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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 534 में से

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की प्रजा तथा अधिकारियों के नाम निम्नलिखित आशय का आज्ञापत्र जारी किया— "बसाड़ परगने के, जो सूबा मालवे में सरकार मंदसोर के ताल्लुक़ है, चौधरियों, कानूनगो, प्रजाजनों और काश्तकारों को मालूम हो कि ४३६५८०० दाम की आय के परगने चग़तानखां बहादुर आदि से लेकर आधी साख सियालू तुर्की वर्ष के प्रारम्भ से देवलिया के रावत प्रतापसिंह के पुत्र पृथ्वीसिंह की जागीर में कर दिये गये हैं। इसलिए उचित है कि माल और दीवानी के स्वत्वों से जो आय हो, वह पूर्णरूप से क़ायदे और दस्तूर के अनुसार उक्त रावत को देते रहो और उसकी ताबे- दारी से बाहिर न रहो¹।" महारावत पृथ्वीसिंह का मंसब प्रारंभ में ५०० ज़ात और ५०० सवारों का नियत हुआ था। अपने सन् जुलूस ५ ता० ६ शव्वाल हि० ११२३ (वि० सं० १७६८ कार्तिक सुदि ८ = ई० स० १७११ ता० ६ नवंबर) को बाद- शाह शाहआलम बहादुरशाह ने महारावत के मंसब में ५०० ज़ात और दो सौ सवारों की वृद्धि कर उसका मंसब एक हज़ार ज़ात और ७०० सवार का कर दिया²। वि० सं० १७६८ (ई० स० १७१२) में बादशाह शाहआलम बहादुर- शाह की मृत्यु हो जाने पर उसका बड़ा शाहज़ादा जहांदारशाह बादशाह हुआ। महारावत पृथ्वीसिंह का उक्त बादशाह से जहांदारशाह के पास से बसाड़ परगने का फ़रमान होना | भी अच्छा संबंध रहा। फलतः बसाड़ के परगने का फ़रमान, जो बहादुरशाह के समय हुआ था, बादशाह जहांदारशाह ने भी बहाल रखा तथा सन् जुलूस २ ता० १६ रबीउल्अव्वल हि० स० ११२४ (वि० सं० १७६६ वैशाख वदि २ = ई० स० १७१२ ता० १२ अप्रेल) को वज़ीर आसफ़ुद्दौला ने मीर (१) बादशाह बहादुरशाह के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद। (२) बहादुरशाह के राज्य-समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से।