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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

की प्रजा तथा अधिकारियों के नाम निम्नलिखित आशय का आज्ञापत्र जारी किया— "बसाड़ परगने के, जो सूबा मालवे में सरकार मंदसोर के ताल्लुक़ है, चौधरियों, कानूनगो, प्रजाजनों और काश्तकारों को मालूम हो कि ४३६५८०० दाम की आय के परगने चग़तानखां बहादुर आदि से लेकर आधी साख सियालू तुर्की वर्ष के प्रारम्भ से देवलिया के रावत प्रतापसिंह के पुत्र पृथ्वीसिंह की जागीर में कर दिये गये हैं। इसलिए उचित है कि माल और दीवानी के स्वत्वों से जो आय हो, वह पूर्णरूप से क़ायदे और दस्तूर के अनुसार उक्त रावत को देते रहो और उसकी ताबे- दारी से बाहिर न रहो¹।" महारावत पृथ्वीसिंह का मंसब प्रारंभ में ५०० ज़ात और ५०० सवारों का नियत हुआ था। अपने सन् जुलूस ५ ता० ६ शव्वाल हि० ११२३ (वि० सं० १७६८ कार्तिक सुदि ८ = ई० स० १७११ ता० ६ नवंबर) को बाद- शाह शाहआलम बहादुरशाह ने महारावत के मंसब में ५०० ज़ात और दो सौ सवारों की वृद्धि कर उसका मंसब एक हज़ार ज़ात और ७०० सवार का कर दिया²। वि० सं० १७६८ (ई० स० १७१२) में बादशाह शाहआलम बहादुर- शाह की मृत्यु हो जाने पर उसका बड़ा शाहज़ादा जहांदारशाह बादशाह हुआ। महारावत पृथ्वीसिंह का उक्त बादशाह से जहांदारशाह के पास से बसाड़ परगने का फ़रमान होना | भी अच्छा संबंध रहा। फलतः बसाड़ के परगने का फ़रमान, जो बहादुरशाह के समय हुआ था, बादशाह जहांदारशाह ने भी बहाल रखा तथा सन् जुलूस २ ता० १६ रबीउल्अव्वल हि० स० ११२४ (वि० सं० १७६६ वैशाख वदि २ = ई० स० १७१२ ता० १२ अप्रेल) को वज़ीर आसफ़ुद्दौला ने मीर (१) बादशाह बहादुरशाह के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद। (२) बहादुरशाह के राज्य-समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से।

२०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कज्जन (मंदसोर का हाकिम) के नाम नीचे लिखा आज्ञापत्र प्रेषित किया--- "वसाड़ परगने की ४१२५८०० दाम की जागीर प्रतापसिंह के पुत्र पृथ्वीसिंह को दी गई है। अतएव तुम्हें (मीर कज्जन को) लिखा जाता है कि उधर के ज़मींदारों को आज्ञा दो कि सब बक़ाया ठीक-ठीक चुका दें¹।" जहांदारशाह एक वर्ष भी राज्य न करने पाया था कि उस (जहां- दारशाह) को उसके छोटे भाई अज़ीमुश्शान (शाहआलम बहादुरशाह [पार्श्व-टिप्पणी: महारावत के नाम बादशाह. फ़र्रुख़सियर का फ़रमान] का छोटा पुत्र) के शाहज़ादे फ़र्रुख़सियर ने हराकर मुग़ल साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।.. इस अवसर पर महारावत पृथ्वीसिंह ने बादशाह के नाम अर्ज़ी भेजी। उसके उत्तर में वादशाह ने फ़रमान भेज महारावत को लिखा कि तुम्हारी भेजी हुई अर्ज़ी, जो मित्रता का विश्वास दिलाने के लिए लिखी गई है, हमारे समीप रहनेवालों के द्वारा हमारी नज़र से गुज़री। हमारा असीम अनुग्रह अपने ऊपर समझकर अर्जियां भेजते रहो²।" इसके पीछे महारावत पृथ्वीसिंह के नाम सन् जुलूस २ ता० ८ रबी- उल्अव्वल हि० स० ११२६ (वि० सं० १७७१ चैत्र सुदि १० = ई० स० १७१४ ता० १४ मार्च) को वादशाह की ओर से उसके पास नीचे लिखा फ़रमान पहुंचा-- "अपने बराबरवालों में चुने हुए रावत राव पृथ्वीसिंह को बादशाही कृपा का उम्मेदवार रहकर ज्ञात हो कि इस शुभ और अच्छे समय में परमेश्वर की कृपा से हमको बड़ी विजय प्राप्त हुई है। इसलिए इस अच्छे समय में राजा बहादुर (किशनगढ़ का राजा राजसिंह³ ) के ( १) वादशाह जहांदारशाह के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( २ ) वादशाह फर्रुख़सियर के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( ३) राजा राजसिंह, किशनगढ़ के राजा मानसिंह का पुत्र और रूपसिंह का पौत्र था। वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०६) में मानसिंह का देहांत हो जाने

महारावत पृथ्वीसिंह २०१

निवेदन करने पर यह आज्ञा तुम्हारी प्रतिष्ठा-वृद्धि के लिए भेजी जाती है । सदैव स्वामिभक्ति के मार्ग में सुदृढ़ और दत्तचित्त रहकर हमारी कृपाओं को अपने लिए लाभदायक समझो¹ ।'' उन्हीं दिनों जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के पास से ता० २७ ज़िल्काद सन् जुलूस २ हि० स० ११२६ ( वि० सं० १७७१ मार्गशीर्ष वदि [हाशिया: महारावत का शाही इलाके में लूट-मार करना] १४ = ई० स० १७१४ ता० २४ नवंबर ) को समाचार पहुंचा कि भगवतीदास हरकारे ने खबर भेजी है कि दुश्मन नर्मदा के निकट पहुंच गये हैं² । इस पर वह वहां का स्वामी हुआ था । उसका शाही दरबार में अच्छा प्रभाव था, क्योंकि उसने जजाओ के युद्ध में बादशाह बहादुरशाह की तरफ़ रहकर अच्छी वीरता दिखलाई थी, जिससे पीछे से उसे बहादुरशाह ने "राजा बहादुर" की उपाधि दी थी ( वृंद कवि; सत्यरूपक; पृ० २६ ) । वह देवलिया-प्रतापगढ़ के स्वामी का दौहित्र होने से फ़र्रुख़सि- यर के समय देवलिया-प्रतापगढ़ के राजाओं का मददगार था । इस कारण से महारावत पृथ्वीसिंह ने उस (राजसिंह) के द्वारा ही शाही दरबार में अर्ज़ी भेजी होगी । "वंशभास्कर" ( जि० ४, पृ० ३०६४ ) से प्रकट है कि फ़र्रुख़सियर को मारने के षड्यन्त्र में कोटा का महाराव भीमसिंह तथा किशनगढ़ का स्वामी राजसिंह, कृतघ्न होकर महाराजा अजीतसिंह और सैयद बंधुओं से मिल गये थे ।


