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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 534 में से

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पृष्ठ 264

महारावत संग्रामसिंह २१३ वहां के राठोड़ों से युद्ध हुआ था, जिसमें उनकी हार होकर उनका नक़ारा महारावत के हाथ लगा, जो रणजीत नक़ारा कहलाता है और अब तक प्रतापगढ़ राज्य में विद्यमान है १ । संग्रामसिंह महारावत पृथ्वीसिंह के कुंवर पहाड़सिंह का, जैसा कि ऊपर बत- लाया गया है, कुंवरपदे में ही परलोकवास हो गया था; अतएव उस- महारावत की गद्दीनशीनी (पृथ्वीसिंह) का देहांत होने पर कुंवर पहाड़सिंह और मृत्यु का पुत्र संग्रामसिंह, जिसको रामसिंह भी कहते थे, वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) में देवलिया की गद्दी पर बैठा; परंतु उसने अधिक समय तक राज्य नहीं किया. तो वह अपनी रिपोर्ट में इसका उल्लेख अवश्य करता । मुहम्मदशाह हि० स० ११३१ (वि० सं० १७७६ = ई० स० १७१९) में दिल्ली का स्वामी हुआ और हि० स० ११६१ (वि० सं० १८०५ = ई० स० १७४८) में उसकी मृत्यु हुई । प्रतापगढ़ का स्वामी महारावत सालिमसिंह वि० सं० १८१४ (ई० स० १७५७) में गद्दी पर बैठा और वि० सं० १८३१ (ई० स० १७७४) में परलोक सिधारा । ऐसी अवस्था में सालिमसिंह को मुहम्मदशाह-द्वारा सिक्का बनाने की आज्ञा मिलने की बात भी स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि सालिमसिंह मुहम्मदशाह का समकालीन न था। वस्तुतः सालिमशाही सिक्का, जिसकी बाबत उपर्युक्त वर्णन है, शाहआलम द्वितीय (वि० सं० १८१६-१८६३ = ई० स० १७५६-१८६६) के समय सन् जुलूस २५ हि० स० ११९६ में महारावत सामन्तसिंह के समय प्रतापगढ़ में बनना आरंभ हुआ, जिसपर शाहआलम का नाम होने और शाहआलम और सालिमसिंह नाम एकसा होने से वह 'शाहआलमशाही' के स्थान में 'सालिमशाही' प्रसिद्ध हो गया, जैसा कि हम ऊपर पृ० १४ में बतला चुके हैं। यह संभव है कि शाहआलम दूसरे के समय महारावत सालिम- सिंह ने सिक्का बनाने की आज्ञा प्राप्त की हो। फिर उसका देहांत हो जाने से, जैसा कि सिक्के पर उल्लेख है, उक्त बादशाह के २५ वें सन् जुलूस में महारावत सांमतसिंह ने यह सिक्का जारी किया हो । (१) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ८० । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० १६८ ।