) बादशाह बहादुरशाह के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद। (२) बहादुरशाह के राज्य-समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से।
२०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कज्जन (मंदसोर का हाकिम) के नाम नीचे लिखा आज्ञापत्र प्रेषित किया--- "वसाड़ परगने की ४१२५८०० दाम की जागीर प्रतापसिंह के पुत्र पृथ्वीसिंह को दी गई है। अतएव तुम्हें (मीर कज्जन को) लिखा जाता है कि उधर के ज़मींदारों को आज्ञा दो कि सब बक़ाया ठीक-ठीक चुका दें¹।" जहांदारशाह एक वर्ष भी राज्य न करने पाया था कि उस (जहां- दारशाह) को उसके छोटे भाई अज़ीमुश्शान (शाहआलम बहादुरशाह [पार्श्व-टिप्पणी: महारावत के नाम बादशाह. फ़र्रुख़सियर का फ़रमान] का छोटा पुत्र) के शाहज़ादे फ़र्रुख़सियर ने हराकर मुग़ल साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।.. इस अवसर पर महारावत पृथ्वीसिंह ने बादशाह के नाम अर्ज़ी भेजी। उसके उत्तर में वादशाह ने फ़रमान भेज महारावत को लिखा कि तुम्हारी भेजी हुई अर्ज़ी, जो मित्रता का विश्वास दिलाने के लिए लिखी गई है, हमारे समीप रहनेवालों के द्वारा हमारी नज़र से गुज़री। हमारा असीम अनुग्रह अपने ऊपर समझकर अर्जियां भेजते रहो²।" इसके पीछे महारावत पृथ्वीसिंह के नाम सन् जुलूस २ ता० ८ रबी- उल्अव्वल हि० स० ११२६ (वि० सं० १७७१ चैत्र सुदि १० = ई० स० १७१४ ता० १४ मार्च) को वादशाह की ओर से उसके पास नीचे लिखा फ़रमान पहुंचा-- "अपने बराबरवालों में चुने हुए रावत राव पृथ्वीसिंह को बादशाही कृपा का उम्मेदवार रहकर ज्ञात हो कि इस शुभ और अच्छे समय में परमेश्वर की कृपा से हमको बड़ी विजय प्राप्त हुई है। इसलिए इस अच्छे समय में राजा बहादुर (किशनगढ़ का राजा राजसिंह³ ) के ( १) वादशाह जहांदारशाह के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( २ ) वादशाह फर्रुख़सियर के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( ३) राजा राजसिंह, किशनगढ़ के राजा मानसिंह का पुत्र और रूपसिंह का पौत्र था। वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०६) में मानसिंह का देहांत हो जाने