भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 260

· महारावत पृथ्वीसिंह · २०६ (४) वि० सं० १७६६ फाल्गुन सुदि ५ (ई० स० १७१३ ता० १८ फ़रवरी) का देवलिया के बड़े जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें कुंवर पहाड़सिंह और शाह वर्द्धमान के नाम अंकित हैं तथा तेलियों को प्रत्येक पंचमी तिथि पालने (घानी न जोतने) की आज्ञा दी गई है¹। (५) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३(ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) का देवलिया के छोटे जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें तेलियों को वर्ष भर में ४४ दिन तेल की घानी चलाने का निषेध किया गया है²। (६) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३(१७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार अनुमान होता है कि महारावत पृथ्वीसिंह को 'रावत राव' का ख़िताब जहांदारशाह ने दिया हो, परंतु शीघ्र ही उससे राज्य छिन गया। फिर फ़र्क़सियर ने बादशाह बनने पर उक्त ख़िताब को बहाल रक्खा, जिससे फ़र्क़सियर द्वारा यह ख़िताब मिलने की बात प्रसिद्ध हुई और इसी प्रसिद्धि के आधार पर उदयपुर के महाराणा अरिसिंह ने भी अपने वि० सं० १८२८ फाल्गुन वदि ६ (ई० स० १७७२ ता० २७ फ़रवरी) गुरुवार के परवाने में उक्त ख़िताब महारावत पृथ्वीसिंह को बादशाह फ़र्क़सियर द्वारा मिलने का समर्थन किया है (वीरविनोद; द्वितीय भाग; १०६४-५)। (१) संवत् १७६६ फागुन सुदि ५ महाराजश्री रावतश्रीप्रथी- (पृथ्वी) सींघजी कुंअर श्रीपहाड़सींघजी वचनातु·······। मूल शिलालेख की छाप से। ·(२) स्वस्त (स्ति) श्री संवत् १७७[४] वर्षे माघ सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढ़नगरे महारावत श्रीप्रथी (पृथ्वी) सिंघजी विजेराज्ये साह रहींआ जीवराज तथा पंच महाजन तेलीआं पासे पुंन धर्म्म अर्थ पालाव्युं समस्त तेलीए राजी थई ने पाल्युं तेनी बगत १ पजुसण सुतांबर दन ······। पजुसण दीगंबर दन १०। १ उली २ चैत्र सुदि ७ थी दन ······। आसोज सुदि ७ थी दन ६। १ अठाई। असाढ सुद ८ थी दन ८। जुमले दन ४४ अंके चुंन्नालीस ·····कोई घानी जोते [ते] श्रीजी[नो] खुनी ·····। मूल शिलालेख की छाप से। २७