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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 534 में से

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महारावत पृथ्वीसिंह २०५ मंत्री बिहारीदास का रामपूरे से लौटते समय देवलिया में ठहरना लिया था तथा उक्त बादशाह के पांचवे राज्य-वर्ष वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उसको डूंगरपुर और बांसवाड़ा राज्यों का फ़रमान भी मिल गया था। इसपर महाराणा ने उन तीनों जगहों पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए मंत्री बिहारीदास पंचोली को ससैन्य रवाना किया। डूंगरपुर और बांसवाड़ा के नरेशों ने दूरदर्शिता से काम लेकर महाराणा का बड़प्पन स्वीकार किया और फिर वहां से वह सेना रामपुरा पहुंची और जब वहां का मामला तय हो गया तब वहां से मंत्री बिहारीदास, राठोड़ वीर दुर्गादास को वहां के प्रबंध का भार सौंपकर रवाना हो गया। फिर देवलिया, बांसवाड़ा, डूंगरपुर आदि स्थानों में ठहरता हुआ आश्विन सुदि १० को वह उदयपुर पहुंचा¹। अनुमान होता है कि महारावत पृथ्वीसिंह का कुंवर पहाड़सिंह' वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) में देवलिया से उदयपुर चला गया था, इस कारण से महाराणा की सेना ने वहां कुछ भी कार्यवाही न की। "वीर- विनोद" के इस कथन में कि कुंवर पहाड़सिंह का उदयपुर में रहते समय परलोकवास हुआ², यदि कोई तथ्य हो तो यही मानना पड़ेगा कि वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में भी उक्त कुंवर उदयपुर गया था; क्योंकि देवलिया के बड़े जैन मंदिर की वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार की प्रशस्ति³ में महारावत पृथ्वीसिंह और (१) राठोड़ दुर्गादास का महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) के मन्त्री पंचोली बिहारीदास के नाम का वि० सं० १७७४ कार्तिक वदि ६ (ई० स० १७१७ ता० १४ अक्टूबर) भोमवार का पत्र (वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६६३-४)। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६३। (३) संवत् १७७४ वर्षे शाके १६३६ प्रवर्त्तमाने माह (माघ) सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढनगरे महाराजधान्यां महाराजाधिराजमहारावतश्रीप्रथवी- (पृथ्वी) सिंघजीविजयीराज्ये कुंवरश्रीपहाड़सिंघविराजमाने..........। देवलिया के बड़े जैन मंदिर के भीतर लगी हुई प्रशस्ति।