राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वर्ष में कई दिन तेल की घानी चलाने की मनाही करवाई थी। स्वभावतः मुगलों की अधीनता उसको अप्रिय थी, क्योंकि देवलिया राज्य के शाही अधीनता में रहने पर भी जागीर आदि का कुछ अधिक लाभ नहीं हुआ था और धरियावद का पैतृक परगना भी छूट गया था। इसलिए अपने पिछले समय में उसने शाहंशाह के प्रतिकूल आचरण करना आरंभ किया। अपने पूर्वजों की भांति वह भी विद्वानों का आदर करता और निर्वाह के लिए उन्हें जीविका में गांव आदि देकर उनका सम्मान करता था, जैसा कि उसके दानपत्रों से प्रकट है। बादशाह फर्रुखसियर के राज्यकाल में उसके दिल्ली जाकर निशान, राघवराव का खिताब एवं टकसाल चलाने की इजाज़त भी प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है, परन्तु उसके समय में टक- साल प्रचलित होना पाया नहीं जाता¹। कुछ स्थल पर ऐसा भी लिखा मिलता है कि रतलाम के राठोड़ों द्वारा कोटड़ी में थाना स्थापित करने पर उसका (१) कैप्टन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ८० । मेजर के० डी० अर्सकिन-कृत "गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट” (पृ० १६८) में महारावत पृथ्वी- सिंह के बादशाह शाहआलम बहादुरशाह की सेवा में पहुंचने पर उसका अच्छा सम्मान होने एवं ख्यातों के आधार पर उस (पृथ्वीसिंह) को उक्त बादशाह द्वारा सिक्का बनाने का स्वत्व प्राप्त होने का उल्लेख है; परंतु कुछ स्थल पर महारावत पृथ्वीसिंह को बादशाह फर्रुखसियर द्वारा यह सम्मान मिलना लिखा है। सीतामऊ राज्य के विद्याप्रेमी महाराजकुमार डॉक्टर रघुवीरसिंह, एम्० ए०, एल-एल० बी० ने लिखा है कि उपर्युक्त कथन की पुष्टि के लिए दूसरा कोई विश्वसनीय आधार नहीं मिलता। ऊपरी दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि साम्राज्य के अधीन किसी भी राज्य को ऐसा अधिकार मिलना असम्भव है (मालवा इन ट्रान्ज़िशन; पृ० १२६ टिप्पण ४ । मालवा में युगान्तर; पृ० १४० टिप्पण २)। सर जॉन माल्कम ने, जो आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व मालवे का उच्च अधिकारी था, परिश्रमपूर्वक मालवा के संबंध की सुविस्तृत रिपोर्ट तैयार कर भारत के तत्कालीन गवर्नर-जेनरल मार्किस ऑव् हेस्टिंग्स के पास भेजी थी। उसमें बादशाह मुहम्मदशाह के समय महारावत सालिमसिंह का सिक्का बनाने की आज्ञा प्राप्त करना लिखा है (पृ० २२५), पर यह कथन भी ठीक नहीं प्रतीत होता। सर माल्कम के समय महारावत पृथ्वीसिंह को शाहआलम अथवा फर्रुखसियर- द्वारा सिक्का ढालने की आज्ञा होने की बात प्रसिद्ध न थी। यदि यह बात प्रसिद्ध होती