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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत पृथ्वीसिंह २०७ महारावत का देहांत को बड़ा दुःख हुआ और वह विशेष न जिया तथा वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) में परलोक सिधारा। “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत का देहांत वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) में दिया है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) तक उसके विद्यमान होने के कई लेख मिल चुके हैं, जो नीचे दिये गये हैं। उसके ६ राणियां थीं, जिनमें से एक विजयकुंवरी बीकानेर के महाराजा कर्णसिंह की पौत्री और पद्मसिंह की पुत्री थी१। उसकी राणियों से पद्मसिंह, कल्याणसिंह, पहाड़सिंह, उम्मेदसिंह, गोपालसिंह और गुमान- सिंह नामक ६ कुंवर तथा कल्याणकुंवरी, पद्मकुंवरी, अनूपकुंवरी, रत्न- कुंवरी एवं सूरजकुंवरी नामक पांच पुत्रियां हुईं२। महारावत पृथ्वीसिंह के समय के कई दानपत्र और शिलालेख मिले हैं३, जिनमें से कुछ इतिहास के लिए महारावत के समय के उपयोगी हैं। उनका सारांश यहां दिया जाता शिलालेख और दानपत्र है— (१) वि० सं० १७६५ आषाढ सुदि ६ (ई० स० १७०८ ता० १२ जून) (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ६ । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १० । (२) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात पृ० ६ । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १० । “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत पृथ्वीसिंह के कुंवरों के नाम इस क्रम से दिये हैं—पहाड़सिंह, उम्मेदसिंह, पद्मसिंह, कल्याणसिंह और गोपालसिंह । उसमें गुमानासिंह का नाम नहीं है। प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात में महारावत की राणियों की संख्या केवल ६ दी है, जिनमें से चार राणियों के नाम और उनके वंश आदि बड़वे की ख्यात से मिलते हैं, बाक़ी नाम और उनके पितृकुल परस्पर नहीं मिलते । राजकुमारी रत्नकुंवरी तथा सूरजकुंवरी के नाम भी उपर्युक्त ख्यात में नहीं हैं। ख्यातों की पारस्परिक विभिन्नता को देखते हुए यह कहना कठिन है कि उनमें से किसका कथन सही है, पर यह स्पष्ट है कि अठारहवीं शताब्दी तक बड़वे, भाटों को वास्तविकता का बिल्कुल ज्ञान नहीं था । (३) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त शिलालेखों और दानपत्रों की छापों में उसके समय