( १ ) बादशाह फ़र्रुख़सियर के महारावत पृथ्वीसिंह के नाम के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( २ ) फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से । उपर्युक्त संवाद से प्रकट है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय दक्षिण की तरफ़ से बढ़कर मरहटे मालवे में प्रवेश करना चाहते थे । वि० सं० १७६९ के माघ (ई० स० १७१३ फ़रवरी) मास में फ़र्रुख़सियर ने सिंहासनाारूढ़ होते ही आंबेर के महाराजा सवाई जयसिंह को मालवे का सूबेदार नियतकर आज्ञापत्र भेजा कि वह आंबेर से सीधा उज्जैन जाकर उधर का प्रबंध करे ( डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रान्ज़िशन; पृ० ६६ एवं मालवा में युगांतर; पृ० १०६ )। "वंशभास्कर" ( जि० ४, पृ० ३०४२-३ ) से पाया जाता है कि रूपनगर ( किशनगढ़ राज्य ) के स्वामी महाराजा राजसिंह की सलाह से बादशाह ने महाराजा सवाई जयसिंह को उज्जैन का सूबेदार बनाया था और वह वि० सं० १७७० ( ई० स० १७१४ ) में बूंदी होता हुआ उज्जैन की तरफ़ गया था । २६

२०२ 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

कारण नरयाना (? नौलाना) का ज़मींदार शिवसिंह¹, देवलिया का पृथ्वी- सिंह² तथा रामपुरा का खुशहालसिंह (कुशलसिंह) और वदनसिंह³, शाही परगनों में लूट-मार मचा रहे हैं। वहां का फ़ौजदार मुहम्मदखां पृथक् किये जाने के कारण उनको रोकने में विशेष कार्य नहीं कर रहा है। यदि नया फ़ौजदार मुहम्मदज़मां वहां शीघ्र भेज दिया जाय तो अच्छा हो। इस- पर बादशाह ने लतीफुल्लाखां को आज्ञा दी कि वह फ़ौजदार को शीघ्र जाने को कहे⁴। बादशाहत की कमज़ोर हालत और अपने पर बादशाह की नाराज़गी देखकर महारावत पृथ्वीसिंह को अपना राज्य बचाने की चिंता हो गई।

(१) इंदौर राज्य के देपालपुर ज़िले में नर्मदा के किनारे नौलाना नाम का चौहानों का छोटा ठिकाना है। संभव है उपर्युक्त नरयाना इसी नौलाना का सूचक हो और उस समय शिवसिंह वहां का सरदार रहा हो। (२) महारावत पृथ्वीसिंह को इसके पूर्व ही बादशाह फ़र्रुख़सियर ने 'रावत- राव' की उपाधि दे दी थी, जैसा कि ऊपर बतलाया जा चुका है। फिर उसके विद्रोहा- चरण कर शाही इलाक़े में लूट-मार मचाने की बात समझ में नहीं आती, क्योंकि इसका कोई कारण देखने में नहीं आया। अनुमान होता है कि महाराजा सवाई जय- सिंह के मालवे में पहुंचने पर वहां उस (महारावत) का उपर्युक्त महाराजा से मेल नहीं रहा, जिसपर महाराजा द्वारा बादशाह के पास शिकायत होने से महारावत के सम्मान में कमी हुई हो, तब महारावत ने लूट-मार करना आरंभ किया हो। (३) खुशहालसिंह (कुशलसिंह) रामपुरा के चंद्रावत (सीसोदिया) राव गोपालसिंह का कुटुंबी और वदनसिंह उस (गोपालसिंह) का पौत्र था। जहांदारशाह के समय वदनसिंह का पिता रत्नसिंह (जिसका बादशाह औरंगज़ेब के समय मुसलमान हो जाने से इस्लामख़ां नाम हुआ) मालवे के सूबेदार अमानतख़ां से लड़कर मारा गया। तब गोपालसिंह ने, जो औरंगज़ेब के समय से ही रामपूरे की गद्दी से वंचित हो गया था, पीछा रामपूरे पर अधिकार करना चाहा, परंतु शाही दरबार से रुकावट हुई, जिससे अनुमान होता है कि खुशहालसिंह और वदनसिंह ने मालवे में लूट-मार आरंभ की हो। (४) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से।

[Page Header] महारावत पृथ्वीसिंह २०३

[Margin Note 1: L2-L6] महारावत का अपने कुंवर पहाड़सिंह को उदयपुर भेजना.

[Main Text] उस समय राजपूताना के नरेशों में महाराणा संग्रा- मसिंह (दूसरा) बड़ा ही मिलनसार था । वह बादशाह से भी अच्छा संबंध रखकर फ़ायदा उठाना चाहता था और उधर मरहटों से भी उसका मेल था । राजपूताना के प्रमुख राज्य जयपुर, जोधपुर, बीकानेर आदि के नरेशों से उसका व्यवहार अच्छा था । वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) के लगभग महारावत पृथ्वीसिंह के ज्येष्ठ कुंवर पहाड़सिंह ने भी उदयपुर जाकर पहले के सब द्वेष को मिटा दिया । महाराणा ने उसको धरियावद का परगना देने की आज्ञा दी, किन्तु उक्त कुंवर का उदयपुर में रहते समय ही परलोकवास हो गया १ ।

