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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत पृथ्वीसिंह. २११ (६) वि० सं० १७७५ मार्गशीर्ष वदि १२ (ई० स० १७१८ ता० ८ नवंबर ) का वांगाखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें उक्त गांव मेहत्ता रंगदेव को देने का उल्लेख है। ताम्रपत्र में लेखक का नाम विद्याशिरोमणि का पुत्र गोपाल दिया है और मेहत्ता द्वारिकादास, हारमेड़ राजसिंह और शाह जीवराज के द्वारा महारावत की आज्ञा होने पर उसके लिखे जाने का उल्लेख है। उसमें महारावत पृथ्वीसिंह को महाराजाधिराज, महाराज, महारावत और महारावतेंद्र लिखा है तथा उसके अंतिम भाग में उक्त महारावत की राणी वीरपुरी का पलथाणा में दस बीघा क्षेत्र देने का भी उल्लेख है १। महारावत पृथ्वीसिंह धर्मशील, दानी, उदार और विवेक-शील राजा था। मुग़ल साम्राज्य की स्थिति बिगड़ती हुई देख उसने पुराने वैमनस्य को मिटाकर उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह महारावत का व्यक्तित्व से पुनः मेल बढ़ाया, जिससे उसकी नीतिज्ञता का परिचय मिलता है। उसने वर्ष में कई दिन मादक पदार्थ शराब की बिक्री एवं शराब की भट्टी निकालने का निषेध किया था। इसी प्रकार उसने तथा पंच माहाजने । कलाल पासे पुंन्यार्थे धरमार्थे । पळाव्युं । ते समस्त कलाले राजी थई न इं पाल्यु छे तेनी वीगत वइ ॥ थोक ४ पळाव्या १ पजुसण सेतंवरी दिन ८ पालवा १ पजुसण दीगंवर दिन १० जुंमले दिन १८ । १ चउदस २४ आठम २४ वरस १ दन ४८ वरस १ ना दीतवार जे आवे ते पालवाणी विगते पले सही । दिन एतलामां हेइ कोई भाटी गालइ । तथा दारु पावइ ते श्री जीनो खूनी रूपीआ १५ भरे सही । मूल शिलालेख की छाप से । (१) ......स्वस्ति श्रीमन्महाराजाधिराज महाराज श्रीमहाराव- [ त ] श्रीमहरावतेंद्र श्री प्रथ्वीसिंहजी वचनातु......। मूल शिलालेख की छाप से ।