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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२१० 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास की देवलिया के बड़े जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें शाह वर्षा के पुत्र शाह वर्द्धमान-द्वारा मल्लिनाथ के मंदिर की प्रतिष्ठा होने का उल्लेख है और महारावत पृथ्वीसिंह और उसके कुंवर पहाड़सिंह के नाम दिये हैं¹। इससे प्रकट है कि वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) तक तो उक्त कुंवर विद्यमान था। (७) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार की देवलिया के छोटे जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें देवलिया- निवासी हूंबड़ जाति के मात्रेश्वर गोत्रीय अमात्य शाह रहिआ और उसके पुत्र जीवराज आदि का अपने कुटुंब-सहित मूलनायक पार्श्वनाथ का बिंब स्थापित करने का उल्लेख है²। (८) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १४ (ई० स० १७१८ ता० ३ फ़रवरी) का देवलिया के छोटे जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें पर्यूषणों अर्थात् अष्टमी, चतुर्दशी और आदित्यवार को शराब की भट्ठियां निकालने और शराब पिलाने का निषेध किया गया है³। (१) देखो ऊपर पृ० २०५ टि० ३। (२) ・・・संवत् १७७४ वर्षे। शाके १६३६ प्रवर्त्तमान्ये। उत्तरा- यनगते श्रीसूर्ये। माहा मांगल्यप्रदे मासोत्तममासे। शुभकारिमाघमासे। शुक्लपक्ष्ये। त्रयोदशतिथौ। रविवासरे। श्रीमन्मालवदेशे। काठल मंडले। राणाश्रीहमीरवंशविभूषण। महाराजाधिराज। महारावत श्रीप्रथिसिंघजी विजयराज्ये। श्रीमद्देवगढ़ नगर वास्तव्य। हुवड ज्ञातीय। लघुशाखायां। मात्रेश्वर गोत्रे......अमात्यपद धारि। साह श्री रहिआ......लघुभ्राता। साहश्री जीवराज।......इत्यादि सकल कुटुंब युतेन। श्रीमद्देवगढ़ नगरे। मूलनायक श्रीविघ्नहर पार्श्वनाथस्य बिंब स्थापितं......॥ मूल शिलालेख की छाप से। (३) स्वस्त श्री संवत् १७७४ वर्षे। माहासु[द] १४ श्रीदेवगढ़ नगरे। महारावत श्रीश्रीप्रथीसंघजी वजेराज्ये। साह रहीआ जीवराज !