इस संबंध में महाराजा सवाई जयसिंह के पास वहां के ख़बरनवीसों ने ता० ६ शव्वाल सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ आश्विन सुदि ७ = ई० स० १७१६ ता० १२ सितंबर) को यह समाचार भेजा कि मंदसोर सरकार की घटना से यह पता लगा है कि अपने पुत्र के राणा संग्रामसिंह (दूसरा) के पास चले जाने के कारण रुपयों की कमी हो जाने का बहाना कर देवलिया के रावत पृथ्वीसिंह ने अपनी जागीर के महाजनों से रुपयों की मांग की है। इस वजह से वहां के बहुत से ग़रीब और असमर्थ लोग भाग गये और भाग रहे हैं एवं उसके आगमन से बोहरे आदि व्यापारी भी भाग गये हैं । इसपर बादशाह ने शमसुद्दौला ख़ानदौराँ को (महाराजा जयसिंह से) दर्याफ़्त करने का हुक्म दिया २ ।

महारावत पृथ्वीसिंह की उपर्युक्त कार्यवाही से अनुमान होता है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर की पीछे से उसपर अप्रसन्नता हो गई। ता० ४ ज़िल्हिज

[Margin Note 2: L24-L28] आंबेर और बूंदी के नरेशों का बादशाह से महारावत की शिकायत करना

सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ मार्ग- शीर्ष सुदि ५ = ई० १७१६ ता० ८ नवंबर) को आंबेर (जयपुर) के राजा सवाई जयसिंह और बूंदी के महाराव

[Footnotes] (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६३ । (२) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से ।

२०४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास राजा बुधसिंह की बादशाह के पास अर्जियां पहुंचीं कि देवलिया-प्रतापगढ़ का पृथ्वीसिंह शाही सेवकों के साथ ठीक आचरण नहीं कर रहा है और देवलिया के अहल्कारों को रखने में शाही अफ़सरों का बाधक हो रहा है। इसके उत्तर में शाही दरबार से उक्त दोनों राजाओं के पास पृथ्वीसिंह की बेजा कार्रवाई रोकने के लिए फ़रमान भेजा गया¹। ता० १२ ज़िल्हिज सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ मार्गशीर्ष सुदि १३ = ई० स० १७१६ ता० १६ नवंबर) को बादशाह के पास [हाशिया: शिकायतों की जांच के लिए कुतुबुलमुल्क का भेजा जाना] अर्ज़ी पहुंची कि देवलिया के ज़मींदार पृथ्वीसिंह के पास शाही सनद नहीं पहुंची है और वह अपनी जागीर के इलाक़े पर अधिकृत है। पहले वह सर- कार में ८००० रुपये देता था और नाज़िम के पास ज़ाबते के लिए पैदल और सवारों को रखता था। अब वह अपना कार्य नहीं कर रहा है एवं उसने बादशाही ज़मीन पर अधिकार कर लिया है। इसपर बादशाह ने कुतुबुलमुल्क को इस विषय में जांच करने की आज्ञा दी²। बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) ने चन्द्रावतों का रामपूरे का इलाक़ा अपने नाम पर लिखवा


(१) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से। उपर्युक्त संवाद से स्पष्ट है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर की महारावत पृथ्वीसिंह पर अप्रसन्नता हो गई थी, जिससे बादशाह ने वहां पर ज़ब्ती भेज दी, परंतु महारावत ने शाही अहल्कारों का अधिकार नहीं होने दिया। (२) वही। बादशाह फ़र्रुख़सियर के राज्यारंभ में बूंदी का महाराव राजा बुधसिंह शाही दरबार में नहीं गया था। इसपर बादशाह ने नाराज़ होकर बूंदी का राज्य कोटा के महाराव भीमसिंह को प्रदान कर दिया। इसलिए महाराव राजा बुधसिंह जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के साथ मालवे में रहकर बादशाह को प्रसन्न कर पुनः राज्य-पाने का प्रयत्न करता था। "वंशभास्कर" में वि० सं० १७७२ (ई० स० १७१५) के मार्गशीर्ष मास में बुधसिंह को पीछा बूंदी का राज्य मिलने का उल्लेख है (जि० ३, पृ० ३०५३) है। इस संवाद से पाया जाता है कि वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१५) के पीछे भी महाराव राजा बुधसिंह, महाराजा सवाई जयसिंह के साथ मालवे की ओर रहा होगा।

महारावत पृथ्वीसिंह २०५ मंत्री बिहारीदास का रामपूरे से लौटते समय देवलिया में ठहरना लिया था तथा उक्त बादशाह के पांचवे राज्य-वर्ष वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उसको डूंगरपुर और बांसवाड़ा राज्यों का फ़रमान भी मिल गया था। इसपर महाराणा ने उन तीनों जगहों पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए मंत्री बिहारीदास पंचोली को ससैन्य रवाना किया। डूंगरपुर और बांसवाड़ा के नरेशों ने दूरदर्शिता से काम लेकर महाराणा का बड़प्पन स्वीकार किया और फिर वहां से वह सेना रामपुरा पहुंची और जब वहां का मामला तय हो गया तब वहां से मंत्री बिहारीदास, राठोड़ वीर दुर्गादास को वहां के प्रबंध का भार सौंपकर रवाना हो गया। फिर देवलिया, बांसवाड़ा, डूंगरपुर आदि स्थानों में ठहरता हुआ आश्विन सुदि १० को वह उदयपुर पहुंचा¹। अनुमान होता है कि महारावत पृथ्वीसिंह का कुंवर पहाड़सिंह' वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) में देवलिया से उदयपुर चला गया था, इस कारण से महाराणा की सेना ने वहां कुछ भी कार्यवाही न की। "वीर- विनोद" के इस कथन में कि कुंवर पहाड़सिंह का उदयपुर में रहते समय परलोकवास हुआ², यदि कोई तथ्य हो तो यही मानना पड़ेगा कि वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में भी उक्त कुंवर उदयपुर गया था; क्योंकि देवलिया के बड़े जैन मंदिर की वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार की प्रशस्ति³ में महारावत पृथ्वीसिंह और (१) राठोड़ दुर्गादास का महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) के मन्त्री पंचोली बिहारीदास के नाम का वि० सं० १७७४ कार्तिक वदि ६ (ई० स० १७१७ ता० १४ अक्टूबर) भोमवार का पत्र (वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६६३-४)। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६३। (३) संवत् १७७४ वर्षे शाके १६३६ प्रवर्त्तमाने माह (माघ) सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढनगरे महाराजधान्यां महाराजाधिराजमहारावतश्रीप्रथवी- (पृथ्वी) सिंघजीविजयीराज्ये कुंवरश्रीपहाड़सिंघविराजमाने..........। देवलिया के बड़े जैन मंदिर के भीतर लगी हुई प्रशस्ति।

