राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 249, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास है, जहां से वह मौक़ा होने पर अपनी जमीयत के साथ आवेगा । इसलिए अजमेर आकर आप यहां अधिकार कर लें । महाराजा अजीतसिंह यह समाचार मिलते ही अजमेर पहुंचा और कुछ दूर एक गांव में अपनी सेना के साथ ठहर गया । अजमेर में जब उसे खाई में शाही सेना के मोर्चें होने का हाल ज्ञात हुआ तो वह शुजाअतखां का कपट-व्यवहार जान गया । फिर महाराजा ने अजमेर को घेर लिया। महाराजा और शुजाअतखां की सेनाओं के बीच युद्ध भी हुआ । अंत में जब शुजाअतखां ने नगर की हालत खराब देखी तो सुलह का प्रयत्न किया और रूपनगर के राजा राजसिंह के समझाने से महाराजा ने एक हाथी, ८ घोड़े और ४५००० रुपये नक़द लेकर वहां से घेरा उठा दिया। तदनन्तर वह वहां से सीधा देवलिया गया और बिना लग्न के ही उसने वि० सं० १७६६ चैत्र सुदि १२ (ई० स० १७०६ ता० ११ मार्च) को महारावत पृथ्वीसिंह की पुत्री से विवाह किया¹ । ख्यात के इस कथन की पुष्टि बादशाह के राज्य समय के सन् जुलूस ३ ता० ४ सफ़र हि० स० ११२१ (वि० सं० १७६६ प्रथम वैशाख सुदि ६ = ई० स० १७०६ ता० ४ अप्रेल) के 'अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला' से भी होती है। उसमें लिखा है कि अजमेर के निवासियों की संपत्ति लूटने के बाद अजीतसिंह ने वहां का घेरा उठा लिया और फिर वह बीस हज़ार सवारों के साथ मालवे में देवलिया के पृथ्वीसिंह के यहां विवाह के लिए गया । महारावत प्रतापसिंह ने जिस प्रकार शाही दरबार से अपना संबंध रखा था, उसी प्रकार महारावत पृथ्वीसिंह ने भी मुग़ल बादशाह से अपना संबंध बनाये रखा । फिर धसाड़ का परगना, जो महारावत के नाम वसाड़ का पुनः फरमान और उसके मंसब में वृद्धि होना चग़तानखां को दे दिया गया था, बादशाह शाह- आलम बहादुरशाह ने महारावत प्रतापसिंह का देहांत हो जाने से पुनः महारावत पृथ्वीसिंह के नाम पर बहाल कर दिया और सन् जुलूस ३ हि० स० ११२१ ता० ५ जमादिउलूआखिर (वि० सं० १७६६ श्रावण सुदि ७ = ई० स० १७०६ ता० १ अगस्त ) को वसांड़ ( १ ) जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ६३-४।