राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास और वि० सं० १७७६ (ई० स० १७१६) में उसकी निःसंतान मृत्यु हो गई। उसके समय के वि० सं० १७७६ आषाढ वदि २¹ (ई० स० १७१६ ता० २४ मई) और आषाढ वदि ६² (ई० स० १७१६ ता० ३१ मई) (१) श्री मन्महाराजाधिराज महारावतजी श्रीसंग्रामसिंहजी वचनातु जोशी रोड़ाजी सुप(ख)रामजी योग्य यत् षे (खे) त वीघा ९१ एकाणु श्री प्रथीसिंहजी तथा पहाड़सिंह दीधा है जे मे आ चंद्रार्क यावत उदक आघाटे पाले दीधी। जेरा विगत वीघा ६० वर मंडल अरधोदये चंद्र ग्रहणे दीधा वीघा ३१ अमलावदे पहाड़ जी निमिच जोमले ९१ [वीघा] जेम दीधी.........। दुए साह जीवराज मेता द्वारिकादास लिपि(खि)तं विद्या शिरोमणि राय संवत १७७६ वर्षे.......अषाढ़ वदि २....... मूल ताम्रपत्र की छाप से। (२) महारावतेंद्र श्रीसंग्रामसिंघजी वचनातु जोसी रोडाजी सुष- (ख)रामजी जोग्य यत् गाम अमलावद मांहे गोहरा वालु षे (खे)- त वीगा १३) अंके तेरे मा झालीजी थाने दीदु गोतमजी माहे दीदु जे मे आ चंद्रार्क यावत कृष्णार्पणे दीदु जी टकी लागत(त) बल- (त) माफ करे दीदाजी......लिषि(खि)तं विद्या शिरोमणि रायजी हुए सा जीवराज में [ह] ता द्वारकादासजी संवत १७७६ वर्षे असाड वदि ६ दीने। मूल ताम्रपत्र की छाप से। प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों और ताम्रपत्रों की सूची में महारावत उम्मेदसिंह का संवत् १७७६ ज्येष्ठ सुदि ७ (ई० स० १७१६ ता० १५ मई) का एक ताम्रपत्र और बतलाया है; परंतु उसकी छाप अथवा प्रतिलिपि हमारे देखने में नहीं आई। ऐसी अवस्था में उक्त ताम्रपत्र की वास्तविकता के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। यदि वह ताम्रपत्र सही हो तो संवत् १७७६ (ई० स० १७१६) के आषाढ में संग्रामसिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी नहीं हो सकता और उपर्युक्त दोनों ताम्रपत्र कृत्रिम ठहरेंगे;