२०६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कुंवर पहाड़सिंह के नाम अंकित हैं। इससे पाया जाता है कि उक्त सम्वत् के माघ सुदि १३ तक तो उक्त कुंवर जीवित था। इसके बाद ही उसका उदयपुर में रहते समय देहांत होना संभव है। महारावत के उत्तराधिकारी कुंवर पहाड़सिंह' का उसकी विद्यमानता में वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) के लगभग देहांत हो गया, जिसका महारावत (१) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में जहां महारावत पृथ्वीसिंह के पुत्रों के नाम दिये हैं, वहां पहाड़सिंह का नाम प्रथम और फिर उम्मेदसिंह, पद्मसिंह, कल्याणसिंह आदि नाम दिये हैं । इससे पाया जाता है कि पहाड़सिंह, महारावत का ज्येष्ठ पुत्र था, परंतु प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात का कथन इसके विपरीत है और उससे पद्मसिंह का पृथ्वीसिंह के पीछे गद्दी बैठने का संदेह हो सकता है, इसलिए "वीरविनोद" के लेखक ने (पृ० १०६३ टिप्पण १ में) इस विषय को स्पष्ट करने के लिए कुछ संकेत किया है। पद्मसिंह के राजगद्दी पर बैठने का अन्य जगह उल्लेख नहीं मिलता। वस्तुतः पृथ्वीसिंह के बाद उसका पौत्र संग्रामसिंह, जिसको रामसिंह भी कहते थे, गद्दी बैठा था। उसके कुछ दानपत्र भी मिले हैं। समय क्रम को देखते हुए पद्मसिंह का गद्दी पर बैठना सिद्ध नहीं होता । बड़वे की ख्यात में कुंवर पद्मसिंह की पत्नी का नाम भी दिया है। उसमें पहाड़सिंह का नाम पृथ्वीसिंह के तीसरे पुत्र के रूप में लिखा है एवं पहाड़सिंह की पत्नी और उसके पुत्र संग्रामसिंह (रामसिंह) का नाम ही नहीं है। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात (पृ० १०) में पहाड़सिंह को पद्मसिंह का पुत्र बतलाकर संग्रामसिंह (रामसिंह) को पहाड़सिंह का पुत्र लिखा है, पर महारावत पृथ्वीसिंह के समय के वि० सं० १७६६ (ई० स० १७१२) और वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) के शिलालेखों में पहाड़सिंह का नाम महारावत के नाम के साथ लिखा है, जिससे स्पष्ट है कि पहाड़सिंह, पृथ्वीसिंह का वास्तविक उत्तराधिकारी था, जिससे उसका नाम शिलालेखों में खोदा गया। संभव है वि० सं० १७६६ (ई० स० १७१२) के पूर्व कुंवर पद्मसिंह का देहांत हो गया हो, तब उसके स्थान पर पहाड़सिंह, जिसको बड़वे की ख्यात में पृथ्वीसिंह का तीसरा पुत्र बतलाया है, प्रचलित प्रथा के अनुसार पद्मसिंह की स्त्री के दत्तक बिठालाकर प्रतापगढ़ राज्य का भावी उत्तराधिकारी निर्वाचित किया गया हो। इस अवस्था में, जैसी कि प्रणाली है, वह पद्मसिंह का पुत्र भी लिखा जा सकता है; परन्तु जब तक यथेष्ट प्रमाण न मिले, इस संबंध में निश्चित मत प्रकट नहीं किया जा सकता।

महारावत पृथ्वीसिंह २०७ महारावत का देहांत को बड़ा दुःख हुआ और वह विशेष न जिया तथा वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) में परलोक सिधारा। “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत का देहांत वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) में दिया है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) तक उसके विद्यमान होने के कई लेख मिल चुके हैं, जो नीचे दिये गये हैं। उसके ६ राणियां थीं, जिनमें से एक विजयकुंवरी बीकानेर के महाराजा कर्णसिंह की पौत्री और पद्मसिंह की पुत्री थी१। उसकी राणियों से पद्मसिंह, कल्याणसिंह, पहाड़सिंह, उम्मेदसिंह, गोपालसिंह और गुमान- सिंह नामक ६ कुंवर तथा कल्याणकुंवरी, पद्मकुंवरी, अनूपकुंवरी, रत्न- कुंवरी एवं सूरजकुंवरी नामक पांच पुत्रियां हुईं२। महारावत पृथ्वीसिंह के समय के कई दानपत्र और शिलालेख मिले हैं३, जिनमें से कुछ इतिहास के लिए महारावत के समय के उपयोगी हैं। उनका सारांश यहां दिया जाता शिलालेख और दानपत्र है— (१) वि० सं० १७६५ आषाढ सुदि ६ (ई० स० १७०८ ता० १२ जून) (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ६ । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १० । (२) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात पृ० ६ । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १० । “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत पृथ्वीसिंह के कुंवरों के नाम इस क्रम से दिये हैं—पहाड़सिंह, उम्मेदसिंह, पद्मसिंह, कल्याणसिंह और गोपालसिंह । उसमें गुमानासिंह का नाम नहीं है। प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात में महारावत की राणियों की संख्या केवल ६ दी है, जिनमें से चार राणियों के नाम और उनके वंश आदि बड़वे की ख्यात से मिलते हैं, बाक़ी नाम और उनके पितृकुल परस्पर नहीं मिलते । राजकुमारी रत्नकुंवरी तथा सूरजकुंवरी के नाम भी उपर्युक्त ख्यात में नहीं हैं। ख्यातों की पारस्परिक विभिन्नता को देखते हुए यह कहना कठिन है कि उनमें से किसका कथन सही है, पर यह स्पष्ट है कि अठारहवीं शताब्दी तक बड़वे, भाटों को वास्तविकता का बिल्कुल ज्ञान नहीं था । (३) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त शिलालेखों और दानपत्रों की छापों में उसके समय

