भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 259

२०८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास का चिलाईखेड़ु गांव का दानपत्र, जिसमें उक्त गांव गढ़वी चारण नाथा को प्रदान करने का उल्लेख है और उक्त दानपत्र में लेखक का नाम विद्या- शिरोमणि राय देकर शाह वर्द्धमान-द्वारा आज्ञा होने पर उसके लिखे जाने का उल्लेख है। (२) वि० सं० १७६५ आषाढ सुदि १५ (ई० स० १७०८ ता० २१ जून) का मोरझर गांव का ताम्रपत्र, जिसमें विद्या-शिरोमणि राय गोपाल को महारावत प्रतापसिंह-कथित उक्त गांव प्रदान करने का उल्लेख है एवं उसमें लेखक का नाम कोठारी लाला दिया है। (३) वि० सं० १७६६ कार्तिक सुदि १३ (ई० स० १७१२ ता० ३१ ऑक्टो- वर) का दानपत्र, जिसमें अमलावद गांव में वर्द्धमान के खेतों में से १८ बीघा ज़मीन जोशी नाथू को देने का उल्लेख है। इस दानपत्र का लेखक कोठारी किशन दिया है एवं इसपर जो उर्दू मुहर लगी हुई है, उसमें "बादशाह जहांदारशाह ग़ाज़ी हि० स० ११२६" और "फ़िदवी पृथ्वीसिंह रावत राव" अंकित है¹। का एक ताम्रपत्र वि० सं० १७६४ पौष वदि का भी दिया है। उसमें महारावत पृथ्वीसिंह का जोशी किशना को ६१ बीघा ज़मीन जीमखेड़ा खेड़ी में रघुनाथ के यज्ञोपवीत में माता झाली (महारावत प्रतापसिंह की राणी)-द्वारा पुण्य देने का उल्लेख है; परंतु महारावत प्रतापसिंह के प्रसङ्ग में ऊपर पृ० १८७ में बतलाया गया है कि वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ मास में जब बादशाह बहादुरशाह का साथ छोड़कर मालवे से जोधपुर का महाराजा अजीतसिंह और जयपुर का महाराजा सवाई जयसिंह देवलिया होते हुए उदयपुर में पहुंचे उस समय महारावत प्रतापसिंह विद्यमान था। इस अवस्था में वि० सं० १७६४ के पौष वदि में पृथ्वीसिंह देवलिया का स्वामी नहीं हो सकता। इस अवस्था में उपर्युक्त ताम्रपत्र की वास्तविकता में सन्देह होना स्वाभाविक है। (१) उपर्युक्त ताम्रपत्र पर फ़ारसी अक्षरों में जो छाप खुदी हुई है, उसमें बादशाह जहांदारशाह का नाम देकर हि० स० ११२६ अंकित है और फ़िदवी रावत राव पृथ्वीसिंह दिया है। जहांदारशाह हि० स० ११२४ (वि० सं० १७६६ = ई० स० १७१२) में बहादुरशाह की मृत्यु हो जाने पर अपने भाइयों को हराकर बादशाह हुआ, परंतु नौ महीने बाद ही फर्रुख़सियर ने उससे सल्तनत छीन ली। इस अवस्था में हि० स० ११२६ में जहांदारशाह बादशाह नहीं हो सकता। संभव है कि छाप में अंकित ६ का अङ्क ४ हो और उसको ६ पढ़ लिया गया हो। इस छाप को देखते हुए यह

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ) · पृष्ठ 259, कुल 534 में से · BharatKosha