२०८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास का चिलाईखेड़ु गांव का दानपत्र, जिसमें उक्त गांव गढ़वी चारण नाथा को प्रदान करने का उल्लेख है और उक्त दानपत्र में लेखक का नाम विद्या- शिरोमणि राय देकर शाह वर्द्धमान-द्वारा आज्ञा होने पर उसके लिखे जाने का उल्लेख है। (२) वि० सं० १७६५ आषाढ सुदि १५ (ई० स० १७०८ ता० २१ जून) का मोरझर गांव का ताम्रपत्र, जिसमें विद्या-शिरोमणि राय गोपाल को महारावत प्रतापसिंह-कथित उक्त गांव प्रदान करने का उल्लेख है एवं उसमें लेखक का नाम कोठारी लाला दिया है। (३) वि० सं० १७६६ कार्तिक सुदि १३ (ई० स० १७१२ ता० ३१ ऑक्टो- वर) का दानपत्र, जिसमें अमलावद गांव में वर्द्धमान के खेतों में से १८ बीघा ज़मीन जोशी नाथू को देने का उल्लेख है। इस दानपत्र का लेखक कोठारी किशन दिया है एवं इसपर जो उर्दू मुहर लगी हुई है, उसमें "बादशाह जहांदारशाह ग़ाज़ी हि० स० ११२६" और "फ़िदवी पृथ्वीसिंह रावत राव" अंकित है¹। का एक ताम्रपत्र वि० सं० १७६४ पौष वदि का भी दिया है। उसमें महारावत पृथ्वीसिंह का जोशी किशना को ६१ बीघा ज़मीन जीमखेड़ा खेड़ी में रघुनाथ के यज्ञोपवीत में माता झाली (महारावत प्रतापसिंह की राणी)-द्वारा पुण्य देने का उल्लेख है; परंतु महारावत प्रतापसिंह के प्रसङ्ग में ऊपर पृ० १८७ में बतलाया गया है कि वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ मास में जब बादशाह बहादुरशाह का साथ छोड़कर मालवे से जोधपुर का महाराजा अजीतसिंह और जयपुर का महाराजा सवाई जयसिंह देवलिया होते हुए उदयपुर में पहुंचे उस समय महारावत प्रतापसिंह विद्यमान था। इस अवस्था में वि० सं० १७६४ के पौष वदि में पृथ्वीसिंह देवलिया का स्वामी नहीं हो सकता। इस अवस्था में उपर्युक्त ताम्रपत्र की वास्तविकता में सन्देह होना स्वाभाविक है। (१) उपर्युक्त ताम्रपत्र पर फ़ारसी अक्षरों में जो छाप खुदी हुई है, उसमें बादशाह जहांदारशाह का नाम देकर हि० स० ११२६ अंकित है और फ़िदवी रावत राव पृथ्वीसिंह दिया है। जहांदारशाह हि० स० ११२४ (वि० सं० १७६६ = ई० स० १७१२) में बहादुरशाह की मृत्यु हो जाने पर अपने भाइयों को हराकर बादशाह हुआ, परंतु नौ महीने बाद ही फर्रुख़सियर ने उससे सल्तनत छीन ली। इस अवस्था में हि० स० ११२६ में जहांदारशाह बादशाह नहीं हो सकता। संभव है कि छाप में अंकित ६ का अङ्क ४ हो और उसको ६ पढ़ लिया गया हो। इस छाप को देखते हुए यह

· महारावत पृथ्वीसिंह · २०६ (४) वि० सं० १७६६ फाल्गुन सुदि ५ (ई० स० १७१३ ता० १८ फ़रवरी) का देवलिया के बड़े जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें कुंवर पहाड़सिंह और शाह वर्द्धमान के नाम अंकित हैं तथा तेलियों को प्रत्येक पंचमी तिथि पालने (घानी न जोतने) की आज्ञा दी गई है¹। (५) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३(ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) का देवलिया के छोटे जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें तेलियों को वर्ष भर में ४४ दिन तेल की घानी चलाने का निषेध किया गया है²। (६) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३(१७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार अनुमान होता है कि महारावत पृथ्वीसिंह को 'रावत राव' का ख़िताब जहांदारशाह ने दिया हो, परंतु शीघ्र ही उससे राज्य छिन गया। फिर फ़र्क़सियर ने बादशाह बनने पर उक्त ख़िताब को बहाल रक्खा, जिससे फ़र्क़सियर द्वारा यह ख़िताब मिलने की बात प्रसिद्ध हुई और इसी प्रसिद्धि के आधार पर उदयपुर के महाराणा अरिसिंह ने भी अपने वि० सं० १८२८ फाल्गुन वदि ६ (ई० स० १७७२ ता० २७ फ़रवरी) गुरुवार के परवाने में उक्त ख़िताब महारावत पृथ्वीसिंह को बादशाह फ़र्क़सियर द्वारा मिलने का समर्थन किया है (वीरविनोद; द्वितीय भाग; १०६४-५)। (१) संवत् १७६६ फागुन सुदि ५ महाराजश्री रावतश्रीप्रथी- (पृथ्वी) सींघजी कुंअर श्रीपहाड़सींघजी वचनातु·······। मूल शिलालेख की छाप से। ·(२) स्वस्त (स्ति) श्री संवत् १७७[४] वर्षे माघ सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढ़नगरे महारावत श्रीप्रथी (पृथ्वी) सिंघजी विजेराज्ये साह रहींआ जीवराज तथा पंच महाजन तेलीआं पासे पुंन धर्म्म अर्थ पालाव्युं समस्त तेलीए राजी थई ने पाल्युं तेनी बगत १ पजुसण सुतांबर दन ······। पजुसण दीगंबर दन १०। १ उली २ चैत्र सुदि ७ थी दन ······। आसोज सुदि ७ थी दन ६। १ अठाई। असाढ सुद ८ थी दन ८। जुमले दन ४४ अंके चुंन्नालीस ·····कोई घानी जोते [ते] श्रीजी[नो] खुनी ·····। मूल शिलालेख की छाप से। २७

४. महाराणा सांगा (खानवा युद्ध व क्षत्रिय एकता)

२१० 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास की देवलिया के बड़े जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें शाह वर्षा के पुत्र शाह वर्द्धमान-द्वारा मल्लिनाथ के मंदिर की प्रतिष्ठा होने का उल्लेख है और महारावत पृथ्वीसिंह और उसके कुंवर पहाड़सिंह के नाम दिये हैं¹। इससे प्रकट है कि वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) तक तो उक्त कुंवर विद्यमान था। (७) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार की देवलिया के छोटे जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें देवलिया- निवासी हूंबड़ जाति के मात्रेश्वर गोत्रीय अमात्य शाह रहिआ और उसके पुत्र जीवराज आदि का अपने कुटुंब-सहित मूलनायक पार्श्वनाथ का बिंब स्थापित करने का उल्लेख है²। (८) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १४ (ई० स० १७१८ ता० ३ फ़रवरी) का देवलिया के छोटे जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें पर्यूषणों अर्थात् अष्टमी, चतुर्दशी और आदित्यवार को शराब की भट्ठियां निकालने और शराब पिलाने का निषेध किया गया है³। (१) देखो ऊपर पृ० २०५ टि० ३। (२) ・・・संवत् १७७४ वर्षे। शाके १६३६ प्रवर्त्तमान्ये। उत्तरा- यनगते श्रीसूर्ये। माहा मांगल्यप्रदे मासोत्तममासे। शुभकारिमाघमासे। शुक्लपक्ष्ये। त्रयोदशतिथौ। रविवासरे। श्रीमन्मालवदेशे। काठल मंडले। राणाश्रीहमीरवंशविभूषण। महाराजाधिराज। महारावत श्रीप्रथिसिंघजी विजयराज्ये। श्रीमद्देवगढ़ नगर वास्तव्य। हुवड ज्ञातीय। लघुशाखायां। मात्रेश्वर गोत्रे......अमात्यपद धारि। साह श्री रहिआ......लघुभ्राता। साहश्री जीवराज।......इत्यादि सकल कुटुंब युतेन। श्रीमद्देवगढ़ नगरे। मूलनायक श्रीविघ्नहर पार्श्वनाथस्य बिंब स्थापितं......॥ मूल शिलालेख की छाप से। (३) स्वस्त श्री संवत् १७७४ वर्षे। माहासु[द] १४ श्रीदेवगढ़ नगरे। महारावत श्रीश्रीप्रथीसंघजी वजेराज्ये। साह रहीआ जीवराज !

महारावत पृथ्वीसिंह. २११ (६) वि० सं० १७७५ मार्गशीर्ष वदि १२ (ई० स० १७१८ ता० ८ नवंबर ) का वांगाखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें उक्त गांव मेहत्ता रंगदेव को देने का उल्लेख है। ताम्रपत्र में लेखक का नाम विद्याशिरोमणि का पुत्र गोपाल दिया है और मेहत्ता द्वारिकादास, हारमेड़ राजसिंह और शाह जीवराज के द्वारा महारावत की आज्ञा होने पर उसके लिखे जाने का उल्लेख है। उसमें महारावत पृथ्वीसिंह को महाराजाधिराज, महाराज, महारावत और महारावतेंद्र लिखा है तथा उसके अंतिम भाग में उक्त महारावत की राणी वीरपुरी का पलथाणा में दस बीघा क्षेत्र देने का भी उल्लेख है १। महारावत पृथ्वीसिंह धर्मशील, दानी, उदार और विवेक-शील राजा था। मुग़ल साम्राज्य की स्थिति बिगड़ती हुई देख उसने पुराने वैमनस्य को मिटाकर उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह महारावत का व्यक्तित्व से पुनः मेल बढ़ाया, जिससे उसकी नीतिज्ञता का परिचय मिलता है। उसने वर्ष में कई दिन मादक पदार्थ शराब की बिक्री एवं शराब की भट्टी निकालने का निषेध किया था। इसी प्रकार उसने तथा पंच माहाजने । कलाल पासे पुंन्यार्थे धरमार्थे । पळाव्युं । ते समस्त कलाले राजी थई न इं पाल्यु छे तेनी वीगत वइ ॥ थोक ४ पळाव्या १ पजुसण सेतंवरी दिन ८ पालवा १ पजुसण दीगंवर दिन १० जुंमले दिन १८ । १ चउदस २४ आठम २४ वरस १ दन ४८ वरस १ ना दीतवार जे आवे ते पालवाणी विगते पले सही । दिन एतलामां हेइ कोई भाटी गालइ । तथा दारु पावइ ते श्री जीनो खूनी रूपीआ १५ भरे सही । मूल शिलालेख की छाप से । (१) ......स्वस्ति श्रीमन्महाराजाधिराज महाराज श्रीमहाराव- [ त ] श्रीमहरावतेंद्र श्री प्रथ्वीसिंहजी वचनातु......। मूल शिलालेख की छाप से ।

२१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वर्ष में कई दिन तेल की घानी चलाने की मनाही करवाई थी। स्वभावतः मुगलों की अधीनता उसको अप्रिय थी, क्योंकि देवलिया राज्य के शाही अधीनता में रहने पर भी जागीर आदि का कुछ अधिक लाभ नहीं हुआ था और धरियावद का पैतृक परगना भी छूट गया था। इसलिए अपने पिछले समय में उसने शाहंशाह के प्रतिकूल आचरण करना आरंभ किया। अपने पूर्वजों की भांति वह भी विद्वानों का आदर करता और निर्वाह के लिए उन्हें जीविका में गांव आदि देकर उनका सम्मान करता था, जैसा कि उसके दानपत्रों से प्रकट है। बादशाह फर्रुखसियर के राज्यकाल में उसके दिल्ली जाकर निशान, राघवराव का खिताब एवं टकसाल चलाने की इजाज़त भी प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है, परन्तु उसके समय में टक- साल प्रचलित होना पाया नहीं जाता¹। कुछ स्थल पर ऐसा भी लिखा मिलता है कि रतलाम के राठोड़ों द्वारा कोटड़ी में थाना स्थापित करने पर उसका (१) कैप्टन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ८० । मेजर के० डी० अर्सकिन-कृत "गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट” (पृ० १६८) में महारावत पृथ्वी- सिंह के बादशाह शाहआलम बहादुरशाह की सेवा में पहुंचने पर उसका अच्छा सम्मान होने एवं ख्यातों के आधार पर उस (पृथ्वीसिंह) को उक्त बादशाह द्वारा सिक्का बनाने का स्वत्व प्राप्त होने का उल्लेख है; परंतु कुछ स्थल पर महारावत पृथ्वीसिंह को बादशाह फर्रुखसियर द्वारा यह सम्मान मिलना लिखा है। सीतामऊ राज्य के विद्याप्रेमी महाराजकुमार डॉक्टर रघुवीरसिंह, एम्० ए०, एल-एल० बी० ने लिखा है कि उपर्युक्त कथन की पुष्टि के लिए दूसरा कोई विश्वसनीय आधार नहीं मिलता। ऊपरी दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि साम्राज्य के अधीन किसी भी राज्य को ऐसा अधिकार मिलना असम्भव है (मालवा इन ट्रान्ज़िशन; पृ० १२६ टिप्पण ४ । मालवा में युगान्तर; पृ० १४० टिप्पण २)। सर जॉन माल्कम ने, जो आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व मालवे का उच्च अधिकारी था, परिश्रमपूर्वक मालवा के संबंध की सुविस्तृत रिपोर्ट तैयार कर भारत के तत्कालीन गवर्नर-जेनरल मार्किस ऑव् हेस्टिंग्स के पास भेजी थी। उसमें बादशाह मुहम्मदशाह के समय महारावत सालिमसिंह का सिक्का बनाने की आज्ञा प्राप्त करना लिखा है (पृ० २२५), पर यह कथन भी ठीक नहीं प्रतीत होता। सर माल्कम के समय महारावत पृथ्वीसिंह को शाहआलम अथवा फर्रुखसियर- द्वारा सिक्का ढालने की आज्ञा होने की बात प्रसिद्ध न थी। यदि यह बात प्रसिद्ध होती

महारावत संग्रामसिंह २१३ वहां के राठोड़ों से युद्ध हुआ था, जिसमें उनकी हार होकर उनका नक़ारा महारावत के हाथ लगा, जो रणजीत नक़ारा कहलाता है और अब तक प्रतापगढ़ राज्य में विद्यमान है १ । संग्रामसिंह महारावत पृथ्वीसिंह के कुंवर पहाड़सिंह का, जैसा कि ऊपर बत- लाया गया है, कुंवरपदे में ही परलोकवास हो गया था; अतएव उस- महारावत की गद्दीनशीनी (पृथ्वीसिंह) का देहांत होने पर कुंवर पहाड़सिंह और मृत्यु का पुत्र संग्रामसिंह, जिसको रामसिंह भी कहते थे, वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) में देवलिया की गद्दी पर बैठा; परंतु उसने अधिक समय तक राज्य नहीं किया. तो वह अपनी रिपोर्ट में इसका उल्लेख अवश्य करता । मुहम्मदशाह हि० स० ११३१ (वि० सं० १७७६ = ई० स० १७१९) में दिल्ली का स्वामी हुआ और हि० स० ११६१ (वि० सं० १८०५ = ई० स० १७४८) में उसकी मृत्यु हुई । प्रतापगढ़ का स्वामी महारावत सालिमसिंह वि० सं० १८१४ (ई० स० १७५७) में गद्दी पर बैठा और वि० सं० १८३१ (ई० स० १७७४) में परलोक सिधारा । ऐसी अवस्था में सालिमसिंह को मुहम्मदशाह-द्वारा सिक्का बनाने की आज्ञा मिलने की बात भी स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि सालिमसिंह मुहम्मदशाह का समकालीन न था। वस्तुतः सालिमशाही सिक्का, जिसकी बाबत उपर्युक्त वर्णन है, शाहआलम द्वितीय (वि० सं० १८१६-१८६३ = ई० स० १७५६-१८६६) के समय सन् जुलूस २५ हि० स० ११९६ में महारावत सामन्तसिंह के समय प्रतापगढ़ में बनना आरंभ हुआ, जिसपर शाहआलम का नाम होने और शाहआलम और सालिमसिंह नाम एकसा होने से वह 'शाहआलमशाही' के स्थान में 'सालिमशाही' प्रसिद्ध हो गया, जैसा कि हम ऊपर पृ० १४ में बतला चुके हैं। यह संभव है कि शाहआलम दूसरे के समय महारावत सालिम- सिंह ने सिक्का बनाने की आज्ञा प्राप्त की हो। फिर उसका देहांत हो जाने से, जैसा कि सिक्के पर उल्लेख है, उक्त बादशाह के २५ वें सन् जुलूस में महारावत सांमतसिंह ने यह सिक्का जारी किया हो । (१) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ८० । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० १६८ ।

२१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास और वि० सं० १७७६ (ई० स० १७१६) में उसकी निःसंतान मृत्यु हो गई। उसके समय के वि० सं० १७७६ आषाढ वदि २¹ (ई० स० १७१६ ता० २४ मई) और आषाढ वदि ६² (ई० स० १७१६ ता० ३१ मई) (१) श्री मन्महाराजाधिराज महारावतजी श्रीसंग्रामसिंहजी वचनातु जोशी रोड़ाजी सुप(ख)रामजी योग्य यत् षे (खे) त वीघा ९१ एकाणु श्री प्रथीसिंहजी तथा पहाड़सिंह दीधा है जे मे आ चंद्रार्क यावत उदक आघाटे पाले दीधी। जेरा विगत वीघा ६० वर मंडल अरधोदये चंद्र ग्रहणे दीधा वीघा ३१ अमलावदे पहाड़ जी निमिच जोमले ९१ [वीघा] जेम दीधी.........। दुए साह जीवराज मेता द्वारिकादास लिपि(खि)तं विद्या शिरोमणि राय संवत १७७६ वर्षे.......अषाढ़ वदि २....... मूल ताम्रपत्र की छाप से। (२) महारावतेंद्र श्रीसंग्रामसिंघजी वचनातु जोसी रोडाजी सुष- (ख)रामजी जोग्य यत् गाम अमलावद मांहे गोहरा वालु षे (खे)- त वीगा १३) अंके तेरे मा झालीजी थाने दीदु गोतमजी माहे दीदु जे मे आ चंद्रार्क यावत कृष्णार्पणे दीदु जी टकी लागत(त) बल- (त) माफ करे दीदाजी......लिषि(खि)तं विद्या शिरोमणि रायजी हुए सा जीवराज में [ह] ता द्वारकादासजी संवत १७७६ वर्षे असाड वदि ६ दीने। मूल ताम्रपत्र की छाप से। प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों और ताम्रपत्रों की सूची में महारावत उम्मेदसिंह का संवत् १७७६ ज्येष्ठ सुदि ७ (ई० स० १७१६ ता० १५ मई) का एक ताम्रपत्र और बतलाया है; परंतु उसकी छाप अथवा प्रतिलिपि हमारे देखने में नहीं आई। ऐसी अवस्था में उक्त ताम्रपत्र की वास्तविकता के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। यदि वह ताम्रपत्र सही हो तो संवत् १७७६ (ई० स० १७१६) के आषाढ में संग्रामसिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी नहीं हो सकता और उपर्युक्त दोनों ताम्रपत्र कृत्रिम ठहरेंगे;

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महारावत उम्मेदसिंह

महारावत उम्मेदसिंह २१५.

[हाशिया: महारावत के समय के ताम्रपत्र] के दो ताम्रपत्र मिले हैं, जिनसे पाया जाता है कि उपर्युक्त संवत् के आषाढ मास के पीछे उसका देहांत हुआ हो, जैसा कि ख्यातों में उल्लेख है¹। "वीरविनोद" में वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उसकी गद्दीनशीनी और इसके छः महीने बाद मृत्यु होने का उल्लेख है², जो ठीक नहीं है; क्योंकि वि० सं० १७७५ मार्गशीर्ष वदि १२ (ई० स० १७१८ ता० ८ नवंबर) का तो महारावत पृथ्वीसिंह का ताम्रपत्र मिल चुका है, जिसका उल्लेख ऊपर आ गया है³। उम्मेदसिंह ऊपर लिखा जा चुका है कि महारावत संग्रामसिंह के कोई संतान नहीं थी। इसपर सरदारों आदि ने उस (संग्रामसिंह) के पितृव्य उम्मेद- [हाशिया: राज्यप्राप्ति और देहांत] सिंह को, जो महारावत पृथ्वीसिंह का छोटा पुत्र था, वि० सं० १७७६⁴ (ई० स० १७१६) में

परन्तु इन दोनों ताम्रपत्रों में उल्लिखित व्यक्ति विद्याशिरोमणि राय, शाह जीवराज और मेहता द्वारिकादास, महारावत संग्रामसिंह के समकालीन थे। ऐसी स्थिति में बिना किसी पुष्ट प्रमाण के इन दोनों ताम्रपत्रों की वास्तविकता में संदेह करना निर्मूल है। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात और वहां से आई हुई प्राचीन ख्यात में महा- रावत संग्रामसिंह की रानियों के नाम नहीं हैं और उपर्युक्त प्राचीन ख्यात (पृ० १०) में उसकी बालक अवस्था में अविवाहित मृत्यु होना बतलाया है। (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ७ । प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० १०। (२) द्वितीय भाग, पृ० १०६३। (३) देखो ऊपर पृ० २११, टि० १ । (४) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत उम्मेदसिंह की गद्दीनशीनी का संवत् १७७४ (ई० स० १७१७) दिया है, जो ठीक नहीं है। वि० सं० १७७६ (ई० स० १७१६) के महारावत संग्रामसिंह के दानपत्र मिल चुके हैं, अतएव वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उम्मेदसिंह का गद्दी पर बैठना संभव नहीं है।

२१६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास राजगद्दी पर बिठलाया । वह भी अधिक समय तक राज्यसुख का उपभोग न कर सका और वि० सं० १७७८¹ ( ई० स० १७२१ ) में उसकी मृत्यु हो गई । प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों और ताम्रपत्रों की सूची में उस- ( उम्मेदसिंह ) का सबसे पहला लेख वि० सं० १७७६ ज्येष्ठ सुदि ७² ( ई० [महारावत के शिलालेख और दानपत्र] स० १७१६ ता० १५ मई ) और अंतिम लेख वि० सं० १७७७ माघ वदि ३०³ ( ई० स० १७२१ ता० १६ जनवरी ) का दिया है । वि० सं० १७७७ आषाढ सुदि १५⁴ ( ई० स० १७२० ता० ८ जुलाई ) के उसके ताम्रपत्र की छाप तथा उसी वर्ष के मार्गशीर्ष वदि ५⁵ ( ता० ८ नवम्बर ) बुधवार के ताम्रपत्र की प्रतिलिपि हमारे पास आई हैं, जिनसे उसका समय निश्चित करने के अतिरिक्त और कोई वृत्तांत ज्ञात नहीं होता । ( १ ) महारावत गोपालसिंह के सबसे पहले वि० सं० १७७८ वैशाख सुदि १ ( ई० स० १७२१ ता० १६ अप्रेल ) के दानपत्र का प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त शिलालेखों की सूची में उल्लेख है, जिससे स्पष्ट है कि वि० सं० १७७८ ( ई० स० १७२१ ) के प्रारंभ में गोपालसिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हो चुका था । इसकी पुष्टि उक्त महारावत के वि० सं० १७७८ श्रावण सुदि १३ ( ई० स० १७२१ ता० २६ जुलाई ) बुधवार के सेखड़ी गांव के गोसाईं गंगागिरि के नाम के दानपत्र से भी होती है, जिसमें उसके उदयपुर जाने और वहां यह दानपत्र लिखाने का उल्लेख है । ( २ ) देखो ऊपर पृ० २१४, टि० २ । ( ३ ) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त शिलालेखों की सूची से । ( ४ ) जोशी रोड़ा सुखराम के नाम बसाइ में ३५ बीघा ज़मीन देने के संबंध के ताम्रपत्र की मूल छाप से । ( ५ ) भाट फत्ता के नाम के महारावत उम्मेदसिंह के ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । तिथि और वार का मिलान करने पर उस दिन ( मार्गशीर्ष वदि ५ को ) बुधवार के स्थान में मंगलवार आता है ।